पौड़ी गढ़वाल जिले के बछेली (तरुली) गांव में शुक्रवार (9 अक्टूबर) शाम करीब 5 बजे घास काट रही 48-51 वर्षीय बीना देवी (पत्नी बालमुकुंद) पर गुलदार ने अचानक हमला कर दिया। महिला की मौके पर ही मौत हो गई। आसपास मौजूद अन्य महिलाओं के शोर मचाने पर गुलदार जंगल की ओर भाग गया। घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। वन विभाग की टीम मौके पर पहुंच चुकी है और गुलदार की तलाश में पिंजरे लगाने समेत अन्य कदम उठाए जा रहे हैं।
यह घटना अकेली नहीं है। उत्तराखंड में 2026 में मानव-वन्यजीव संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है।
2026 के आंकड़े (जनवरी से 30 सितंबर तक)
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस साल अब तक 55 लोगों की मौत हो चुकी है और 407 लोग घायल हुए हैं।
- गुलदार (तेंदुआ): 17 मौतें (सबसे ज्यादा)
- बाघ: 12 मौतें
- सांप: 10 मौतें
- हाथी: 9 मौतें
- भालू: 4 मौतें
- मगरमच्छ: 3 मौतें
मानसून के तीन महीनों में अकेले 190 लोग घायल हुए, जो पूरे साल के घायलों का लगभग आधा है। गुलदार के हमले मानसून में सबसे ज्यादा होते हैं, जबकि बाघ के हमले गर्मियों में बढ़ते हैं।
पौड़ी, नैनीताल, रामनगर और हरिद्वार जैसे जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। हाल ही में हरिद्वार के श्यामपुर क्षेत्र में भी हाथी के हमले में एक किसान की मौत हो गई थी, जो खेत में घास काट रहा था।
क्यों बढ़ रहा है संघर्ष?
- जंगलों का सिकुड़ना और आबादी वाले इलाकों का विस्तार
- शिकार (प्री) की कमी
- बाघ और गुलदार की संख्या में वृद्धि
- महिलाओं का जंगल और खेतों में घास-लकड़ी बीनने जाना (वे सबसे ज्यादा जोखिम में हैं)
- मवेशियों का आसानी से उपलब्ध होना
उत्तराखंड में 2000 से 2025 तक लगभग 954 मौतें दर्ज हुईं, जिनमें से करीब 46 प्रतिशत सिर्फ 2020-2025 के बीच हुईं। गुलदार सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है।
सरकार और वन विभाग के प्रयास
वन विभाग समस्या वाले जानवरों को पकड़ने या अंतिम विकल्प के रूप में गोली मारने की अनुमति दे रहा है। जागरूकता अभियान, कैमरा ट्रैप, पिंजरे और गश्त बढ़ाई जा रही है। मृतकों के परिवारों को मुआवजा और घायलों का इलाज मुफ्त दिया जा रहा है।
फिर भी ग्रामीणों का गुस्सा बढ़ रहा है। वे कहते हैं कि सिर्फ मुआवजा काफी नहीं, सुरक्षा के ठोस इंतजाम चाहिए। महिलाएं अब अकेले घास काटने या जंगल जाने से डर रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय के लिए आवास संरक्षण, कोरिडोर बहाली, प्री बेस बढ़ाने और सामुदायिक भागीदारी जरूरी है। अन्यथा उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह संकट और गहराता जाएगा।
ग्रामीणों से अपील है कि अकेले जंगल या खेत न जाएं, समूह में रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत वन विभाग को सूचना दें।