सड़कें साफ नहीं, धूल नियंत्रण के इंतजाम नाकाफी; निगम, MDDA की नई मशीनें भी जमीन पर नजर नहीं आ रहीं
देहरादून। राजधानी की सड़कों पर उड़ती धूल अब सिर्फ परेशानी नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का गंभीर सवाल बनती जा रही है। कई लोगों ने आंखों में जलन, नाक में एलर्जी, लगातार छींक, गले में खराश और सांस लेने में परेशानी की शिकायत की है।
देहरादून की हवा में प्रदूषण का खतरा भी सामने आ चुका है। 1 जनवरी 2026 को शहर का AQI 316 यानी ‘Very Poor’ दर्ज हुआ था और PM2.5 का स्तर 329 µg/m³ तक पहुंच गया था। UKPCB के अनुसार बारिश नहीं होने से प्रदूषकों का dispersion कम हुआ और pollution सतह के पास फंसा रहा।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि बारिश कब होगी, सवाल यह है कि बारिश के बिना प्रदूषण और सड़क की धूल नियंत्रित करने की व्यवस्था कहां है?
क्या बारिश ही देहरादून की हवा साफ करेगी?
बारिश हवा से कुछ particulate matter को नीचे बैठाने और वातावरण में मौजूद प्रदूषकों को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण का स्थायी समाधान बारिश नहीं है। सड़क की धूल, निर्माण गतिविधियां, वाहनों का उत्सर्जन और खुले में कचरा जलाना जैसे स्रोतों पर लगातार नियंत्रण जरूरी है। UKPCB ने भी देहरादून में वाहनों और waste burning को pollution बढ़ाने वाले कारकों में बताया है।
बारीक कण शरीर के लिए कितना बड़ा खतरा?
WHO के अनुसार PM2.5 जैसे बेहद छोटे कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं। इनके संपर्क का संबंध हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों की बीमारी और कैंसर समेत कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से है।
इसलिए सड़क किनारे उड़ती धूल को केवल “गंदगी” समझना बड़ी भूल होगी।
निगम,MDDA की नई मशीनें आखिर कहां हैं?
धूल और सड़क सफाई के लिए MDDA की नई मशीनें लाए जाने की बात सामने आई थी, लेकिन शहरवासियों का सवाल है—मशीनें सड़कों पर दिखाई क्यों नहीं दे रही हैं?
कई स्थानों पर सड़कें साफ नहीं हो रहीं, निर्माण के बाद मिट्टी हट नहीं रही और नियमित पानी का छिड़काव भी पर्याप्त दिखाई नहीं देता।
नगर निगम, प्रशासन और MDDA से जनता का सीधा सवाल है—जब प्रदूषण और धूल दोनों स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं, तो रोकथाम की प्रभावी व्यवस्था जमीन पर कब दिखाई देगी?
विकास जरूरी है, लेकिन धूल के साथ नहीं
देहरादून को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जिसमें नागरिकों को रोज धूल और प्रदूषित हवा में सांस लेने के लिए मजबूर होना पड़े।
सवाल साफ है—सड़कों की नियमित सफाई, धूल नियंत्रण और प्रदूषण पर कार्रवाई आखिर कौन करेगा?
वहीं प्रदूषण बोर्ड और शहरी विकास जैसे संस्थान सिर्फ खानापूर्ति तक सीमित हो चुके हैं। कोई नहीं जानता इन विभागों में आखिर क्या कार्य हो रहा है और क्यों ये विभाग बनाए गये हैं जब आम जनता को ऐसे हालात ही देखने हैं तो कम से कम सरकारी खर्च तो बचे।