पृथ्वीपाल उर्फ प्रीतमदेव और राजमाता जियारानी की कहानी आज भी उत्तराखंड की लोकस्मृति में जीवित, सहारनपुर-हरिद्वार से हल्द्वानी स्थित रानीबाग और पिथौरागढ़-नेपाल का सीधा संबंध।
उत्तराखंड का इतिहास केवल ऊंची पर्वत चोटियों और दुर्गम किलों तक सीमित नहीं है। यह उन राजवंशों की कहानी भी है, जिनका राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव हिमालय से उतरकर तराई और मैदानी इलाकों तक फैला। इन्हीं कथाओं में तत्कालीन राज्य जो सहारनपुर से लेकर बिजनौर तराई होते हुवे पिथौरागढ़ और नेपाल तक फैला था। उनमें राजा पृथ्वीपाल उर्फ प्रीतमदेव और उनकी पत्नी राजमाता जियारानी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। माता जियारानी हल्द्वानी स्थित रानीबाग में निवास करतीं थीं और वहीं उनका मंदिर और चित्र शिला भी स्थित है जहां प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन देशभर से विशेषकर गढ़वाल, कुमाऊं, उत्तर प्रदेश और नेपाल के लोग जागर लगाने जरूर आते हैं।
लोकपरंपराओं और कुछ ऐतिहासिक विवरणों में पृथ्वीपाल को पिथौराशाही नाम से भी जोड़ा जाता है। उनके समय में कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरी सत्ता का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है। पिथौरागढ़ के नाम को पृथ्वीगढ़ से जोड़ने वाली परंपरा भी प्रचलित है। एक ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, पृथ्वीपाल ने पृथ्वीगढ़ नामक किले का निर्माण कराया था। आगे चलकर इसी नाम से पिथौरागढ़ नाम के प्रचलन में आने की मान्यता है।
इस कथा का दूसरा महत्वपूर्ण नाम जियारानी का है। लोकगाथाओं में उन्हें मूल रूप से मौला देवी बताया गया है और उनका संबंध सहारनपुर-हरिद्वार के पुंडीर राजपरिवार से जोड़ा जाता है। पृथ्वीपाल से विवाह के बाद वे कत्यूरी राजपरिवार की राजमाता के रूप में प्रसिद्ध हुईं। उत्तराखंड में आज भी कई घरों पर में माता को जिया नाम से पुकारा जाता है।
धामदेव और राजुला-मालूशाही की लोकगाथा
जियारानी और पृथ्वीपाल से जुड़ी लोकपरंपराओं में उनके पुत्र धामदेव का भी विशेष स्थान है। उत्तराखंड की प्रसिद्ध प्रेमगाथा राजुला-मालूशाही में मालूशाही को राजा धामदेव का पुत्र बताया गया है। राजुला और मालूशाही की प्रेमकथा कुमाऊं ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की लोकस्मृति में बेहद लोकप्रिय है।
धामदेव से जुड़े अनेक जागर उत्तराखंड और नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में गाए जाते हैं। इनमें उनके शौर्य, राजवंश और लोकजीवन से जुड़े प्रसंगों का वर्णन मिलता है। हालांकि राजुला-मालूशाही और धामदेव से संबंधित विवरण मुख्य रूप से लोकगाथाओं और मौखिक परंपराओं पर आधारित हैं, फिर भी ये कथाएं कत्यूरी इतिहास, कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान और हिमालयी समाज की साझा स्मृति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
गढ़वाल, सहारनपुर–हरिद्वार, नेपाल और मैदानी क्षेत्रों से रिश्ते
मध्यकालीन उत्तराखंड में आज जैसी जिला सीमाएं नहीं थीं। अलग-अलग राजवंशों, रियासतों और स्थानीय शक्तियों का प्रभाव समय के साथ बदलता रहता था। गढ़वाल भी लंबे समय तक अनेक छोटी-बड़ी रियासतों में विभाजित रहा। बाद में अजयपाल ने इन रियासतों को एकीकृत कर गढ़वाल राज्य की स्थापना की।
इसी व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में कत्यूरी सत्ता के प्रभाव के कुमाऊं से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक फैलने की चर्चाएं मिलती हैं। जियारानी की कथा विशेष रूप से हरिद्वार, कुमाऊं और रानीबाग को आपस में जोड़ती है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह तो स्पष्ट है कि कत्यूरी साम्राज्य बाद में कुमाऊं, गढ़वाल, नेपाल एवं उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्र में विभाजित हो गया और बाद में गढ़वाल में पंवार वंश और कुमाऊं के कुछ हिस्से में चंद वंश की स्थापना हो गई। हालांकि यह स्थापना कत्यूरी वंश द्वारा ही पोषित थी और कत्यूरी अधिकतर पिथौरागढ़- नेपाल की ओर माइग्रेट हो गए।

रानीबाग आज भी सुनाता है जियारानी की कहानी
जियारानी की स्मृति का सबसे प्रसिद्ध केंद्र रानीबाग माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, उनका इस क्षेत्र से गहरा संबंध था और इसी कारण इस स्थान का नाम रानीबाग पड़ा। जियारानी की गुफा और उनसे जुड़ी लोककथाएं आज भी कुमाऊं की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। जागरों में भी जियारानी कि अपनी अलग भूमिका है और विशेष स्थान है। उन्होंने अपने बूते कई युद्ध लड़े और रुहेला-तुर्कों को कई बार राज्य की सीमाओं से बाहर खदेड़ा।
यही वजह है कि जियारानी की कहानी केवल किसी राजा की पत्नी की कथा बनकर नहीं रह जाती। यह कुमाऊं, हरिद्वार, तराई और हिमालयी समाज के बीच पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की कहानी बन जाती है। हालांकि दूरस्थ क्षेत्र और शोध कार्यों की कमी के कारण कई लोग उत्तराखंड की इस महान वीरांगना से आज भी परिचित नहीं हैं।
इतिहास और लोकगाथा के बीच अंतर समझना जरूरी
जियारानी और पृथ्वीपाल से जुड़ी अनेक बातें लोकगाथाओं, स्थानीय परंपराओं और बाद के ऐतिहासिक लेखनों में मिलती हैं। इनमें से हर विवरण के लिए शोध की कमी के कारण समान स्तर का अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है परंतु जागरों से हमें विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।
फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि पिथौरागढ़, रानीबाग और कुमाऊं की सांस्कृतिक स्मृति में पृथ्वीपाल-प्रीतमदेव और जियारानी की कथा आज भी जीवित है।
यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि आज के उत्तराखंड की सीमाएं अपेक्षाकृत आधुनिक हैं, जबकि इस भूभाग का सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास हिमालय से लेकर हरिद्वार और तराई के मैदानी क्षेत्रों तक फैले लंबे संपर्कों से बना है।
देवभूमि के लोग – भानु प्रताप सिंह| मेरा उत्तराखंड -विशेष रिपोर्ट
नोट – उपलब्ध साक्ष्यों, जागरोंं में कई विशिष्ट जानकारियां उपलब्ध हैं जिन्हें समझने हेतु अधिक अभिलेखीय शोध की आवश्यकता है। आपके पास कोई विशेष जानकारी है तो कृपया 9412042100 पर व्हाटसअप कर दें।