क्लास-1 और क्लास-2 अधिकारियों के कार्यों की हो नियमित समीक्षा, लगातार ट्रेनिंग से बढ़े प्रशासन की एफिशियंसी
संपादक- भानु प्रताप सिंह/ देहरादून Dated 22 सितंबर 2026
देश में विकास की चर्चा अक्सर नई सड़कों, पुलों, भवनों, एक्सप्रेस-वे, डिजिटल सेवाओं और बड़ी-बड़ी योजनाओं के आंकड़ों से की जाती है। लेकिन विकास का एक दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल भी है—क्या इन योजनाओं और सरकारी संसाधनों का लाभ आम नागरिक तक उसी गुणवत्ता और गति से पहुंच रहा है, जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है?
अगर किसी गांव में सड़क बनने के बाद कुछ ही समय में खराब हो जाती है, अस्पताल में भवन तो बन जाता है लेकिन डॉक्टर या जरूरी सेवाएं उपलब्ध नहीं होतीं, सरकारी योजना कागजों पर पूरी दिखाई देती है लेकिन लाभार्थी वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर लगाता रहता है, तो केवल बजट खर्च हो जाने को विकास का अंतिम प्रमाण कैसे माना जाए?
यहीं से सरकारी प्रशासन में क्लास-1 और क्लास-2 अधिकारियों के कार्यों की नियमित और परिणाम आधारित समीक्षा का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
केवल पद नहीं, परिणाम भी महत्वपूर्ण
सरकारी व्यवस्था में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों के पास नीतियों को लागू कराने, विभागों को दिशा देने, बजट के उपयोग की निगरानी करने और जनता तक सेवाएं पहुंचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है।
लेकिन सवाल यह होना चाहिए कि किसी अधिकारी ने केवल कितनी फाइलें निपटाईं, कितनी बैठकें कीं या कितने आदेश जारी किए, इसके बजाय उसके कार्यकाल में जमीन पर क्या बदलाव आया?
क्या सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता सुधरी?
क्या शिकायतों के समाधान का समय कम हुआ?
क्या योजनाओं में देरी कम हुई?
क्या विभागीय भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर प्रभावी नियंत्रण हुआ?
क्या जनता को कार्यालयों के चक्कर कम लगाने पड़े?
क्या उपलब्ध बजट का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए प्रभावी ढंग से हुआ?
ऐसे सवालों को अधिकारियों की वार्षिक कार्यप्रणाली समीक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है।
जनप्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही में अंतर
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों के कामों की समीक्षा हर पांच साल में जनता द्वारा चुनाव के माध्यम से की जाती है। जनता उनके कार्यकाल, उपलब्धियों और क्षेत्र के विकास के आधार पर अपना समर्थन या असहमति व्यक्त कर सकती है।
लेकिन सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर कार्यरत अधिकारियों के कामकाज की ऐसी प्रत्यक्ष और नियमित समीक्षा आम जनता द्वारा नहीं हो पाती। उनकी कार्यप्रणाली का मूल्यांकन प्रायः विभागीय रिपोर्टों और आंतरिक प्रक्रियाओं तक सीमित रहता है।
इसलिए जरूरी है कि सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के कार्यों की भी नियमित, पारदर्शी और परिणाम आधारित समीक्षा हो। इससे यह पता चल सकेगा कि वे अपने दायित्वों का निर्वहन कितनी प्रभावी ढंग से कर रहे हैं और उनके निर्णयों का जनता पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ रहा है।
हर अधिकारी के लिए लगातार प्रशिक्षण क्यों जरूरी?
आज प्रशासन का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा, डिजिटल गवर्नेंस, ड्रोन तकनीक, ऑनलाइन सेवाएं और आधुनिक परियोजना प्रबंधन सरकारी कामकाज का हिस्सा बन रहे हैं।
ऐसे में केवल नियुक्ति के समय मिली ट्रेनिंग के आधार पर दशकों तक प्रशासन चलाना पर्याप्त नहीं हो सकता।
अधिकारियों के लिए नियमित अपस्किलिंग और रिफ्रेशर ट्रेनिंग जरूरी है।
प्रशिक्षण में केवल नियम-कानून ही नहीं, बल्कि—
- AI और आधुनिक तकनीक का सरकारी काम में उपयोग
- डेटा आधारित निर्णय लेने की क्षमता
- वित्तीय एवं परियोजना प्रबंधन
- साइबर सुरक्षा
- आपदा प्रबंधन
- जन शिकायतों का प्रभावी समाधान
- नेतृत्व एवं टीम मैनेजमेंट
- भ्रष्टाचार रोकने की आधुनिक व्यवस्थाएं
- समयबद्ध सरकारी सेवाएं
- फील्ड प्रशासन और जनसंपर्क
- नई आर्थिक एवं सामाजिक चुनौतियां
जैसे विषय शामिल किए जाने चाहिए।
क्या अधिकारी का मूल्यांकन जनता के अनुभव से भी होना चाहिए?
सरकारी व्यवस्था में अधिकारी का मूल्यांकन केवल वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट तक सीमित रहने के बजाय बहु-आयामी बनाया जा सकता है।
मसलन, विभागीय प्रदर्शन के साथ यह भी देखा जाए कि नागरिकों को सेवाएं कितनी तेजी से मिलीं, शिकायतों का समाधान कितना प्रभावी रहा और संबंधित परियोजनाओं के परिणाम क्या रहे।
हालांकि ऐसी व्यवस्था में यह सावधानी भी जरूरी है कि केवल लोकप्रियता या शिकायतों की संख्या को अधिकारी की क्षमता का पैमाना न बनाया जाए। समीक्षा पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ और मापने योग्य मानकों पर होनी चाहिए।
विकास का मतलब सिर्फ GDP या निर्माण नहीं
देश की अर्थव्यवस्था का बढ़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन आम नागरिक के लिए विकास का अर्थ इससे कहीं व्यापक है।
एक परिवार के लिए विकास का मतलब बेहतर शिक्षा हो सकता है।
किसी मरीज के लिए समय पर और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा।
किसान के लिए सिंचाई, बाजार और उचित आय।
युवा के लिए रोजगार और कौशल।
महिला के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान और आर्थिक अवसर।
बुजुर्ग के लिए सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा।
गांव के लिए सड़क, पानी, इंटरनेट और स्वास्थ्य सुविधा।
इसलिए बड़ा सवाल यह है—
क्या आर्थिक विकास का लाभ समाज के अलग-अलग वर्गों तक समान रूप से पहुंच रहा है?
क्या शहर और गांव के बीच सुविधाओं की दूरी कम हो रही है?
क्या सरकारी स्कूलों और निजी स्कूलों के बीच गुणवत्ता का अंतर घट रहा है?
क्या सरकारी अस्पतालों में आम नागरिक को भरोसेमंद उपचार मिल रहा है?
क्या युवाओं को केवल डिग्री मिल रही है या रोजगार योग्य कौशल भी?
क्या विकास के साथ पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी हो रही है?
समाज का विकास कैसे मापा जाए?
किसी देश के विकास को केवल सरकारी भवनों और सड़क किलोमीटर से नहीं मापा जा सकता। मानव विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, कानून का प्रभावी पालन, स्वच्छ पर्यावरण और नागरिकों की जीवन गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
अगर अर्थव्यवस्था बढ़ रही हो लेकिन बड़ी संख्या में परिवार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए निजी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर हों, तो यह विचार करना जरूरी है कि सार्वजनिक सेवाओं की क्षमता कितनी बढ़ी है।
अगर तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही हो लेकिन सरकारी तंत्र उसके उपयोग में पीछे रह जाए, तो विकास की गति और प्रशासन की क्षमता के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
हर विभाग में ‘परफॉर्मेंस ऑडिट’ की जरूरत
जिस तरह सरकारी योजनाओं में वित्तीय ऑडिट होता है, उसी तरह परफॉर्मेंस ऑडिट को भी मजबूत किया जा सकता है।
किसी विभाग के लिए पहले से स्पष्ट लक्ष्य तय हों और साल के अंत में यह देखा जाए कि—
लक्ष्य क्या था → उपलब्ध संसाधन कितने थे → काम कितना हुआ → गुणवत्ता कैसी रही → जनता को क्या लाभ मिला → देरी क्यों हुई → जिम्मेदारी किस स्तर पर थी।
इससे केवल अधिकारी को दोष देने की संस्कृति के बजाय प्रणालीगत कमियों की पहचान भी संभव होगी।
कई बार खराब परिणाम किसी एक अधिकारी की वजह से नहीं, बल्कि कर्मचारियों की कमी, बजट की कमी, अस्पष्ट नियम, तकनीकी बाधाओं या विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण होते हैं। इसलिए समीक्षा का उद्देश्य केवल दंड नहीं, बल्कि सुधार और जवाबदेही दोनों होना चाहिए।
प्रशिक्षण के साथ जवाबदेही भी जरूरी
सिर्फ ट्रेनिंग करा देने से व्यवस्था नहीं बदलती। प्रशिक्षण के बाद यह भी देखना होगा कि अधिकारी ने नई सीख को अपने काम में कितना लागू किया।
इसी तरह केवल लक्ष्य निर्धारित करना भी पर्याप्त नहीं है। अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन, स्पष्ट अधिकार और निर्णय लेने की उचित स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए।
अर्थात प्रभावी प्रशासन के लिए चार चीजें साथ-साथ जरूरी हैं—
प्रशिक्षण + तकनीक + स्पष्ट लक्ष्य + जवाबदेही।
क्या हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं?
इस सवाल का जवाब एक शब्द में ‘हां’ या ‘नहीं’ देना वास्तविक स्थिति को अत्यधिक सरल बना देगा। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में विकास की गति और गुणवत्ता अलग-अलग हो सकती है।
कहीं डिजिटल सेवाओं ने नागरिकों का काम आसान किया है, तो कहीं अभी भी पुरानी प्रक्रियाओं और लंबी प्रशासनिक श्रृंखला के कारण देरी होती है।
कहीं आधुनिक स्वास्थ्य एवं शिक्षा संस्थान विकसित हुए हैं, तो कहीं बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है।
इसलिए असली चुनौती अब केवल विकास करने की नहीं, बल्कि विकास की गुणवत्ता, पहुंच और परिणाम सुधारने की है।
अब सवाल जनता का भी है और व्यवस्था का भी
देश की प्रगति केवल सरकार या अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं है। नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, कर्मचारियों, उद्योग, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों—सभी की भूमिका है।
लेकिन सरकारी तंत्र में जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे बदलती तकनीक, बदलती अर्थव्यवस्था और बदलती सामाजिक जरूरतों के साथ स्वयं को लगातार अपडेट करें।
देशभर में लगातार भ्रष्टाचार के नए खुलासे हो रहे हैं, सोशल मीडिया में रील बाजी से वायरल हो रहे अधिकारी अगले दिन बड़े घोटालों में पकड़े जा रहे हैं। बड़े बड़े हाईवेज टूटना , पुल गिरना, अस्पतालों- स्कूलों में अव्यवस्था, और योजनाओं में आम जनता के प्रति उदासीनता आम हो चुकी है।
क्लास-1 और क्लास-2 अधिकारियों की नियमित कार्य-समीक्षा, आधुनिक प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता, पारदर्शी प्रदर्शन मानक और वास्तविक परिणामों पर आधारित जवाबदेही—इन पर गंभीरता से काम किया जाए तो प्रशासन की कार्यक्षमता में सुधार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
आखिर विकास का अंतिम लक्ष्य केवल आंकड़े बढ़ाना नहीं होना चाहिए।
सवाल यह है कि देश की प्रगति आम नागरिक के जीवन में कितनी दिखाई दे रही है।
क्या बच्चे बेहतर शिक्षा पा रहे हैं?
क्या युवाओं के अवसर बढ़ रहे हैं?
क्या स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हो रही हैं?
क्या गांव और शहर के बीच अंतर घट रहा है?
क्या सरकारी कार्यालयों में नागरिक का समय बच रहा है?
क्या समाज में अवसर और सुविधाओं की पहुंच व्यापक हो रही है?
यदि इन सवालों के जवाब लगातार बेहतर होते हैं, तभी विकास को जमीन पर महसूस किया जा सकेगा। इसलिए सवाल जरूरी है और उससे पहले सामाजिक जागरूकता और सजगता ज्यादा जरूरी है।