रामनगर से हल्द्वानी और काशीपुर तक भटकता रहा परिवार; परिजनों ने इलाज में देरी और बार-बार रेफर किए जाने के लगाए आरोप, कुमाऊं में अस्पतालों की खस्ता हालत!
अल्मोड़ा/हल्द्वानी। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी स्थिति पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अल्मोड़ा जिले के सल्ट क्षेत्र के इनोलू गांव की 24 वर्षीय गर्भवती निशा और उसके गर्भ में पल रहे जुड़वा बच्चों की मौत का मामला सामने आया है। परिवार के अनुसार, निशा की तबीयत बिगड़ने के बाद उसे तीन दिनों के दौरान रामनगर, हल्द्वानी और काशीपुर के छह अस्पतालों तक ले जाया गया, लेकिन समय पर निर्णायक उपचार नहीं मिल सका। अंततः 2 सितंबर को काशीपुर के एक निजी अस्पताल में निशा की मौत हो गई। उसके दोनों जुड़वा बच्चों को ऑपरेशन के बाद बाहर निकाला गया, जिनमें एक पहले ही मृत था और दूसरे ने कुछ घंटे बाद दम तोड़ दिया।
30 अगस्त की रात शुरू हुई परेशानी
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 30 अगस्त की रात निशा को अचानक सांस लेने और घुटन की शिकायत हुई। कुछ समय बाद राहत मिलने पर परिवार ने इसे तत्काल गंभीर स्थिति नहीं माना, लेकिन अगले दिन यानी 31 अगस्त की सुबह उसकी सांस लेने की समस्या बढ़ गई।
परिजन उसे रामनगर स्थित रामदत्त जोशी राजकीय चिकित्सालय लेकर पहुंचे। अस्पताल में चिकित्सकों ने गर्भावस्था को जटिल बताते हुए उसे उच्च केंद्र यानी हल्द्वानी ले जाने की सलाह दी।
रामनगर से हल्द्वानी तक दौड़
इसके बाद परिवार निशा को सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय, हल्द्वानी ले गया। रिपोर्टों के अनुसार, वहां अल्ट्रासाउंड के लिए निजी सुविधा का सहारा लेना पड़ा। जांच के बाद उस समय उसकी हालत स्थिर बताई गई और परिवार उसे वापस ले गया। सुशीला तिवारी हल्द्वानी अस्पताल अपने आप में अव्यवस्था का रिकॉर्ड बना चुका है। यहां अव्यवस्था होना अब आम बात है लेकिन तंत्र देहरादून में बैठकर बैठक बैठक जरूर खेलता है।
1 सितंबर की रात करीब 9 बजे निशा की सांस लेने में परेशानी दोबारा बढ़ गई। परिवार उसे फिर सुशीला तिवारी अस्पताल लेकर पहुंचा। परिजनों का आरोप है कि गंभीर और जटिल स्थिति बताते हुए उसे भर्ती नहीं किया गया और आगे उपचार के लिए भेज दिया गया। इसके बाद परिवार एक निजी अस्पताल भी गया, लेकिन वहां भी उपचार नहीं हो सका। यानी जिस अस्पताल ने हालत ठीक बताकर घर भेज दिया उसने कहा था अगले दिन हालत गंभीर बताकर रेफर कर दिया और अपनी जिम्मेदारी से सीधे मुंह मोड़ लिया। जिसकी तनख्वाह तो आम जनता ने चुकाती है।
फिर काशीपुर के तीन अस्पतालों के चक्कर
निशा की हालत बिगड़ती देख परिजन उसे काशीपुर ले गए। यहां भी परिवार को एक के बाद दूसरे अस्पताल जाना पड़ा। इस तरह रामनगर, हल्द्वानी और काशीपुर में कुल छह अस्पतालों तक पहुंचने की बात सामने आई है।
परिवार के अनुसार, इलाज, जांच और आने-जाने में उन्हें ₹3 लाख से अधिक खर्च करना पड़ा। निशा के ससुर ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी—उसका पति ड्राइवर है और घटना के समय करीब दो महीने से काम नहीं था।
2 सितंबर की सुबह आया सबसे भयावह मोड़
रिपोर्टों के अनुसार, 2 सितंबर की सुबह करीब 10 बजे निशा को ऑपरेशन थिएटर ले जाया जा रहा था। इसी दौरान उसकी हालत अचानक बिगड़ी और उसे लगातार दो अटैक आए। उसकी मौत हो गई।
इसके बाद चिकित्सकों ने ऑपरेशन कर गर्भ में पल रहे दोनों बच्चों को बाहर निकाला। परिजनों के अनुसार, एक बच्चा पहले ही मृत हो चुका था, जबकि दूसरे ने जन्म के कुछ घंटे बाद दम तोड़ दिया। इस तरह कुछ ही दिनों के भीतर एक परिवार ने मां और दोनों अजन्मे/नवजात बच्चों—तीन जिंदगियां—खो दीं।
सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, पूरी रेफरल व्यवस्था का है
इस घटना को केवल किसी एक अस्पताल की कथित लापरवाही के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली सवाल यह है कि एक गंभीर गर्भवती मरीज को ऐसी स्थिति में कितनी बार अस्पताल-दर-अस्पताल भेजा जाना चाहिए?
अगर मरीज हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में थी, तो:
- क्या समय रहते हाई-रिस्क के रूप में उसकी पहचान हुई थी?
- क्या परिवार को संभावित खतरे के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई थी?
- क्या रेफर किए जाते समय दूसरे अस्पताल से समन्वय किया गया?
- क्या एंबुलेंस और मेडिकल एस्कॉर्ट की व्यवस्था थी?
- क्या जिस अस्पताल में भेजा गया वहां बेड, ICU, ऑब्स्टेट्रिक और नवजात आपात सुविधा उपलब्ध थी?
- यदि सुविधा उपलब्ध नहीं थी तो मरीज को अगले केंद्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी थी?
- क्या हर रेफरल का रिकॉर्ड और कारण दर्ज किया गया?
- और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आपात स्थिति में मरीज को स्थिर किए बिना सिर्फ रेफर करना पर्याप्त है?
इन सवालों के जवाब स्वतंत्र जांच के बाद ही सामने आ सकते हैं।
डॉक्टर ने बताया—गर्भावस्था हाई रिस्क थी
रामदत्त जोशी राजकीय चिकित्सालय के CMS डॉ. तपन शर्मा के अनुसार, अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नमिता ने निशा की जांच की थी। उनके अनुसार, एक बच्चा ब्रीच पोजीशन में था और उसकी हार्ट रेट काफी अधिक थी। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि अपेक्षित प्रसव से लगभग एक सप्ताह पहले नियमित जांच के दौरान परिवार को संभावित जोखिम और जटिलताओं के बारे में बताया गया था।
यानी मामला केवल “अस्पताल ने इलाज नहीं किया” तक सीमित नहीं है। गर्भावस्था की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति, रेफरल के समय निशा की हालत और प्रत्येक अस्पताल में उपलब्ध उपचार—इन सभी की जांच जरूरी है।
स्वास्थ्य विभाग कराएगा Death Audit
इस मामले को लेकर उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग ने Death Audit कराने की बात कही है।
स्वास्थ्य विभाग की महानिदेशक डॉ. सुनीता तम्टा के अनुसार, इस मामले में डेथ ऑडिट से महिला की मौत की परिस्थितियों को समझने में मदद मिलेगी, विशेषकर क्योंकि यह हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का मामला था।
यही जांच बताएगी—मौत को रोका जा सकता था या नहीं?
डेथ ऑडिट में केवल मृत्यु का कारण लिखना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। जांच में पूरी टाइमलाइन सामने आनी चाहिए—
30 अगस्त: पहली तबीयत खराब
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31 अगस्त: रामनगर अस्पताल
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हल्द्वानी: उच्च केंद्र की ओर रेफरल
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निजी जांच/अल्ट्रासाउंड
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1 सितंबर रात: हालत फिर गंभीर
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हल्द्वानी में दोबारा संपर्क
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निजी अस्पताल
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काशीपुर के तीन अस्पताल
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2 सितंबर: ऑपरेशन से पहले दो अटैक
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निशा की मौत
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दोनों बच्चों की भी मौत
यह पूरी टाइमलाइन जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए।
पहाड़ में दूरी आज भी बड़ी चुनौती
इस घटना ने एक और पुरानी समस्या को सामने ला दिया है—पर्वतीय क्षेत्रों में अस्पताल तक पहुंचने का समय।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता नारायण सिंह रावत ने TOI को बताया कि सल्ट क्षेत्र के गंभीर मरीजों को रामनगर तक लगभग 100 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ सकती है। उनके अनुसार, गरीब परिवारों को अस्पताल पहुंचने के लिए ही हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं और क्षेत्र में डॉक्टरों तथा एंबुलेंस की उपलब्धता को लेकर भी समस्याएं हैं।
यही वह बिंदु है जहां पहाड़ की स्वास्थ्य नीति पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
अगर किसी गर्भवती महिला को आपात स्थिति में पहले 100 किलोमीटर सड़क से नीचे आना पड़े, फिर अस्पताल में सुविधा न मिलने पर दूसरे शहर जाना पड़े, तो “अस्पताल उपलब्ध है” कहना पर्याप्त नहीं है।
स्वास्थ्य सेवा की वास्तविक कसौटी है—
क्या मरीज को Golden Hour में सही इलाज मिल पा रहा है?
सरकार के सामने अब ये 10 बड़े सवाल
1. निशा के पूरे मेडिकल रिकॉर्ड और सभी अस्पतालों की केस शीट सार्वजनिक जांच के लिए सुरक्षित रखी गई हैं या नहीं?
2. छह अस्पतालों में मरीज के पहुंचने और वहां लिए गए निर्णयों की टाइमलाइन क्या थी?
3. किस अस्पताल ने किस आधार पर मरीज को रेफर किया?
4. क्या किसी अस्पताल ने मरीज को भर्ती करने से मना किया? यदि हां, तो क्यों?
5. क्या मरीज की स्थिति के अनुसार तत्काल ऑपरेशन/ICU/वेंटिलेटर/ऑब्स्टेट्रिक इमरजेंसी की जरूरत थी?
6. रेफरल के दौरान मेडिकल एस्कॉर्ट और एंबुलेंस की व्यवस्था क्यों नहीं हुई?
7. क्या संबंधित अस्पतालों में उस समय विशेषज्ञ डॉक्टर और आवश्यक उपकरण उपलब्ध थे?
8. क्या किसी स्तर पर उपचार में ऐसी देरी हुई जिसने परिणाम को प्रभावित किया?
9. क्या जिम्मेदारी तय होने पर संबंधित अधिकारियों/अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई होगी?
10. क्या सरकार पहाड़ी जिलों के लिए High-Risk Pregnancy Emergency Referral Protocol लागू करेगी?
यह सिर्फ निशा की कहानी नहीं
निशा की मौत को किसी एक परिवार की निजी त्रासदी मानकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। यह घटना उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में मातृ स्वास्थ्य, आपातकालीन चिकित्सा, रेफरल सिस्टम, एंबुलेंस नेटवर्क और जिला अस्पतालों की क्षमता पर व्यापक सवाल खड़े करती है।
सरकार का यह कहना कि स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो रहा है, तभी सार्थक माना जाएगा जब दूरस्थ गांव की गर्भवती महिला को गंभीर स्थिति में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर न लगाने पड़ें।
इस मामले में फिलहाल किसी अस्पताल या डॉक्टर को दोषी ठहराना जांच से पहले उचित नहीं होगा। लेकिन परिजनों के आरोप इतने गंभीर हैं कि स्वतंत्र और समयबद्ध जांच जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग का प्रस्तावित Death Audit इसी दिशा में पहला कदम हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल
अगर एक 24 वर्षीय गर्भवती महिला को इलाज पाने के लिए तीन दिन में छह अस्पतालों तक जाना पड़े, तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उसकी मौत क्यों हुई—सवाल यह भी है कि उसे समय पर इलाज की गारंटी देने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था आखिर कहां थी?
यह मामला देवभूमि के पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र जांच की मांग करता है।
पहाड़ो में अब स्वास्थ्य स्थिति गंभीर हो चुकी है, हर घर बीमारी के साथ अस्पताल अब रेफर सेंटर बना चुके हैं खासकर कुमाऊं क्षेत्र में जहां आजादी के 80 साल बाद अब भी लोग छोटी बीमारियों में भी दिल्ली भागने पर मजबूर हैं। हम मांग करते हैं कि पहाड़ों में स्पेशलिस्ट डॉ भेजे किच्छा में बन रहे नए एम्स को दिल्ली एम्स का सब्सिडियरी बनाया जाए अन्यथा ऋषिकेश एम्स की सच्चाई भी किसी से छिपी नहीं है।