विशेष रिपोर्ट | देवभूमि के लोग न्यूज़
अरबों की दौलत, लेकिन सवाल—कितना समाज के नाम?
दुनिया में अरबपतियों की संख्या और उनकी संपत्ति लगातार बढ़ी है। इसके साथ ही एक दूसरी तस्वीर भी सामने आई है—कुछ बेहद अमीर लोगों ने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, पर्यावरण और सामाजिक समानता के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया है।
इसी चर्चा के केंद्र में मार्क जुकरबर्ग और प्रिसिला चान हैं। लेकिन उनके साथ वॉरेन बफेट, बिल गेट्स, मैकेंज़ी स्कॉट, अजीम प्रेमजी, शिव नादर, नंदन नीलेकणी और अन्य भारतीय दानदाता भी दुनिया की philanthropy की तस्वीर बदल रहे हैं।
हालांकि एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है: जुकरबर्ग का 99% शेयर दान करने का संकल्प नया 2026 का ऐलान नहीं है। उन्होंने 2015 में अपनी बेटी के जन्म के बाद यह प्रतिबद्धता जताई थी और 2016 में इसे दोहराते हुए कहा कि वे और प्रिसिला चान अपने जीवनकाल में Facebook के 99% शेयर मानव क्षमता को आगे बढ़ाने और समानता को बढ़ावा देने के लिए देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
मार्क जुकरबर्ग: 99% Facebook शेयर समाज के लिए
Facebook के सह-संस्थापक और Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग तथा उनकी पत्नी प्रिसिला चान ने Chan Zuckerberg Initiative (CZI) के माध्यम से अपने Facebook शेयरों का 99% हिस्सा अपने जीवनकाल में सामाजिक उद्देश्यों के लिए देने की प्रतिबद्धता जताई।
उनका लक्ष्य केवल पारंपरिक चैरिटी तक सीमित नहीं है।
CZI का फोकस मुख्य रूप से—
- बीमारियों के इलाज और वैज्ञानिक अनुसंधान
- स्वास्थ्य
- शिक्षा
- मानव क्षमता का विकास
- वैज्ञानिक तकनीक
- जलवायु और पर्यावरण
- सामाजिक समानता
जैसे क्षेत्रों पर रहा है।
जुकरबर्ग का मॉडल यह भी दिखाता है कि philanthropy में केवल नकद पैसा ही नहीं, बल्कि कंपनी के शेयर और अन्य संपत्तियां भी सामाजिक निवेश का माध्यम बन सकती हैं।
लेकिन 99% का मतलब क्या है?
यह समझना बेहद जरूरी है कि यह एकमुश्त 99% संपत्ति तुरंत दान करने की घोषणा नहीं थी।
यह अपने जीवनकाल में Facebook/Meta शेयरों के 99% को philanthropic उद्देश्यों के लिए समर्पित करने की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता है।
वॉरेन बफेट: 99% संपत्ति दान करने का संकल्प
अमेरिकी निवेशक वॉरेन बफेट philanthropy की दुनिया में सबसे बड़े नामों में हैं।
उन्होंने अपनी संपत्ति के 99% हिस्से को charitable causes के लिए देने का संकल्प किया था। उनका बड़ा हिस्सा Berkshire Hathaway के शेयरों के रूप में philanthropy को गया।
बफेट ने वर्षों तक Gates Foundation और अपने परिवार से जुड़ी charitable foundations को अरबों डॉलर मूल्य के शेयर दान किए। 2023 तक उनके ऐतिहासिक pledges के तहत कुल दान $50.7 अरब तक पहुंच चुका था।
लेकिन 2026 में उनके philanthropy मॉडल में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। जुलाई 2026 में बफेट ने Gates Foundation को आगे दान रोकने और Berkshire Hathaway के बचे हुए शेयरों को अपने बच्चों द्वारा संचालित चार family foundations की ओर निर्देशित करने का फैसला किया।
यह दिखाता है कि अरबपतियों की philanthropy भी समय के साथ अपना स्वरूप बदल रही है।
बिल गेट्स: अब लगभग पूरी बची संपत्ति philanthropy के लिए
Microsoft के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने अपनी अधिकांश संपत्ति समाज के लिए देने की प्रतिबद्धता जताई है।
Gates Foundation के अनुसार, 2024 के अंत तक Bill Gates और Melinda French Gates ने foundation को कुल $60.2 अरब का योगदान दिया था, जबकि Warren Buffett ने 2025 के अंत तक $47.9 अरब foundation के endowment में दिए थे। Foundation ने 2000 से 2025 तक अपने पहले 25 वर्षों में $100 अरब से अधिक खर्च किए।
और 2025 में गेट्स ने philanthropy के लिए अपनी अगली बड़ी प्रतिबद्धता घोषित की—उन्होंने कहा कि वह अपनी लगभग $200 अरब की शेष संपत्ति अगले दो दशकों में देने की योजना रखते हैं और Gates Foundation 2045 के अंत में बंद हो जाएगा।
यानी यहां philanthropy का मॉडल है—
दौलत जमा करना नहीं, समयबद्ध तरीके से उसे सामाजिक बदलाव में बदलना।
मैकेंज़ी स्कॉट: अरबों डॉलर सीधे nonprofits तक
Amazon की पूर्व पत्नी मैकेंज़ी स्कॉट ने philanthropy का एक अलग मॉडल सामने रखा है।
उनकी संस्था Yield Giving के माध्यम से 2019 के बाद से लगभग $26 अरब nonprofit organizations को दिए जा चुके हैं। 2025 में ही उन्होंने लगभग $7.1–7.2 अरब दान किया।
उनकी खासियत यह है कि कई grants में संगठनों पर बहुत कम शर्तें लगाई जाती हैं।
अर्थात—
जिस संगठन को पैसा मिला, उसे यह तय करने की अधिक स्वतंत्रता होती है कि स्थानीय जरूरत के हिसाब से धन का उपयोग कैसे किया जाए।
यह philanthropy की दुनिया में “trust-based giving” के रूप में एक महत्वपूर्ण प्रयोग माना जा रहा है।
भारत की तस्वीर: अरबपति ही नहीं, संस्थागत philanthropy भी
भारत में भी philanthropy तेजी से बढ़ रही है।
EdelGive-Hurun India Philanthropy List 2025 के अनुसार, 191 भारतीय philanthropists ने वित्त वर्ष 2024-25 में कुल ₹10,380 करोड़ का दान किया।
यह राशि तीन वर्षों में 85% बढ़ी। शीर्ष 10 दानदाताओं ने अकेले ₹5,834 करोड़, यानी कुल का लगभग 56%, दिया। शिक्षा इस philanthropy का सबसे प्रमुख क्षेत्र रहा।
- शिव नादर और परिवार—₹2,708 करोड़
HCL के संस्थापक शिव नादर और उनका परिवार 2025 की सूची में भारत के सबसे बड़े philanthropists रहे।
उन्होंने FY2024-25 में ₹2,708 करोड़ का योगदान दिया—करीब ₹7.4 करोड़ प्रतिदिन के बराबर।
उनकी philanthropy का बड़ा हिस्सा शिव नादर फाउंडेशन के माध्यम से शिक्षा, उच्च शिक्षा और संस्थान निर्माण पर केंद्रित है।
- मुकेश अंबानी और परिवार
मुकेश अंबानी और परिवार भी भारत के प्रमुख philanthropic families में शामिल हैं।
उनकी philanthropic गतिविधियां शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक कल्याण सहित कई क्षेत्रों में फैली हैं।
2025 की EdelGive-Hurun सूची में अंबानी परिवार दूसरे स्थान पर रहा।
- बजाज परिवार—₹446 करोड़
बजाज परिवार ने 2025 की सूची में लगभग ₹446 करोड़ का योगदान किया और तीसरे स्थान पर रहा।
परिवार की philanthropy लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण से जुड़ी रही है।
- नंदन नीलेकणी
Infosys के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी भी भारत के प्रमुख philanthropists में हैं।
उनकी philanthropy शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना सहित कई क्षेत्रों में दिखाई देती है। 2025 की सूची में उनका व्यक्तिगत योगदान लगभग ₹356 करोड़ बताया गया।
- रोहिणी नीलेकणी—महिला philanthropy का बड़ा नाम
रोहिणी नीलेकणी भारत की प्रमुख महिला philanthropists में हैं।
उनका काम पानी, शिक्षा, नागरिक समाज और सामाजिक विकास से जुड़े क्षेत्रों में केंद्रित रहा है। 2025 में उन्होंने लगभग ₹204 करोड़ का योगदान किया और वे भारत की शीर्ष महिला philanthropists में रहीं।
अजीम प्रेमजी: संपत्ति से संस्थान बनाने का भारतीय मॉडल
अगर भारत में बड़े पैमाने पर दीर्घकालिक institutional philanthropy की बात हो तो अजीम प्रेमजी का नाम सबसे प्रमुख है।
उन्होंने 2001 में Azim Premji Foundation स्थापित की और अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा Foundation के endowment में स्थानांतरित किया।
Foundation के अनुसार, जनवरी 2023 तक इसका philanthropic endowment लगभग ₹2.40 लाख करोड़ यानी करीब $29 अरब था। Foundation का प्रमुख उद्देश्य भारत में अधिक न्यायपूर्ण, समान और मानवीय समाज बनाने की दिशा में काम करना है।
इसका सबसे बड़ा फोकस है—
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और समानता सुधारना।
Foundation शिक्षकों, शिक्षा विभागों और अन्य stakeholders के साथ सीधे काम करता है।
अजीम प्रेमजी 2013 में Giving Pledge पर हस्ताक्षर करने वाले पहले भारतीय थे।
Giving Pledge: अरबपतियों से आधी या उससे ज्यादा संपत्ति समाज को देने की अपील
2010 में बिल गेट्स, मेलिंडा फ्रेंच गेट्स और वॉरेन बफेट ने Giving Pledge शुरू किया।
इसका उद्देश्य दुनिया के सबसे अमीर लोगों को अपनी संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा जीवनकाल में या वसीयत के माध्यम से charitable causes के लिए देने के लिए प्रेरित करना है।
यह कानूनी contract नहीं बल्कि सार्वजनिक commitment है।
इसी पहल ने दुनिया के अरबपतियों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा किया—
“आप अपनी दौलत का कितना हिस्सा अपने पास रखेंगे और कितना समाज को वापस देंगे?”
दुनिया बनाम भारत: philanthropy के मॉडल में क्या अंतर?
दानदाता| प्रमुख प्रतिबद्धता/योगदान| मुख्य क्षेत्र
मार्क जुकरबर्ग–प्रिसिला चान| 99% Facebook शेयर देने की प्रतिबद्धता| विज्ञान, स्वास्थ्य, शिक्षा, समानता
वॉरेन बफेट| 99% संपत्ति philanthropy को देने का संकल्प| स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक विकास
बिल गेट्स| लगभग पूरी शेष संपत्ति philanthropy के लिए देने की योजना| वैश्विक स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास
मैकेंज़ी स्कॉट| $26 अरब+ का दान| सामाजिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण
अजीम प्रेमजी| विशाल philanthropic endowment| सरकारी शिक्षा, सामाजिक समानता
शिव नादर व परिवार| ₹2,708 करोड़ — FY2024-25| शिक्षा
मुकेश अंबानी व परिवार| भारत के शीर्ष philanthropic families में| स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास
बजाज परिवार| ₹446 करोड़ — FY2024-25| स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक विकास
नंदन नीलेकणी| लगभग ₹356 करोड़ — FY2024-25| डिजिटल, शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र
रोहिणी नीलेकणी| लगभग ₹204 करोड़ — FY2024-25| पानी, शिक्षा, नागरिक समाज
भारत के 2025 के आंकड़े EdelGive-Hurun India Philanthropy List पर आधारित हैं, जबकि अलग-अलग वैश्विक दानदाताओं के आंकड़े उनके foundations और उपलब्ध philanthropic records से लिए गए हैं।
लेकिन बड़ा सवाल: दान कितना नहीं, असर कितना?
अरबों रुपये और डॉलर का दान निश्चित रूप से बड़ी बात है। लेकिन philanthropy की असली सफलता केवल रकम से तय नहीं हो सकती।
सवाल होने चाहिए—
कितने बच्चों को बेहतर शिक्षा मिली?
कितने मरीजों को इलाज मिला?
कितनी नई वैज्ञानिक खोजों को मदद मिली?
कितने गरीब परिवार गरीबी से बाहर आए?
कितने गांवों में वास्तविक बदलाव हुआ?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या दान से व्यवस्था मजबूत हुई या केवल एक समस्या को अस्थायी रूप से पैसा मिला?
यही वजह है कि आज philanthropy में transparency, measurable impact, accountability और long-term sustainability पर जोर बढ़ रहा है।
उत्तराखंड के लिए भी बड़ा अवसर
इस वैश्विक और भारतीय philanthropy मॉडल से उत्तराखंड भी बहुत कुछ सीख सकता है।
यदि बड़े दानदाता और philanthropic foundations पहाड़ी क्षेत्रों में निवेश करें तो पैसा इन क्षेत्रों में लगाया जा सकता है—
- दुर्गम सरकारी स्कूलों का आधुनिकीकरण
- शिक्षक प्रशिक्षण
- ग्रामीण अस्पताल और telemedicine
- आपदा प्रबंधन
- भूस्खलन और बाढ़ की early-warning systems
- हिमालयी पर्यावरण संरक्षण
- जल संरक्षण और springs revival
- युवाओं का skill development
- महिला स्वयं सहायता समूह
- स्थानीय कृषि और बागवानी
- पहाड़ी क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा
- दिव्यांग और बुजुर्गों के लिए सामाजिक सहायता
यहां philanthropy का उद्देश्य सरकार का विकल्प बनना नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की क्षमता बढ़ाना होना चाहिए।
अंतिम सवाल—दौलत किसकी और जिम्मेदारी किसकी?
मार्क जुकरबर्ग का 99% शेयर देने का संकल्प, बफेट की 99% संपत्ति की प्रतिबद्धता, बिल गेट्स की लगभग पूरी शेष संपत्ति philanthropy को देने की योजना, मैकेंज़ी स्कॉट का अरबों डॉलर सीधे nonprofits को देना और भारत में अजीम प्रेमजी, शिव नादर तथा अन्य दानदाताओं का विशाल योगदान एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है।
दुनिया के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी निजी संपत्ति के मालिक लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से यह सवाल रखा जा रहा है—
क्या अरबों की दौलत सिर्फ अगली पीढ़ी के लिए छोड़ी जाए, या उसका बड़ा हिस्सा वर्तमान पीढ़ी की समस्याएं हल करने में लगाया जाए?
शायद आने वाले वर्षों में किसी अरबपति की महानता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसने कितना कमाया, बल्कि इस बात से भी कि उसने अपनी संपत्ति से कितने जीवन बेहतर किए।
“दौलत बड़ी हो तो जिम्मेदारी भी बड़ी होनी चाहिए।”