साफ पानी भी नसीब नहीं, दूषित पेयजल से पीलिया-डायरिया का कहर—दो मौतों के बाद सवाल: पहाड़ों में भी पानी पीना क्यों बना जानलेवा?
नैनीताल/ज्योलीकोट।
जिस पहाड़ को देश की नदियों और प्राकृतिक जलस्रोतों की धरती कहा जाता है, उसी उत्तराखंड में आज लोगों को पीने के लिए सुरक्षित पानी तक नहीं मिल पा रहा है। नैनीताल जिले के ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में जलजनित बीमारी का संकट गंभीर रूप ले चुका है। पिछले दिनों दो लोगों—16 वर्षीय किशोर और 26 वर्षीय महिला—की मौत की खबर सामने आई है, जबकि बड़ी संख्या में लोग पीलिया, उल्टी-दस्त, बुखार और अन्य संक्रमण से पीड़ित बताए जा रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार प्रभावित क्षेत्र में कई गांव शामिल हैं और मरीजों को नैनीताल, हल्द्वानी, बरेली और दिल्ली तक उपचार के लिए ले जाना पड़ा है।
सबसे बड़ा सवाल—आखिर पानी में क्या मिल रहा है?
ग्रामीणों ने पेयजल को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। कुछ रिपोर्टों में पेयजल लाइन में सीवरेज के पानी के मिलने की बात सामने आई है और पानी में ई-कोलाई संक्रमण की रिपोर्टों का भी उल्लेख है। हालांकि बीमारी और पानी के बीच अंतिम वैज्ञानिक/प्रशासनिक निष्कर्ष के लिए आधिकारिक जांच जरूरी है।
अगर पेयजल पाइपलाइन के आसपास सीवर, नालियों या गंदे पानी का रिसाव हो रहा है, तो बारिश अथवा पाइपलाइन में दबाव कम होने की स्थिति में दूषित पानी पीने की लाइन में प्रवेश कर सकता है। यही स्थिति डायरिया, टाइफाइड और हेपेटाइटिस-ए/ई जैसे जलजनित संक्रमणों का जोखिम बढ़ा सकती है।
क्यों हुई ऐसी स्थिति?
1. पुरानी और क्षतिग्रस्त पेयजल लाइनें
पहाड़ी क्षेत्रों में कई जगह पाइपलाइनें वर्षों पुरानी हैं। लीकेज होने पर बाहर का गंदा पानी पाइपलाइन में प्रवेश कर सकता है।
2. सीवरेज और पेयजल व्यवस्था के बीच खतनाक नजदीकी
जहां सीवर लाइन और पेयजल पाइपलाइन एक-दूसरे के आसपास हैं, वहां लीकेज की स्थिति में गंभीर संक्रमण का खतरा रहता है।
3. मानसून में बढ़ जाता है जोखिम
भारी बारिश में नालों, सीवर और सतही जलस्रोतों का पानी मिल सकता है। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और पाइपलाइन टूटने से समस्या और बढ़ सकती है।
4. जलस्रोतों की नियमित जांच का अभाव
सिर्फ पानी की सप्लाई करना पर्याप्त नहीं है। हर स्रोत और हर वितरण लाइन की नियमित microbiological testing जरूरी है।
5. समस्या सामने आने के बाद भी शुरुआती कार्रवाई पर सवाल
रिपोर्टों के मुताबिक क्षेत्र में बीमारी के मामले कुछ समय से सामने आ रहे थे और बाद में स्थिति गंभीर हुई। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि पहले ही पानी के नमूने लेकर व्यापक जांच क्यों नहीं की गई?
यह सिर्फ ज्योलीकोट की समस्या नहीं—पूरे पहाड़ के लिए चेतावनी
उत्तराखंड में पर्यटन, शहरीकरण और आबादी लगातार बढ़ रही है। लेकिन कई पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल, सीवरेज और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था उसी गति से मजबूत नहीं हुई।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिस राज्य की पहचान हिमालयी जलस्रोतों से है, वहां किसी परिवार को यह डर हो कि नल खोलकर आने वाला पानी बीमारी देगा या जिंदगी, यह व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
पानी जीवन है—लेकिन दूषित पानी मौत का कारण भी बन सकता है।
अभी बरसात में लोगों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
जब तक पानी की गुणवत्ता पूरी तरह प्रमाणित न हो:
- नल का पानी सीधे न पिएं।
- पानी को अच्छी तरह उबालकर ही पीएं।
- संभव हो तो प्रमाणित सुरक्षित पैकेज्ड/वैकल्पिक पेयजल इस्तेमाल करें।
- बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर लोगों को विशेष सावधानी रखें।
- उल्टी-दस्त, बुखार, पेट दर्द, कमजोरी या आंख/त्वचा पीली होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
- दस्त होने पर ORS का इस्तेमाल करें।
- बासी भोजन और खुले में रखा खाना न खाएं।
- पानी रखने वाले बर्तनों और टंकियों की नियमित सफाई करें।
- घर में पीने और खाना बनाने के लिए सुरक्षित पानी ही इस्तेमाल करें।
स्वास्थ्य विभाग ने भी प्रभावित क्षेत्र में पानी उबालकर पीने और साफ-सफाई रखने की सलाह दी है।
प्रशासन से उठने चाहिए ये 7 बड़े सवाल
1. ज्योलीकोट और आसपास के सभी पेयजल स्रोतों की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
2. पानी में ई-कोलाई/फीकल कंटैमिनेशन मिला है तो उसका स्रोत क्या है?
3. क्या किसी पेयजल लाइन में सीवरेज का पानी वास्तव में मिला?
4. पिछले महीनों में पानी के कितने नमूने लिए गए और उनकी रिपोर्ट क्या रही?
5. पाइपलाइन, टैंक और जलस्रोतों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कब हुआ?
6. बीमारी के शुरुआती मामलों के बाद तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक पानी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
7. अगर विभागीय लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों/एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी या नहीं?
सबसे जरूरी मांग
प्रशासन को केवल क्लोरीनेशन और स्वास्थ्य शिविर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पूरे प्रभावित क्षेत्र की पेयजल पाइपलाइन, सीवर लाइन, टंकियों और प्राकृतिक जलस्रोतों का वैज्ञानिक ऑडिट कराया जाना चाहिए।
जहां पानी संदिग्ध है, वहां तत्काल वैकल्पिक सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए और पानी की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
ज्योलीकोट की घटना एक चेतावनी है—पहाड़ों में पानी की कमी से पहले अब “सुरक्षित पानी” का संकट गंभीरता से समझना होगा।
साफ पानी कोई सुविधा नहीं, हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है। जिम्मेदारों पर कार्यवाही होनी चाहिए।