गैरसैंण में यूकेडी का शक्ति प्रदर्शन: स्थायी राजधानी की मांग पर युवाओं ने भरी हुंकार, संघर्ष के हर मोर्चे पर दिखा जोश
भराड़ीसैंण विधानसभा घेराव को लेकर सड़कों पर उतरा उत्तराखंड क्रांति दल; गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने, क्षेत्रीय अस्मिता और उत्तराखंड के हक-हकूकों की लड़ाई को फिर केंद्र में लाने की कोशिश।
गैरसैंण की धरती पर एक बार फिर उत्तराखंड की स्थायी राजधानी का सवाल सियासी बहस के केंद्र में है। 27 अक्टूबर को भराड़ीसैंण विधानसभा घेराव के आह्वान के साथ उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) ने अपनी क्षेत्रीय राजनीति और आंदोलनकारी तेवरों को सामने रखा। विधानसभा सत्र के पहले दिन प्रस्तावित इस प्रदर्शन के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग जिलों में जनसंपर्क, बैठकें और रैलियां कर गैरसैंण कूच की तैयारी की।
यूकेडी के लिए यह केवल विधानसभा तक पहुंचने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस मूल सवाल को फिर उठाने का प्रयास है, जिसके साथ उत्तराखंड राज्य आंदोलन की भावनाएं जुड़ी रही हैं—आखिर जिस पहाड़ी राज्य की परिकल्पना जनता ने अपने संघर्ष और बलिदान से की थी, उसकी स्थायी राजधानी का प्रश्न आज भी अनसुलझा क्यों है?
युवाओं के जोश ने आंदोलन को दिया नया तेवर
इस पूरे अभियान में यूकेडी के युवा कार्यकर्ताओं की सक्रियता खास चर्चा का विषय बनी। गैरसैंण कूच की तैयारियों से लेकर जिला मुख्यालयों पर गर्जना रैलियों तक युवाओं ने संगठन की आवाज बुलंद करने की कोशिश की। रुद्रप्रयाग में केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती की मौजूदगी में निकाली गई गर्जना रैली के बाद कार्यकर्ता विधानसभा घेराव में शामिल होने के लिए गैरसैंण रवाना हुए।
युवा कार्यकर्ताओं के उत्साह के पीछे केवल राजनीतिक भागीदारी नहीं, बल्कि रोजगार, पलायन, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार और पहाड़ों में बुनियादी सुविधाओं जैसे सवाल भी हैं। पहाड़ का युवा अपने भविष्य को लेकर जवाब चाहता है। वह चाहता है कि विकास की योजनाएं केवल मैदानी शहरों तक सीमित न रहें, बल्कि दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों तक भी रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन की सुविधाएं पहुंचें।
यूकेडी की युवा इकाई के सामने इस जोश को एक संगठित जनआंदोलन में बदलने की चुनौती भी है। युवाओं की भागीदारी तभी निर्णायक बन सकती है, जब आंदोलन के साथ स्पष्ट मांगें, समयबद्ध लक्ष्य और लगातार जनसंपर्क भी जुड़ें।
स्थायी राजधानी का सवाल—भावना से आगे फैसले की दरकार
गैरसैंण को उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बनाने की मांग राज्य गठन के बाद से क्षेत्रीय राजनीति का प्रमुख मुद्दा रही है। यूकेडी लगातार इस मांग को उठाता रहा है और उसका कहना है कि गैरसैंण को राजधानी बनाने के प्रश्न पर समझौता नहीं किया जा सकता।
राजधानी का प्रश्न केवल विधानसभा भवन या सरकारी कार्यालयों तक सीमित नहीं है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच, स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार के अवसर और विकास के विकेंद्रीकरण जैसे व्यापक मुद्दे जुड़े हैं।
हालांकि, स्थायी राजधानी की मांग को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ स्पष्ट कार्ययोजना, प्रशासनिक तैयारी और वित्तीय व्यवस्था पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक है।
सरकार के सामने यूकेडी की चुनौती5
27 अक्टूबर के विधानसभा घेराव कार्यक्रम से पहले गैरसैंण में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने की खबरें भी सामने आईं। विधानसभा सत्र के दौरान सदन के भीतर विपक्ष और सदन के बाहर विभिन्न संगठनों के प्रदर्शन से राजनीतिक माहौल गरमाने की संभावना जताई गई थी।
ऐसे माहौल में यूकेडी के सामने अपनी मांगों को प्रभावी ढंग से उठाने के साथ यह साबित करने की चुनौती है कि क्षेत्रीय राजनीति केवल विरोध प्रदर्शनों तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य की समस्याओं के ठोस समाधान का विकल्प भी बन सकती है।
युवा शक्ति को संगठित करना, गांवों तक पहुंच बढ़ाना, बेरोजगार युवाओं की समस्याओं को आंदोलन से जोड़ना और भू-कानून तथा मूल निवास जैसे क्षेत्रीय मुद्दों पर स्पष्ट नीति सामने रखना संगठन के लिए महत्वपूर्ण होगा।
जनभावनाओं को राजनीतिक ताकत में बदलने की परीक्षा
उत्तराखंड क्रांति दल का इतिहास राज्य आंदोलन की स्मृतियों और क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़ा है। लेकिन जनभावनाओं को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलना उसके सामने लंबे समय से एक चुनौती बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषणों में भी पार्टी के सामने अपने जनाधार को मजबूत करने और क्षेत्रीय मुद्दों को चुनावी समर्थन में बदलने की जरूरत रेखांकित की गई है।
गैरसैंण में युवा कार्यकर्ताओं की हुंकार इस लिहाज से महत्वपूर्ण है। यदि यह ऊर्जा गांवों, कस्बों, बेरोजगार युवाओं, किसानों और पलायन से प्रभावित परिवारों के सवालों से लगातार जुड़ती है, तो यूकेडी अपने आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाने की कोशिश कर सकता है।
गैरसैण पर फैसला लेगी सरकार?
गैरसैंण का सवाल उत्तराखंड की राजनीतिक चेतना से जुड़ा हुआ है। यूकेडी ने विधानसभा घेराव के आह्वान के जरिए इस मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। अब इस अभियान का वास्तविक प्रभाव इस बात से आंका जाएगा कि आंदोलन से उठे सवालों पर सरकार क्या जवाब देती है और यूकेडी अपने युवा जोश को कितने समय तक संगठित जनसंघर्ष में बदल पाता है। इस अवसर पर चंपावत के प्रमुख नेता दीवान सिंह रजवार और नैनीताल से प्रताप सिंह चौहान और उत्तराखंड के फायरब्रांड नेता आशीष नेगी पूरे दलबल के साथ मैदान में डटे हुवे है।