1. ज्योलीकोट का दूषित पानी: बीमारी के बीच हाईकोर्ट सख्त, अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
पानी के नमूनों में बैक्टीरिया मिलने के बाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से मांगा जवाब; स्वास्थ्य और पेयजल व्यवस्था पर गंभीर सवाल
नैनीताल। नैनीताल जिले के ज्योलीकोट और आसपास के क्षेत्रों में दूषित पेयजल से बीमारी फैलने के मामले ने अब प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पानी के नमूनों में बैक्टीरियल संक्रमण पाए जाने के बाद अधिकारियों के दावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जांचे गए सभी 10 नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे, जबकि स्वास्थ्य विभाग की जांच में भी पांच में से चार नमूने असुरक्षित पाए गए।
मामले में अधिकारियों की ओर से अदालत को बताया गया था कि प्रभावित क्षेत्रों में टैंकरों के माध्यम से पानी उपलब्ध कराया जा रहा है और स्थानीय जलस्रोतों के परीक्षण संतोषजनक पाए गए हैं। लेकिन विभिन्न विभागों की रिपोर्टों में सामने आए अंतर ने पूरे मामले की गंभीरता बढ़ा दी।
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को मामले की व्यक्तिगत निगरानी करने और निर्धारित समय में शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने प्रभावित क्षेत्रों में दोबारा व्यापक स्तर पर पानी की जांच कराने की दिशा में भी निर्देश दिए हैं।
यह मामला केवल ज्योलीकोट तक सीमित नहीं माना जा सकता। पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल स्रोतों का प्रदूषण, पाइपलाइन की स्थिति, सीवेज और पेयजल स्रोतों के बीच दूरी तथा नियमित गुणवत्ता परीक्षण जैसी व्यवस्थाएं सीधे लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी क्षेत्र में लोगों के बीमार पड़ने के बाद पानी के नमूनों में बैक्टीरिया मिलते हैं, तो नियमित निगरानी व्यवस्था पहले क्यों प्रभावी नहीं रही?
देवभूमि के लोगों की मांग: प्रभावित गांवों के सभी पेयजल स्रोतों की स्वतंत्र जांच, जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने, पाइपलाइन और स्रोतों का तकनीकी ऑडिट तथा बीमारी से प्रभावित परिवारों के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी की व्यवस्था की जानी चाहिए।
2. देहरादून में H1N1 के 506 मामले: संक्रमण के साथ डेंगू और चिकनगुनिया की भी दस्तक
22 नए H1N1 मामलों ने बढ़ाई चिंता; स्वास्थ्य विभाग के सामने एक साथ कई मौसमी संक्रमणों की चुनौती
देहरादून। राजधानी देहरादून में H1N1 संक्रमण के मामलों में लगातार बढ़ोतरी सामने आ रही है। 16 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार मंगलवार को 92 नमूनों की जांच में 22 लोगों में H1N1 संक्रमण की पुष्टि हुई। इसके साथ जिले में अब तक कुल 506 संक्रमितों की पुष्टि हो चुकी है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार अब तक 1,386 नमूनों की जांच की गई है। कुल संक्रमितों में 337 देहरादून और 169 अन्य जिलों के बताए गए हैं। रिपोर्ट में 430 लोगों के स्वस्थ होने तथा 74 सक्रिय मामलों की जानकारी दी गई है। दो मौतों के बाद ऑडिट में H1N1 संक्रमण की पुष्टि भी बताई गई है।
चिंता सिर्फ H1N1 तक सीमित नहीं है। मंगलवार को डेंगू के पांच नए मामले सामने आए, जिससे जिले में डेंगू के कुल मामले 171 बताए गए हैं। इनमें 151 लोग स्वस्थ हो चुके हैं और 20 उपचाराधीन हैं। इसी अवधि में चिकनगुनिया के छह नए मामले भी सामने आए, जिससे कुल संख्या 93 पहुंच गई।
मच्छरजनित बीमारियों की रोकथाम के लिए आशा कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों ने बड़े पैमाने पर घरों और पानी के कंटेनरों का सर्वे किया है। रिपोर्ट में 15,746 घरों तथा 79,285 कंटेनरों की जांच के दौरान कई स्थानों पर लार्वा मिलने की जानकारी दी गई है।
यह स्थिति राजधानी में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चुनौती है। H1N1 जैसे श्वसन संक्रमण और डेंगू-चिकनगुनिया जैसे मच्छरजनित रोगों के लिए अलग-अलग रोकथाम रणनीतियों की जरूरत होती है।
देवभूमि के लोगों की मांग: स्वास्थ्य विभाग को अस्पतालों में पर्याप्त जांच सुविधा, संदिग्ध मामलों की त्वरित जांच, संवेदनशील आयु वर्ग की निगरानी और मच्छर नियंत्रण अभियान को वार्ड स्तर तक मजबूत करना चाहिए।
3. मेडिकल स्टोर की आड़ में नशीली दवाओं का कथित कारोबार: पिरान कलियर में STF की कार्रवाई
1,150 ट्रामाडोल कैप्सूल और 10 कोडीन युक्त सिरप बरामद; दो आरोपी गिरफ्तार
हरिद्वार। पिरान कलियर क्षेत्र में मेडिकल स्टोर की आड़ में कथित रूप से नशीली दवाओं की बिक्री का मामला सामने आया है। एसटीएफ, ड्रग विभाग और कलियर पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में एक मेडिकल स्टोर पर छापेमारी कर दो आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने की रिपोर्ट है। कार्रवाई के दौरान 1,150 ट्रामाडोल कैप्सूल और 10 कोडीन युक्त कफ सिरप बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार एसटीएफ को शिकायत मिली थी कि मेडिकल स्टोर से नशे के आदी लोगों को दवाएं बेची जा रही हैं। इसके बाद जानकारी जुटाकर संयुक्त टीम ने 15 सितंबर को छापेमारी की।
जांच के दौरान एजेंसियों ने दवाओं की बिक्री के रिकॉर्ड और चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन से संबंधित दस्तावेजों की भी जांच की। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मौके पर बिक्री से संबंधित आवश्यक रिकॉर्ड और प्रिस्क्रिप्शन उपलब्ध नहीं पाए गए।
इस कार्रवाई ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या नशीली दवाओं की अवैध बिक्री कुछ दुकानों तक सीमित है या इसके पीछे व्यापक सप्लाई नेटवर्क मौजूद है?
उत्तराखंड में नशे के खिलाफ अभियान लगातार चलाया जा रहा है, लेकिन केवल छोटी-बड़ी बरामदगी से समस्या खत्म नहीं होगी। यह पता लगाना जरूरी है कि ऐसी दवाएं मेडिकल स्टोर तक किस सप्लायर से पहुंचती हैं, किस तरीके से खरीदी जाती हैं और किन क्षेत्रों में आगे बेची जाती हैं।
यह मामला विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैध दवाओं की आड़ में प्रतिबंधित या नियंत्रित दवाओं की बिक्री युवाओं और नशे की समस्या से जूझ रहे लोगों तक आसानी से पहुंच बना सकती है।
देवभूमि के लोगों की मांग: दवा दुकानों के लाइसेंस, स्टॉक रजिस्टर, खरीद-बिक्री रिकॉर्ड और प्रिस्क्रिप्शन की नियमित जांच हो। केवल दुकान संचालक ही नहीं, बल्कि संदिग्ध सप्लाई चेन तक जांच पहुंचनी चाहिए।
4. देहरादून में नकली दवा फैक्ट्री का मामला: करीब एक करोड़ की दवाएं और मशीनें जब्त
अंतरराज्यीय नेटवर्क की आशंका ने उत्तराखंड की दवा आपूर्ति व्यवस्था पर खड़े किए सवाल
देहरादून। नकली दवाओं का नेटवर्क उत्तराखंड के लिए गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बन सकता है। जुलाई में देहरादून में सामने आए एक मामले में उत्तर प्रदेश की खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन टीम और क्राइम ब्रांच ने कथित नकली दवा फैक्ट्री पर कार्रवाई की थी। रिपोर्ट के अनुसार करीब एक करोड़ रुपये मूल्य की दवाएं और मशीनें जब्त की गई थीं।
जांच में कथित तौर पर 43 प्रकार की नकली दवाओं से संबंधित सामग्री मिलने की जानकारी सामने आई। अधिकारियों ने दवाओं के नमूने भी जांच के लिए लिए थे। रिपोर्ट में इसे अंतरराज्यीय गिरोह से जोड़कर जांच किए जाने की बात कही गई।
मामले में डिजिटल सामग्री की जांच के दौरान कथित तौर पर प्रसिद्ध ब्रांडों की नकली स्ट्रिप तैयार करने से जुड़ी तस्वीरें और बातचीत भी मिलने की जानकारी दी गई।
नकली दवा का मुद्दा केवल आर्थिक अपराध नहीं है। यदि कोई मरीज वास्तविक दवा समझकर नकली उत्पाद खरीदता है, तो उसे प्रभावी उपचार नहीं मिलने के साथ गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी हो सकता है।
इस मामले से उत्तराखंड की दवा आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी पर भी सवाल उठते हैं। निर्माण इकाई से लेकर थोक विक्रेता, वितरक और खुदरा मेडिकल स्टोर तक प्रत्येक चरण में रिकॉर्ड और लाइसेंस की जांच जरूरी है।
देवभूमि के लोगों की मांग: राज्य में नियमित दवा सैंपलिंग बढ़ाई जाए, संदिग्ध बैच की डिजिटल ट्रैकिंग हो, नकली दवाओं के मामलों में सप्लाई नेटवर्क तक कार्रवाई पहुंचे और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। खासकर ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में बिकने वाली दवाओं के नमूनों की नियमित जांच आवश्यक है।
5. चारधाम यात्रा में 50 लाख से अधिक श्रद्धालु: सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर मुख्यमंत्री की समीक्षा
यात्रा के बढ़ते दबाव के बीच सड़क, चिकित्सा, आपात संचार और हेली सेवा व्यवस्था पर फोकस
देहरादून। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा 2026 में श्रद्धालुओं की संख्या 50 लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 14 सितंबर को यात्रा व्यवस्थाओं की समीक्षा करते हुए सुरक्षा और सुविधाओं को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए।
समीक्षा में यात्रा मार्गों की स्थिति, चिकित्सा व्यवस्था, आपातकालीन संचार, घोड़े-खच्चरों से संबंधित व्यवस्थाओं तथा हेली सेवाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री ने यात्रियों की सुरक्षा में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं होने देने पर जोर दिया।
चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आगमन पहाड़ी सड़कों, पार्किंग, स्वास्थ्य केंद्रों, कचरा प्रबंधन और आपदा प्रतिक्रिया तंत्र पर अतिरिक्त दबाव भी डालता है।
विशेषकर बारिश और भूस्खलन के दौरान यात्रा मार्गों पर अचानक जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे में केवल यात्रियों की संख्या बढ़ना उपलब्धि का आंकड़ा नहीं होना चाहिए; यात्रियों की सुरक्षा, समय पर चिकित्सा सहायता और आपदा की स्थिति में सुरक्षित निकासी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
हेली सेवाओं के मामले में पारदर्शी बुकिंग और यात्रियों की शिकायतों का त्वरित निपटारा भी महत्वपूर्ण है।
देवभूमि के लोगों की मांग: चारधाम मार्गों पर रियल-टाइम मौसम और भूस्खलन चेतावनी, पर्याप्त मेडिकल रेस्पॉन्स टीम, आपातकालीन संचार नेटवर्क, सुरक्षित पार्किंग और हेली सेवाओं की पारदर्शी व्यवस्था को स्थायी बनाया जाए।
6. दो माह से वेतन नहीं मिलने का आरोप: ISBT में रोडवेज कर्मचारियों का धरना
ग्रामीण डिपो के कर्मचारियों ने आर्थिक संकट का मुद्दा उठाया; आंदोलन तेज करने की चेतावनी
देहरादून। उत्तराखंड रोडवेज के ग्रामीण डिपो से जुड़े कर्मचारियों द्वारा दो माह से वेतन नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए देहरादून ISBT में धरना देने की खबर सामने आई है। कर्मचारियों ने वेतन भुगतान की मांग के साथ आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है।
रोडवेज कर्मचारियों का मामला सीधे सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से जुड़ा है। पहाड़ी जिलों में बड़ी संख्या में लोग सरकारी बस सेवाओं पर निर्भर हैं। यदि कर्मचारियों की आर्थिक समस्याएं लंबी होती हैं तो इसका असर कर्मचारियों के परिवारों के साथ-साथ परिवहन सेवाओं पर भी पड़ सकता है।
वेतन में देरी का कारण क्या है, भुगतान के लिए कितनी राशि आवश्यक है और विभाग के पास इसके लिए क्या वित्तीय योजना है—इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।
कर्मचारियों का कहना है कि लंबे समय तक वेतन नहीं मिलने से घरेलू खर्च, बच्चों की पढ़ाई, किराया और ऋण की किस्तों जैसी जिम्मेदारियां प्रभावित होती हैं।
दूसरी ओर, रोडवेज की वित्तीय स्थिति, बसों का संचालन, राजस्व और सरकारी सहायता जैसे मुद्दों को भी व्यापक रूप से देखना होगा।
देवभूमि के लोगों की मांग: कर्मचारियों के लंबित वेतन का समयबद्ध भुगतान किया जाए और रोडवेज की वित्तीय स्थिति पर दीर्घकालिक समाधान तैयार किया जाए। सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि भविष्य में वेतन भुगतान में देरी रोकने के लिए क्या व्यवस्था बनाई जा रही है।
7. उपनल कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन और DA का लाभ: तीन चरणों में लागू होगा फैसला
विभिन्न विभागों में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए शासनादेश जारी
देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने उपनल के माध्यम से विभिन्न विभागों में कार्यरत कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन और महंगाई भत्ते का लाभ चरणबद्ध तरीके से देने का निर्णय लिया है। 16 सितंबर को सामने आई जानकारी के अनुसार इसका क्रियान्वयन तीन चरणों में किया जाएगा।
सरकार के निर्णय के अनुसार विभिन्न विभागों में स्वीकृत या सृजित पदों के सापेक्ष अतिरिक्त उपनल कर्मचारी कार्यरत होने की स्थिति में उपलब्ध पदों के अनुसार नियुक्ति तिथि की वरिष्ठता के आधार पर समायोजन की प्रक्रिया भी प्रस्तावित है।
उपनल कर्मचारी लंबे समय से वेतन, सेवा शर्तों और रोजगार सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं। इसलिए न्यूनतम वेतन और महंगाई भत्ते से जुड़ा फैसला बड़ी संख्या में कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि इसका वास्तविक लाभ कब से और कितनी राशि के रूप में मिलेगा, यह संबंधित विभागों में शासनादेश के क्रियान्वयन और पात्रता की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह रहेगा कि तीनों चरणों का समयबद्ध क्रियान्वयन कैसे होगा और कर्मचारियों को वास्तविक भुगतान कब से प्राप्त होगा।
देवभूमि के लोगों की मांग: शासनादेश के प्रत्येक चरण की समयसीमा सार्वजनिक की जाए, पात्र कर्मचारियों की सूची पारदर्शी तरीके से तैयार हो और भुगतान प्रक्रिया ऑनलाइन ट्रैक करने योग्य बनाई जाए।
8. देहरादून के 100 वार्डों में करीब ₹50 करोड़ के विकास कार्य: अब टेंडर की बारी
सड़क, नाली, पुश्ते और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े काम प्रस्तावित; निगरानी बनी सबसे बड़ी चुनौती
देहरादून। नगर निगम देहरादून के 100 वार्डों में करीब 50 करोड़ रुपये के विकास कार्यों के लिए 16 सितंबर को टेंडर जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। प्रस्तावित कार्यों में सड़क, नाली, पुश्ते और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े निर्माण शामिल हैं।
नगर निगम के अनुसार वार्डवार जरूरतों के आधार पर विकास कार्यों के प्रस्ताव तैयार किए गए हैं। टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद चयनित कार्यदायी संस्थाओं को काम सौंपा जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि इससे लंबे समय से लंबित विकास कार्यों को गति मिलने की उम्मीद है।
लेकिन राजधानी के नागरिकों के लिए असली सवाल टेंडर जारी होने से आगे का है—काम की गुणवत्ता कैसी होगी, समय पर पूरा होगा या नहीं और सड़क बनने के कुछ समय बाद फिर खुदाई तो नहीं होगी?
देहरादून में सड़क निर्माण, पेयजल, सीवर, विद्युत और अन्य यूटिलिटी से जुड़ी अलग-अलग एजेंसियों के कामों के बीच समन्वय लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है।
₹50 करोड़ के कार्यों में प्रत्येक वार्ड में कितनी राशि खर्च होगी, कौन-सा काम किस एजेंसी को दिया जाएगा और काम की गुणवत्ता की जांच कौन करेगा—इन जानकारियों को सार्वजनिक करने से पारदर्शिता बढ़ सकती है।
देवभूमि के लोगों की मांग: प्रत्येक वार्ड के काम, लागत, ठेकेदार, समयसीमा और गुणवत्ता निरीक्षण रिपोर्ट ऑनलाइन सार्वजनिक की जाए। भुगतान को कार्य की वास्तविक प्रगति से जोड़ा जाए और खराब निर्माण पर जिम्मेदारी तय हो।
9. किशाऊ बांध परियोजना फिर चर्चा में: 232.6 मीटर ऊंचा बांध, छह राज्यों पर प्रभाव
टोंस नदी पर प्रस्तावित बहुद्देशीय परियोजना से सिंचाई और बिजली उत्पादन की योजना
देहरादून। उत्तराखंड और हिमाचल से जुड़े टोंस नदी क्षेत्र में प्रस्तावित किशाऊ बहुद्देशीय बांध परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। 16 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार परियोजना में लगभग 232.6 मीटर ऊंचे बांध का प्रस्ताव है। परियोजना को ऊर्जा और सिंचाई के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार परियोजना से लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई क्षमता विकसित होने की बात कही गई है। उत्पादित बिजली में उत्तराखंड को आधा हिस्सा मिलने की जानकारी भी रिपोर्ट में दी गई है। परियोजना का प्रभाव छह राज्यों तक बताया गया है।
इतनी बड़ी परियोजना केवल बिजली और सिंचाई का विषय नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े बांधों के साथ पर्यावरण, स्थानीय समुदाय, वन क्षेत्र, जैव-विविधता, पुनर्वास और आपदा जोखिम जैसे प्रश्न भी जुड़े होते हैं।
इसलिए परियोजना के लाभों के साथ उसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों की जानकारी भी सार्वजनिक होना जरूरी है।
विशेष रूप से स्थानीय लोगों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि परियोजना से किन गांवों, जंगलों और नदी तंत्र पर प्रभाव पड़ सकता है तथा प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे की क्या व्यवस्था होगी।
देवभूमि के लोगों की मांग: परियोजना से संबंधित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, पुनर्वास योजना, जल-प्रवाह संबंधी अध्ययन और स्थानीय समुदाय पर प्रभाव से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं। विकास के साथ हिमालयी पर्यावरण की सुरक्षा को भी समान महत्व दिया जाए।
10. औली में भारत-अमेरिका का ‘युद्ध अभ्यास 2026’: ऊंचाई वाले क्षेत्र में संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण
संयुक्त सैन्य अभ्यास का 22वां संस्करण उत्तराखंड में शुरू; पर्वतीय युद्ध कौशल पर फोकस
चमोली। उत्तराखंड का औली एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर के सैन्य प्रशिक्षण का केंद्र बना है। भारत और अमेरिका के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘युद्ध अभ्यास’ का 22वां संस्करण औली में शुरू हुआ है। उद्घाटन समारोह औली विदेशी प्रशिक्षण केंद्र में आयोजित किए जाने की जानकारी आकाशवाणी ने दी है।
यह अभ्यास भारत और अमेरिका के बीच वार्षिक सैन्य सहयोग का हिस्सा है। इस वर्ष अभ्यास उत्तराखंड के औली के साथ राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में भी आयोजित किया जा रहा है।
पर्वतीय क्षेत्र में सैन्य अभ्यास का अपना विशेष महत्व है। ऊंचाई, कम तापमान, कठिन भूभाग और सीमित ऑक्सीजन जैसी परिस्थितियां मैदानी प्रशिक्षण से अलग चुनौतियां पैदा करती हैं।
ऐसे अभ्यासों में दोनों देशों की सेनाओं के बीच संचालन प्रक्रियाओं, संचार और संयुक्त प्रशिक्षण क्षमता को बेहतर करने पर ध्यान दिया जाता है।
उत्तराखंड के लिए यह गतिविधि रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित करती है। औली जैसे संवेदनशील हिमालयी पर्यटन क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों के दौरान पर्यावरणीय प्रबंधन और स्थानीय यातायात व्यवस्था भी महत्वपूर्ण रहती है।
देवभूमि के लोग रिपोर्ट/