साल में कुछ दिन की विधानसभा से कैसे होगी सरकार की पूरी जवाबदेही? लोकसभा- राज्यसभा चली 65 दिन तो उत्तराखंड विधानसभा केवल 10 दिन
2024 में राज्य विधानसभा करीब 10 दिन ही बैठी, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर भी राज्य विधानसभाओं के औसत कार्यदिवस बेहद कम हैं। सवाल यह है कि जब विधायकों को हर महीने वेतन-भत्ते मिलते हैं तो जनता के सवालों पर सदन को नियमित रूप से क्यों नहीं बैठना चाहिए?
देहरादून/ नैनीताल –भानु प्रताप सिंह/- उत्तराखंड को बने 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। राज्य की विधानसभा ने इस दौरान 500 से अधिक विधेयक पारित किए हैं और संसदीय लोकतंत्र की संस्थागत यात्रा पूरी की है। नवंबर 2000 में राज्य के गठन के बाद विधानसभा की पहली बैठक 12 जनवरी 2001 को हुई थी। आज उत्तराखंड की एकसदनीय विधानसभा में 70 सदस्य हैं।
लेकिन रजत जयंती के उत्सव के बीच विधानसभा के कामकाज के दिनों का सवाल गंभीर है। क्या राज्य के सामने समस्याएं इतनी कम हैं कि विधानसभा को साल में कुछ ही दिन बैठने की जरूरत पड़े?
यह सवाल केवल सरकार या विपक्ष का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जनता के लोकतांत्रिक अधिकार और शासन की जवाबदेही का है।
1. विधानसभा का असली काम क्या है?
विधानसभा केवल कानून पास करने की संस्था नहीं है। इसके कम-से-कम तीन प्रमुख काम हैं—
- कानून बनाना और पुराने कानूनों की समीक्षा करना
- सरकार से सवाल पूछना और उसे जवाबदेह बनाना
- राज्य के बजट और जनता के पैसे के खर्च की जांच करना
इसके अलावा विधायक प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण, स्थगन प्रस्ताव, शून्यकाल, समितियों और बजट चर्चा के माध्यम से अपने क्षेत्रों की समस्याएं सदन में उठाते हैं।
यानी विधानसभा लोकतंत्र का वह मंच है जहां सरकार को यह बताना पड़ता है कि सड़क क्यों टूटी, अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं हैं, स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं हैं, बेरोजगारी क्यों है, पलायन क्यों हो रहा है, आपदा के बाद पुनर्वास क्यों नहीं हुआ और सरकारी योजनाओं का पैसा कहां खर्च हुआ।
इसलिए विधानसभा का पर्याप्त समय तक चलना केवल विधायकों का अधिकार नहीं, जनता का अधिकार है।
2. उत्तराखंड विधानसभा कितने दिन चलती है?
यहीं सबसे बड़ा सवाल सामने आता है।
PRS Legislative Research के अनुसार 2024 में देश की राज्य विधानसभाएं औसतन केवल 20 दिन बैठीं। उत्तराखंड उन राज्यों में था जहां विधानसभा सिर्फ लगभग 10 दिन बैठी। उसी वर्ष राज्य विधानसभाओं ने औसतन करीब 100 घंटे काम किया।
उत्तराखंड में स्थिति पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं।
2020 में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 2001 से उत्तराखंड विधानसभा औसतन केवल 16 दिन प्रतिवर्ष बैठी थी। उस समय सबसे अधिक 23 बैठकें 2003 में और सबसे कम सात बैठकें 2004 में हुई थीं।
2024 में नेता प्रतिपक्ष ने भी विधानसभा के कार्यदिवस बढ़ाने की मांग करते हुए कहा था कि पिछले वर्षों में सदन की बैठकें 8-10 दिन तक सीमित रही हैं।
3. 2022 से 2025 तक का रिकॉर्ड क्या बताता है?
उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा के सत्रों के उपलब्ध आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं।
PRS के रिकॉर्ड में 2022 से 2025 तक विधानसभा के कई छोटे सत्र दर्ज हैं। उदाहरण के लिए—
- मार्च 2022
- जून 2022
- नवंबर 2022
- मार्च/सितंबर 2023
- फरवरी/अगस्त 2024
- फरवरी/अगस्त/नवंबर 2025
इन सत्रों में कई बार बहुत कम दिनों में विधायी काम पूरा किया गया। 2022 के नवंबर सत्र में तो पांच दिन के लिए निर्धारित सत्र केवल दो दिन में समाप्त हो गया और 13 विधेयक पेश एवं पारित किए गए।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—
क्या दो दिन में 13 विधेयकों को पर्याप्त समय देकर पढ़ना, विशेषज्ञों से समझना, विपक्ष के सुझाव लेना और जनता के हितों के प्रभाव का परीक्षण करना संभव है?
यह प्रश्न किसी पार्टी विशेष के खिलाफ नहीं है। यह विधायी गुणवत्ता का प्रश्न है।
4. 2025 में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं हुई
उपलब्ध सत्र-आंकड़ों के अनुसार 2025 में—
- फरवरी का सत्र — 5 दिन
- अगस्त का सत्र — 2 दिन
- नवंबर का विशेष सत्र — 3 दिन
यानी कुल मिलाकर लगभग 10 बैठक दिवस।
PRS के रिकॉर्ड में 2025 के फरवरी और अगस्त सत्रों में क्रमशः 13 और 9 विधेयक पारित होने दर्ज हैं, जबकि नवंबर के विशेष सत्र में अलग तरह का विधायी/विशेष एजेंडा था।
इतने कम दिनों में राज्य के 13 जिलों, 70 विधानसभा क्षेत्रों, पहाड़ और मैदान, कृषि, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन, सड़क, आपदा, वन, जल, भूमि और वित्त जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा कैसे होगी?
5. 2026 का बजट सत्र भी सिर्फ पांच दिन
2026 में प्रस्तावित बजट सत्र 9 से 13 मार्च तक पांच दिन का रखा गया था।
विपक्ष ने इसे अपर्याप्त बताते हुए कम-से-कम 15 दिन के सत्र की मांग की थी। सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि सत्र की अवधि उपलब्ध विधायी कार्य यानी Business के आधार पर तय होती है।
यही बहस विधानसभा के भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
क्या विधानसभा में काम नहीं है या सरकार पर्याप्त विधायी काम तैयार नहीं कर रही?
अगर राज्य में काम है—तो चर्चा के लिए समय चाहिए।
अगर काम नहीं है—तो यह भी सवाल विधानसभा में पूछा जाना चाहिए कि सरकार ने पूरे वर्ष कानून, नीतियां और जनहित के प्रस्ताव क्यों तैयार नहीं किए?
6. संविधान क्या कहता है?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है।
संविधान विधानसभा को साल में 60 दिन बैठने का अनिवार्य संवैधानिक आदेश नहीं देता।
संविधान के अनुच्छेद 174 के अनुसार विधानसभा के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता।
यानी संवैधानिक न्यूनतम व्यवस्था यह है कि विधानसभा कम-से-कम इतनी नियमितता से बैठे कि दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक अंतर न हो।
लेकिन कितने दिन बैठना चाहिए, यह अलग सवाल है।
उत्तराखंड की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली, 2005 और उससे जुड़ी संसदीय परंपराओं में लंबे विधायी कार्यदिवस की अपेक्षा को लेकर चर्चा होती रही है। 2024 में संसदीय कार्य मंत्री ने भी माना था कि आदर्श स्थिति में तीन सत्रों को मिलाकर लगभग 60 दिन सदन चलना चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष ने भी अधिक समय तक सदन चलाने की आवश्यकता स्वीकार की थी, हालांकि सरकार की ओर से पर्याप्त Business होने की दलील दी गई।
इसलिए 60 दिन को संविधान की बाध्यकारी न्यूनतम सीमा बताना सही नहीं होगा, लेकिन इसे एक मजबूत संसदीय लक्ष्य के रूप में जरूर देखा जा सकता है।
7. आखिर विधानसभा के दिन कम क्यों होते हैं?
इसके कई कारण हो सकते हैं।
पहला—सरकार के पास कम विधायी Business होने का तर्क
सरकारें अक्सर कहती हैं कि जब पर्याप्त विधेयक या सरकारी काम नहीं है तो लंबे सत्र की आवश्यकता नहीं।
लेकिन इसके सामने दूसरा प्रश्न खड़ा होता है—
क्या विधानसभा का काम सिर्फ विधेयक पास करना है?
नहीं।
प्रश्नकाल, विभागीय समीक्षा, बजट चर्चा, सरकारी योजनाओं की समीक्षा, समितियों के प्रतिवेदन और विपक्ष के सवाल भी विधानसभा के मूल कार्य हैं।
दूसरा—राजनीतिक टकराव
कई बार विपक्ष सरकार पर आरोप लगाता है कि छोटे सत्र रखकर सरकार कठिन सवालों से बचना चाहती है।
दूसरी ओर सरकारें विपक्ष पर आरोप लगाती हैं कि हंगामे के कारण सदन का समय खराब होता है।
दोनों पक्षों को आत्ममंथन करना होगा।
सरकार की जिम्मेदारी है कि पर्याप्त समय दे और विपक्ष की जिम्मेदारी है कि उपलब्ध समय का इस्तेमाल रचनात्मक बहस में करे।
तीसरा—विधायकों की भूमिका सदन से बाहर अधिक दिखाई देती है
आज विधायक अपने क्षेत्र में सड़क, पानी, बिजली, अस्पताल, स्कूल और अन्य समस्याओं के लिए अधिकारियों से मिलते हैं।
लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल अधिकारी से मिलना पर्याप्त नहीं है।
एक क्षेत्र की समस्या यदि पूरे प्रदेश की समस्या है, तो उसे विधानसभा की कार्यवाही का हिस्सा बनना चाहिए।
8. संसद और विधानसभा में क्या अंतर है?
भारत की संसद राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाती है, जबकि विधानसभा राज्य के अधिकार क्षेत्र से जुड़े विषयों पर कानून और बजट से संबंधित कार्य करती है।
संसद
- लोकसभा + राज्यसभा
- राष्ट्रीय कानून
- केंद्रीय बजट
- केंद्र सरकार की जवाबदेही
- राष्ट्रीय नीतियों की समीक्षा
उत्तराखंड विधानसभा
- 70 सदस्य
- एकसदनीय व्यवस्था
- राज्य के विषयों पर कानून
- राज्य का बजट
- मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की जवाबदेही
- राज्य सरकार के विभागों की समीक्षा
इसलिए विधानसभा छोटी संस्था जरूर है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी छोटी नहीं है।
9. संसद कितने दिन बैठती है?
2025 में संसद के तीन प्रमुख सत्र हुए।
सरकारी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2025 में लोकसभा और राज्यसभा—
- बजट सत्र — 26 बैठकें
- मानसून सत्र — 21 बैठकें
- शीतकालीन सत्र — 15 बैठकें
यानी दोनों सदनों ने वर्ष में 62-62 बैठक दिवस किए।
यहां एक महत्वपूर्ण तुलना सामने आती है—
| संस्था | 2025 के उपलब्ध आंकड़े |
|---|---|
| लोकसभा | 62 बैठक दिवस |
| राज्यसभा | 62 बैठक दिवस |
| उत्तराखंड विधानसभा | लगभग 10 बैठक दिवस |
| 2025 राज्य विधानसभाओं का राष्ट्रीय औसत | 24 दिन |
PRS के अनुसार 2025 में देश की राज्य विधानसभाएं औसतन 24 दिन बैठीं—2024 के 21 दिनों के औसत से कुछ सुधार हुआ, लेकिन फिर भी यह संख्या काफी कम है।
उत्तराखंड का रिकॉर्ड इस राष्ट्रीय औसत से भी काफी नीचे दिखाई देता है।
10. लेकिन संसद भी पूरी तरह आदर्श नहीं है
संसद को आदर्श मान लेना भी सही नहीं होगा।
उदाहरण के लिए 2025 के मानसून सत्र में लोकसभा अपने निर्धारित समय का केवल 29% और राज्यसभा लगभग 34% ही काम कर सकी। दो-तिहाई निर्धारित समय व्यवधानों में चला गया।
लेकिन 2025 के शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों ने निर्धारित समय से अधिक काम किया—लोकसभा 103% और राज्यसभा 104%।
इसका मतलब साफ है—
सिर्फ सदन बुलाना पर्याप्त नहीं है; सदन का उत्पादक तरीके से चलना भी जरूरी है।
11. सांसद बनाम विधायक : वेतन और सुविधाओं में कितना अंतर?
यह तुलना करते समय एक बात ध्यान रखना जरूरी है कि MLA का वेतन हर राज्य में अलग होता है, जबकि MP का वेतन केंद्रीय कानून के तहत निर्धारित होता है।
संविधान का अनुच्छेद 106 संसद को और अनुच्छेद 195 राज्य विधानसभाओं को अपने सदस्यों के वेतन-भत्ते कानून द्वारा तय करने का अधिकार देता है।
सांसद—2025 से संशोधित संरचना
2025 में अधिसूचित संशोधन के बाद एक सांसद के लिए—
| मद | राशि |
|---|---|
| मूल वेतन | ₹1,24,000/माह |
| निर्वाचन क्षेत्र भत्ता | ₹87,000/माह |
| कार्यालय खर्च भत्ता | ₹75,000/माह |
| दैनिक भत्ता | ₹2,500 प्रति दिन |
| पूर्व सांसद पेंशन | ₹31,000/माह |
मूल + निर्वाचन क्षेत्र + कार्यालय भत्ते को मिलाकर नियमित मासिक राशि ₹2.86 लाख बैठती है। दैनिक भत्ता इसके अतिरिक्त है।
इसके अलावा सांसदों को आवास, यात्रा, चिकित्सा, संचार आदि की सुविधाएं भी मिलती हैं।
12. उत्तराखंड विधायक : 2024 में बड़ा वेतन-भत्ता संशोधन
उत्तराखंड विधानसभा ने 2024 में उत्तराखंड राज्य विधानसभा विविध (संशोधन) विधेयक पारित किया।
इसमें विधायकों के विभिन्न भत्तों और सुविधाओं में वृद्धि की गई तथा स्वास्थ्य सुविधा के लिए गोल्डन कार्ड/कैशलेस उपचार का प्रावधान किया गया। संशोधन को 1 अप्रैल 2022 से प्रभावी माना गया।
इसके तहत—
- चालक के लिए भत्ता ₹12,000 से बढ़ाकर ₹20,000 प्रतिमाह
- रेलवे कूपन की स्वीकृत राशि में से ₹30,000 नकद
- टेलीफोन सुविधा की सीमा में वृद्धि
- गोल्डन कार्ड/कैशलेस चिकित्सा सुविधा
- कुछ परिस्थितियों में विदेश में उपचार की सुविधा
जैसी सुविधाएं शामिल की गईं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार संशोधन के बाद विधायक का कुल मासिक वेतन-भत्ता पैकेज लगभग ₹4 लाख के आसपास पहुंचता है। हालांकि इसे केवल “वेतन” कहना सही नहीं होगा—इसमें अलग-अलग भत्ते और सुविधाएं शामिल हैं।
13. सवाल वेतन का नहीं, काम के अनुपात का है
विधायक को अच्छा वेतन मिलना अपने आप में गलत नहीं है।
जनप्रतिनिधि को इतना भुगतान होना चाहिए कि वह आर्थिक चिंता से मुक्त होकर जनता के लिए काम कर सके।
लेकिन जनता का सवाल है—
यदि विधायक को हर महीने वेतन मिलता है, तो विधानसभा को पूरे साल में सिर्फ कुछ दिन ही क्यों बैठना चाहिए?
वेतन का मतलब यह नहीं कि विधायक हर दिन सदन में बैठे।
लेकिन लोकतांत्रिक जवाबदेही का अर्थ यह जरूर है कि—
जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि नियमित रूप से सरकार से सवाल पूछने, कानूनों पर बहस करने और बजट की जांच करने के लिए उपलब्ध हो।
14. क्या वेतन को विधानसभा की उपस्थिति से जोड़ देना चाहिए?
यह विचार सुनने में आकर्षक है, लेकिन इसे सावधानी से लागू करना होगा।
क्योंकि विधायक का काम सिर्फ विधानसभा में बैठना नहीं है।
उसे अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी रहना पड़ता है।
इसलिए बेहतर व्यवस्था यह होगी कि—
वेतन काटने के बजाय पारदर्शिता बढ़ाई जाए।
हर विधायक के लिए सार्वजनिक रूप से जारी हो—
- विधानसभा उपस्थिति
- प्रश्न पूछने की संख्या
- कितने प्रश्न स्वीकार हुए
- कितनी बहस में भाग लिया
- निजी विधेयक/प्रस्ताव
- समिति बैठकों में भागीदारी
- क्षेत्रीय मुद्दे कितनी बार उठाए
- कितने आश्वासनों पर सरकार से जवाब मांगा
इससे जनता खुद तय कर सकेगी कि उसका विधायक कितना सक्रिय है।
15. हर महीने कम से कम एक सप्ताह विधानसभा—क्या यह संभव है?
यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव हो सकता है।
“एक सप्ताह—हर महीने विधानसभा”
अगर विधानसभा को महीने में कम-से-कम एक सप्ताह चलाने का लक्ष्य बनाया जाए तो साल में लगभग—
12 सप्ताह = लगभग 60 कार्यदिवस
हो सकते हैं।
यानी यह लक्ष्य उसी लगभग 60 दिनों के आदर्श के करीब होगा जिसकी चर्चा उत्तराखंड में कई बार हुई है।
इस मॉडल का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि विधानसभा को केवल बजट या किसी बड़े विधेयक के समय अचानक बुलाने के बजाय निरंतर निगरानी वाली संस्था बनाया जा सकेगा।
16. हर महीने विधानसभा में क्या-क्या हो?
पहला सप्ताह : जनता और सरकार के सवाल
सोमवार
- प्रश्नकाल
- स्थानीय समस्याएं
- विभागीय जवाब
मंगलवार
- शिक्षा
- स्वास्थ्य
- रोजगार
- पलायन
बुधवार
- सड़क
- परिवहन
- आपदा
- पर्यावरण
- पर्यटन
गुरुवार
- बजट/विभागीय खर्च
- सरकारी योजनाओं की समीक्षा
- CAG रिपोर्ट
शुक्रवार
- विधेयक
- गैर-सरकारी संकल्प
- विशेष चर्चा
- क्षेत्रीय समस्याएं
इस प्रकार विधानसभा “कानून पास करने वाली मशीन” के बजाय “सरकार की लगातार निगरानी करने वाली संस्था” बन सकती है।
17. उत्तराखंड में ऐसे मुद्दे हैं जिन पर महीनों चर्चा हो सकती है
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में विधानसभा का काम और भी महत्वपूर्ण है।
प्रमुख विषय—
पलायन:
गांव खाली क्यों हो रहे हैं?
रोजगार:
स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की नीति कितनी सफल है?
स्वास्थ्य:
दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में डॉक्टर और विशेषज्ञ क्यों नहीं टिकते?
शिक्षा:
कितने स्कूलों में शिक्षक और विषय विशेषज्ञों की कमी है?
सड़क सुरक्षा:
हर वर्ष दुर्घटनाएं क्यों होती हैं और ब्लैक स्पॉट का समाधान क्यों नहीं होता?
आपदा प्रबंधन:
धराली, जोशीमठ, केदारनाथ जैसी घटनाओं से क्या सीखा?
निर्माण में भ्रष्टाचार:
सड़क, पुल और सरकारी भवन बार-बार क्षतिग्रस्त क्यों होते हैं?
वन और पर्यावरण:
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बने?
भूमि कानून:
बाहरी निवेश, स्थानीय अधिकार और पहाड़ की जमीन का संरक्षण कैसे हो?
पर्यटन:
क्या पर्यटन स्थानीय लोगों को आर्थिक लाभ दे रहा है?
कृषि और बागवानी:
पलायन रोकने के लिए पहाड़ की खेती को लाभकारी कैसे बनाया जाए?
इनमें से हर विषय पर केवल एक-दो घंटे की चर्चा पर्याप्त नहीं है।
18. कम दिन चलने वाली विधानसभा का सबसे बड़ा नुकसान किसे?
जनता को।
क्योंकि कम बैठक दिवस का मतलब है—
- कम प्रश्न
- कम जवाब
- कम बहस
- कम विभागीय समीक्षा
- कम बजट चर्चा
- कम विधायी जांच
- कम विपक्षी निगरानी
- कम सार्वजनिक रिकॉर्ड
और अंततः—
कार्यपालिका के पास ज्यादा शक्ति और विधायिका के पास कम समय।
यही लोकतांत्रिक संतुलन के लिए चिंता का विषय है।
19. विधेयक जल्दी पास करना भी लोकतंत्र की गुणवत्ता का सवाल है
2022 में उत्तराखंड विधानसभा ने दो दिन में 13 विधेयक पारित किए थे।
बिल पास करना उपलब्धि हो सकता है, लेकिन कितनी चर्चा हुई, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
किसी विधेयक पर चर्चा के दौरान—
- विशेषज्ञों की राय
- विपक्ष के संशोधन
- जनता पर प्रभाव
- वित्तीय प्रभाव
- संवैधानिक प्रभाव
- प्रशासनिक प्रभाव
पर विचार होना चाहिए।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने कानून पास हुए?
सवाल यह होना चाहिए कि कितने कानून समझकर, चर्चा करके और बेहतर बनाकर पास हुए?
20. सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों की जिम्मेदारी
यह बहस केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होनी चाहिए।
सरकार की जिम्मेदारी:
सत्र पर्याप्त लंबा बुलाए और विपक्ष को बोलने का पर्याप्त अवसर दे।
विपक्ष की जिम्मेदारी:
सदन को बाधित करने के बजाय सवाल और तथ्य के साथ सरकार को घेरें।
विधायकों की जिम्मेदारी:
सदन में उपस्थित रहें, तैयारी करें और अपने क्षेत्र की आवाज उठाएं।
अध्यक्ष की जिम्मेदारी:
सभी पक्षों को समान अवसर और संसदीय अनुशासन दें।
मीडिया की जिम्मेदारी:
सिर्फ हंगामा नहीं, विधायी काम की गुणवत्ता भी रिपोर्ट करे।
21. क्या उत्तराखंड विधानसभा को प्रदर्शन का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड जारी करना चाहिए?
बिल्कुल।
हर वर्ष विधानसभा की वेबसाइट पर एक “जनता का विधानसभा रिपोर्ट कार्ड” होना चाहिए।
जिसमें बताया जाए—
| मानक | सार्वजनिक जानकारी |
|---|---|
| कुल बैठक दिवस | कितने दिन |
| कुल कार्य घंटे | कितने घंटे |
| प्रश्न पूछे गए | संख्या |
| प्रश्नों के जवाब | प्रतिशत |
| विधेयक | कितने |
| विधेयकों पर औसत चर्चा | कितनी देर |
| बजट चर्चा | कितने घंटे |
| समितियों की बैठक | संख्या |
| विधायकों की उपस्थिति | प्रतिशत |
| व्यवधान में गया समय | प्रतिशत |
| विपक्ष के प्रस्ताव | संख्या |
| सरकारी आश्वासन | कितने पूरे |
यह रिपोर्ट कार्ड जनता को बताएगा कि उसका लोकतंत्र वास्तव में कितने घंटे काम कर रहा है।
22. निष्कर्ष : विधायक का वेतन बढ़ सकता है तो विधानसभा का समय क्यों नहीं?
उत्तराखंड आज 25 वर्ष का हो चुका है।
अब विधानसभा को केवल संवैधानिक औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्था के रूप में मजबूत करने का समय है।
विधायकों के वेतन और सुविधाओं में वृद्धि हुई है। सांसदों के वेतन और सुविधाएं भी बढ़ी हैं। लेकिन लोकतंत्र का वास्तविक मूल्य वेतन की राशि से नहीं, जनता के सवालों पर होने वाली बहस से तय होगा।
इसलिए उत्तराखंड के लिए एक नया संसदीय संकल्प जरूरी है—
“हर महीने कम से कम एक सप्ताह विधानसभा”
इससे साल में लगभग 60 कार्यदिवस का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
और यदि 60 दिन तत्काल संभव नहीं हैं तो चरणबद्ध तरीके से—
पहले 30 दिन → फिर 45 दिन → और अंततः 60 दिन।
क्योंकि उत्तराखंड के पास समस्याओं की कमी नहीं है।
कमी अगर है तो उन समस्याओं पर लगातार, तथ्यपूर्ण और जवाबदेह विधायी चर्चा के समय की।
विधानसभा जितनी मजबूत होगी, सरकार उतनी जवाबदेह होगी और लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
एक बड़ा सवाल जनता के सामने
जब एक विधायक को हर महीने वेतन और भत्ते मिलते हैं, तो क्या जनता यह सवाल पूछने का अधिकार नहीं रखती कि उसके विधायक और उसकी विधानसभा साल में कितने दिन उसके सवालों पर काम करते हैं?