देहरादून, 15 मई 2026— उत्तराखंड के पहले से कलंकित भूमि प्रशासन की छवि पर एक और बड़ा झटका लगा है। विकासनगर सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में जिला मजिस्ट्रेट सविन बंसल द्वारा 4 मई को की गई आकस्मिक जांच में स्टाम्प ड्यूटी चोरी, अवैध रजिस्ट्री, दस्तावेजों में हेराफेरी और प्रतिबंधित भूमि पर अदालती आदेशों के उल्लंघन का बड़ा घोटाला सामने आया है। यह छापा न केवल अलग-अलग अनियमितताओं को उजागर करता है, बल्कि रजिस्ट्री अधिकारियों, वकीलों, प्रॉपर्टी डीलरों और भूमि माफिया के बीच गठजोड़ से चले आ रहे सिस्टमिक सिस्टम को भी बेनकाब करता है।डीएम बंसल ने सब-रजिस्ट्रार अपूर्व सिंह को निलंबित करने की सिफारिश की है और अन्य के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा की है।
प्रारंभिक जांच में 2018 से 2025 तक के संदिग्ध मूल दस्तावेज, बिना उचित प्रक्रिया के 25 रजिस्ट्रीज का डंप, गोल्डन फॉरेस्ट से जुड़ी प्रतिबंधित भूमि पर लगभग 150 अवैध रजिस्ट्री और सेक्शन 47-ए के तहत 47 स्टाम्प ड्यूटी चोरी के मामले सामने आए हैं, जिनसे राज्य को करोड़ों रुपये का राजस्व नुकसान हुआ है।यह घटना कोई दुर्लभ मामला नहीं है। यह देहरादून में सरकारी भूमि, टी एस्टेट भूमि, गोल्डन फॉरेस्ट भूमि और उत्तराखंड के अन्य क्षेत्रों में हुए फर्जी रजिस्ट्री घोटालों की कड़ी को और मजबूत करती है। बार-बार दोहराई जा रही इन घटनाओं से सिस्टम की अक्षमता, जानबूझकर लापरवाही और शक्तिशाली “मिलीभगत” का पता चलता है।
विकासनगर छापे में क्या मिला?
4 मई 2026 को डीएम सविन बंसल ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर पारदर्शिता अभियान के तहत विकासनगर सब-रजिस्ट्रार कार्यालय का अचानक दौरा किया।
**मुख्य खुलासे:**- **हेराफेरी वाले रिकॉर्ड**: 2018, 2024 और 2025 के मूल विक्रय दस्तावेज (विलिख) संदिग्ध हालत में बिखरे पड़े मिले। कई रजिस्टर्ड दस्तावेज महीनों-वर्षों से लंबित थे।-
**अवैध रजिस्ट्री डंप**: 25 रजिस्ट्री बिना उचित प्रक्रिया के “डंप” अवस्था में पाई गईं।-
**गोल्डन फॉरेस्ट उल्लंघन**: हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से प्रतिबंधित लगभग 150 भूमि पर रजिस्ट्री।-
**स्टाम्प ड्यूटी चोरी**: 47 मामले, जिनसे करोड़ों का नुकसान।- **रिकॉर्ड प्रबंधन में गंभीर लापरवाही**।डीएम की टीम ने दस्तावेज जब्त किए और वर्तमान व पूर्व सब-रजिस्ट्रारों की जांच शुरू कर दी गई है। राज्य सरकार को विस्तृत रिपोर्ट भेजी जा रही है। डीएम बंसल ने कहा, “प्रशासन जीरो टॉलरेंस के साथ काम कर रहा है… पारदर्शी और जवाबदेह शासन हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।”
ऐतिहासिक संदर्भ/पूर्व के मामले: उत्तराखंड में घोटालों का पैटर्नउत्तराखंड की भूमि अभिलेख प्रणाली वर्षों से फ्रॉड का अखाड़ा बनी हुई है। पहाड़ी भूगोल, उत्तर प्रदेश से विरासत में मिली जटिल राजस्व व्यवस्था, 2000 के बाद तेज शहरीकरण और देहरादून-मसूरी जैसे क्षेत्रों में प्रॉपर्टी की मांग ने इसे और बढ़ावा दिया।
गोल्डन फॉरेस्ट घोटाला (1990 के दशक से जारी): भारत के सबसे बड़े निवेश घोटालों में से एक। गोल्डन फॉरेस्ट इंडिया लिमिटेड और संबंधित कंपनियों ने सैकड़ों हेक्टेयर भूमि (देहरादून-मसूरी क्षेत्र) हासिल की, लेकिन भूमि सीलिंग कानूनों का उल्लंघन किया। लाखों निवेशकों को गुमराह कर प्लॉट बेचे गए। सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए संपत्तियां नीलाम करने के आदेश दिए और ट्रांसफर पर सख्त प्रतिबंध लगाया, फिर भी अवैध रजिस्ट्री जारी हैं।
2023 देहरादून फर्जी रजिस्ट्री घोटाला: सीएम धामी के आकस्मिक दौरे के बाद उजागर। एसआईटी जांच में 400 करोड़ से अधिक की फर्जी रजिस्ट्री सामने आईं, मुख्यतः टी एस्टेट (आर्केडिया ग्रांट) और सरकारी/सीलिंग भूमि पर। जाली दस्तावेज, बदली स्याही, चिपकाए पन्ने, चोरी के इंडेक्स रजिस्टर पाए गए। वकील कमल वीरमानी समेत कई गिरफ्तार। ईडी ने 2024 में भूमि माफिया, रजिस्ट्री कर्मचारियों और बिल्डरों पर छापे मारे।**टी एस्टेट और सरकारी भूमि फ्रॉड**: आर्केडिया ग्रांट समेत कई टी एस्टेटों पर अतिक्रमण और अवैध बिक्री आम। सरकारी, वन और पंचायती भूमि को निजी दिखाकर रजिस्ट्री की जाती है। एक ही भूमि को कई लोगों को बेचने की घटनाएं आम हैं।
**अन्य क्षेत्र**: ऋषिकेश, हरिद्वार और हल्द्वानी समेत कुमाऊं- गढ़वाल में भी समान समस्याएं।
**कारण**:- मैनुअल/खंडित रिकॉर्ड → आसान हेराफेरी- कमजोर सत्यापन- रजिस्ट्री स्टाफ, वकील, डीलर, पटवारी और राजनीतिक संरक्षण का नेटवर्क- उच्च-स्तरीय राजनीतिक माफिया द्वारा पूछताछ को दबाया जाना
मानवीय और आर्थिक लागत
पीड़ितों में बाहरी राज्य/एनआरआई खरीदार, मूल मालिक (वृद्ध और किसान) और राज्य सरकार शामिल। हजारों करोड़ की विवादित संपत्तियां मुकदमेबाजी बढ़ाती हैं, निवेशकों का विश्वास तोड़ती हैं और विकास बाधित करती हैं। पर्यटन और रियल एस्टेट को नुकसान, पर्यावरणीय क्षति भी होती है।
मूल कारण
अक्षमता, मिलीभगत और दंडमुक्तिसरकारी भूमि को **डिमार्केट किया जा सकता है**। खसरा-खाता नंबर, ड्रोन, जीआईएस और सैटेलाइट इमेजरी से आसानी से पहचान संभव है। फिर भी फ्रॉड जारी है क्योंकि:1. जानबूझकर लापरवाही
2. मिलीभगत (मिलीभगत)
3. राजनीतिक संरक्षण
4. सिस्टमिक खामियां
5. न्यायिक देरी
कैसे हो समाधान: व्यापक सुधार एजेंडा
#### 1. विशेष डिजिटाइज्ड लैंड बैंक- **उत्तराखंड स्पेशल लैंड बैंक** बनाया जाए, पूर्णतः डिजिटाइज्ड और ब्लॉकचेन पर आधारित।- सभी राजस्व अभिलेखों (खसरा, खाता, म्यूटेशन) का स्कैनिंग और जियो-टैगिंग।
– रियल-टाइम वेरिफिकेशन पोर्टल: रजिस्ट्री से पहले ऑनलाइन टाइटल सर्च अनिवार्य।- जीआईएस और ड्रोन मैपिंग: संवेदनशील क्षेत्रों का वार्षिक सर्वे।- समयसीमा: देहरादून-हरिद्वार में 12 महीने, पूरे राज्य में 3 वर्ष।
2. मजबूत संस्थागत तंत्र– स्वतंत्र लैंड विजिलेंस सेल (सीएम या सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज के अधीन)।- भूमि फ्रॉड के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट (6-12 महीने में निपटान)।- कठोर सजाएं: न्यूनतम 7-10 वर्ष जेल + जुर्माना + संपत्ति जब्ती।- व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन और इनाम।
3. रजिस्ट्री कार्यालय सुधार– बायोमेट्रिक + आधार लिंक्ड रजिस्ट्री + वीडियो रिकॉर्डिंग।- हाई-वैल्यू भूमि पर तहसीलदार द्वारा फिजिकल वेरिफिकेशन अनिवार्य।- एआई/एमएल टूल्स से अनियमितताएं पकड़ना।- स्टाफ रोटेशन और नियमित ऑडिट।
4. जवाबदेही और नेटवर्क तोड़ना- शिकायतों पर 30 दिन में पूछताछ अनिवार्य।- राजस्व कर्मचारियों की संपत्ति जांच।- राजनीतिक संरक्षण समाप्त।- ग्राम सभा की भूमिका और जागरूकता अभियान।
5. तकनीकी क्षमता निर्माण– सभी कर्मचारियों का प्रशिक्षण।- आम जनता के लिए लैंड स्टेटस ऐप।- राष्ट्रीय डेटाबेस (SVAMITVA आदि) से एकीकरण।
6. पीड़ित राहत और बहाली– फर्जी रजिस्ट्री रद्द करने के लिए विशेष ट्रिब्यूनल।- जब्त संपत्तियों से मुआवजा फंड।- 2010 के बाद की सभी गोल्डन फॉरेस्ट रजिस्ट्री की समीक्षा।
7. दीर्घकालिक नीति- भूमि सीलिंग और वन कानूनों का सख्त क्रियान्वयन।- पारदर्शी REITs और संगठित रियल एस्टेट को बढ़ावा।- स्वतंत्र संस्था द्वारा वार्षिक “लैंड गवर्नेंस रिपोर्ट”।
### कार्यान्वयन की चुनौतियां
प्रतिरोध अपेक्षित है। सफलता के लिए सीएम स्तर की निगरानी, लैंड कमिटी, न्यायपालिका की भूमिका और नागरिक समाज का दबाव जरूरी है। केंद्र सरकार का डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) से भी सहयोग आवश्यक।
आगे की आवश्यकता – यह घोटाला एक बड़े सुधार का अवसर है। उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता और विकास क्षमता के साथ भ्रष्ट भूमि व्यवस्था नहीं afford कर सकता। पूर्ण डिजिटाइज्ड स्पेशल लैंड बैंक, जवाबदेही और तकनीकी सुधारों से राज्य भूमि प्रशासन में मॉडल बन सकता है।डीएम बंसल की छापे और सीएम की जीरो टॉलरेंस नीति सकारात्मक कदम हैं। लेकिन बिना गहरी संरचनात्मक सुधार के ऐसी घटनाएं दोहराती रहेंगी। उत्तराखंड के लोगों को पारदर्शी शासन, संरक्षित सरकारी भूमि, सुरक्षित मालिकाना हक और दोषियों को सजा का हक है।
लेकिन बार बार एक ही तरह के मामलों का आना गंभीर प्रश्न करता है कि आखिर किस की शह पर ये अवैध कार्य प्रशासन द्वारा ही किए जा रहे थे और कई वर्षों से यह कार्य हो रहा है। अगर डीएम छापा नहीं मारते तो क्या यू ही यह चलता रहता? अब तक न ही अन्य प्रशासन या राजस्व विभाग को इसकी भनक लगी या फिर राजस्व विभाग ही खुद संलिप्त है?
इसका एक मतलब यह भी है कि डीएम भी इतने समय से इसे पकड़ नहीं पाए, तो पूर्व के जिलाधिकारीयो की नाक के नीचे ये सब चल रहा था, पर किसी ने कभी एक्शन नहीं लिया, तो क्या उनकी भी संलिप्तता रही होगी? संलिप्तता नहीं थी तो अवैध कार्य को चेक करना भी उनकी जिम्मेदारी थी, राजस्व विभाग के अधिकारियों को जिम्मेदारी थी, जो साफ डिरेलिक्शन ऑफ ड्यूटी है, अथवा कर्तव्य से विमुखता है, और कार्यवाही योग्य है, जिसमें विकासनगर रजिस्ट्रार के साथ ही राजस्व विभाग व अन्य जिम्मेदारों को भी अपराधी बनाया जाना चाहिए।
जिस प्रकार के मामले और घोटाले लगातार देश में सामने आ रहे हैं उससे तो लगता है कि प्रशासन, अधिकारी और नेताओं का गठजोड़ पूरे देश में एक ही नेटवर्क के तहत कार्य कर रहा है और दीमक की तरह पूरे देश को निचोड़ रहा है। और कोई भी संस्था ऐसी नहीं है जो इन कार्यों पर नजर रखे, जिम्मेदार अधिकारी अगर करप्ट निकले तो फिर सिस्टम लूट ही जाएगा, ऐसा ऐसे मामलों से साफ प्रतीत होता है।
