सीवर और पेयजल के दूषित होने के बाद बीमारी का प्रकोप, मौतें और सैकड़ों लोग प्रभावित; अब कार्रवाई की जद में जल संस्थान और पेयजल निगम के अधिकारी
देवभूमि के लोग | विशेष रिपोर्ट
नैनीताल जिले के ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में दूषित पेयजल से फैले स्वास्थ्य संकट ने अब सरकारी जवाबदेही का बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। बीमारी फैलने, लोगों के अस्पताल पहुंचने और मौतों के बाद उत्तराखंड शासन ने जल संस्थान और पेयजल निगम के कई अधिकारियों को निलंबित किया है।
21 सितंबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड जल संस्थान के तीन और पेयजल निगम के तीन अधिकारियों सहित कुल छह अधिकारियों पर प्रथम दृष्टया लापरवाही के आरोप में निलंबन की कार्रवाई की गई है। कार्रवाई में जल स्रोतों की सफाई, पेयजल गुणवत्ता की जांच तथा प्रभावित क्षेत्र में समय पर कार्रवाई में कथित लापरवाही को आधार बताया गया है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या छह अधिकारियों का निलंबन ही उन परिवारों के लिए पर्याप्त जवाब है, जिन्होंने अपने लोगों को खोया है?
मौतों से पहले क्या हो रहा था?
ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में दूषित पानी के कारण पीलिया, टाइफाइड और डायरिया जैसे जलजनित रोगों के मामले सामने आए। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अधिकारियों ने जल स्रोत में सीवर के पानी के मिश्रण की बात स्वीकार की थी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि समय रहते सीवर और पेयजल पाइपलाइनों की मरम्मत होती तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती।
हाईकोर्ट के समक्ष पेश जांचों ने भी गंभीर स्थिति उजागर की। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा लिए गए शुरुआती 10 नमूनों में पानी गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरा और कुछ नमूनों में मानव या पशु मल-मूत्र से प्रदूषण की पुष्टि बताई गई। प्रभावित क्षेत्र में लगभग 200 मामलों का उल्लेख भी अदालत के समक्ष हुआ।
बाद की रिपोर्टों में प्रभावित लोगों की संख्या 250 से अधिक बताए जाने की जानकारी सामने आई।
और फिर हुई मौतें
इस संकट की सबसे गंभीर परिणति लोगों की मौत के रूप में सामने आई। एक छात्र और एक महिला की उपचार के दौरान मौत की पुष्टि रिपोर्टों में हुई। बाद की रिपोर्ट में मृतकों की संख्या तीन तक पहुंचने की जानकारी दी गई।
इन मौतों को केवल “बीमारी से हुई मौत” कहकर मामला समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि जांच में यह स्थापित होता है कि सरकारी पेयजल व्यवस्था में ऐसी खामी थी जिसे समय रहते रोका जा सकता था, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि किस स्तर पर चेतावनी या शिकायत के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने भी उठाई थी लापरवाही पर उंगली
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हाईकोर्ट ने अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में बुलाया और मुख्य सचिव से जवाब मांगा। अदालत ने प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षित पानी, पानी के नमूनों की जांच, उपचार और स्थायी समाधान के निर्देश दिए।
अदालत के सामने यह सवाल भी आया कि जब एक तरफ सरकारी प्रयोगशाला की रिपोर्ट पानी को ठीक बता रही थी, वहीं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नमूनों में पानी दूषित पाया गया। यह विरोधाभास स्वयं स्वतंत्र जांच की जरूरत को रेखांकित करता है।
अब असली सवाल: जिम्मेदार कौन?
यह तय करना कि किसी अधिकारी की लापरवाही सीधे तौर पर किसी व्यक्ति की मौत का कानूनी कारण बनी, जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही संभव है।
लेकिन प्रशासनिक जवाबदेही के स्तर पर कई सवालों के जवाब जरूरी हैं—
1. पेयजल स्रोत की नियमित निगरानी कौन कर रहा था?
2. सीवर और पेयजल पाइपलाइन के संभावित रिसाव या क्रॉस-कनेक्शन की जानकारी किसे थी?
3. पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच कितनी बार हुई?
4. स्थानीय लोगों की शिकायतों पर कब-कब कार्रवाई की गई?
5. दूषित पानी की आशंका सामने आने के बाद सुरक्षित वैकल्पिक पानी की व्यवस्था में देरी क्यों हुई?
6. क्या केवल फील्ड स्तर के अधिकारी जिम्मेदार थे या निगरानी और पर्यवेक्षण के उच्च स्तर की भी जांच होगी?
7. क्या विभागीय रिकॉर्ड, पानी के पुराने नमूने, शिकायत रजिस्टर और पाइपलाइन/सीवर निरीक्षण रिपोर्टों की स्वतंत्र जांच होगी?
निलंबन से आगे की कार्रवाई जरूरी क्यों?
निलंबन दंड की अंतिम अवस्था नहीं, बल्कि कई मामलों में जांच के दौरान की जाने वाली प्रशासनिक कार्रवाई होती है।
इसलिए अब सरकार के सामने असली परीक्षा यह है कि विभागीय जांच कितनी निष्पक्ष और तथ्यात्मक होती है।
यदि जांच में गंभीर कर्तव्य-चूक प्रमाणित होती है तो नियमों के अनुसार आगे की विभागीय कार्रवाई का सवाल उठेगा। और यदि उपलब्ध साक्ष्य किसी आपराधिक कृत्य या अन्य कानूनी उल्लंघन की ओर संकेत करते हैं, तो संबंधित कानून के तहत कार्रवाई का प्रश्न भी अलग से देखा जाना चाहिए।
सवाल सिर्फ छह अधिकारियों का नहीं, पूरी व्यवस्था का है
ज्योलीकोट की घटना ने एक गंभीर कमजोरी सामने रखी है—पेयजल जैसी मूलभूत सरकारी सेवा में निगरानी तंत्र कितना प्रभावी है?
आज छह अधिकारी निलंबित हैं। कल विभागीय जांच किसी और अधिकारी की जिम्मेदारी तय कर सकती है। लेकिन अगर पाइपलाइन, सीवर, जलस्रोत, सैंपलिंग और शिकायत-निवारण की पूरी व्यवस्था में संरचनात्मक खामी है, तो केवल कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई करके समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं होगी।
सरकार को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि—
किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी थी?
कब शिकायत मिली?
कब निरीक्षण हुआ?
किस तारीख को पानी का नमूना लिया गया?
रिपोर्ट में क्या आया?
कब कार्रवाई का आदेश हुआ?
और दूषित पानी की आपूर्ति पूरी तरह कब रोकी गई?
इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि ज्योलीकोट में हुई त्रासदी केवल एक आकस्मिक घटना थी या लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक चूक का परिणाम।
सबसे बड़ा सवाल
लोगों की जान जाने के बाद निलंबन करना कार्रवाई जरूर है, लेकिन क्या यह जवाबदेही की अंतिम मंजिल हो सकती है?
ज्योलीकोट के मृतकों के परिवारों और प्रभावित लोगों को सिर्फ निलंबन की खबर नहीं, बल्कि सच्चाई, जिम्मेदारी, राहत और भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न होने की गारंटी चाहिए। और क्या इतने लोगों की मौत की सजा सिर्फ कुछ महीने का सस्पेंशन है? क्या जिम्मेदारों का टर्मिनेशन कर मौतों पर FIR नहीं होनी चाहिए?
अब निगाहें विभागीय जांच, हाईकोर्ट की निगरानी और सरकार द्वारा तय की जाने वाली आगे की जिम्मेदारी पर हैं।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अधिकारी निलंबित हुए या नहीं—सवाल यह है कि व्यवस्था में वह चूक आखिर हुई कैसे, और उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया?