नैनीताल बन रहा है हादसों का हॉटस्पॉट? जब सड़कें सुरक्षित नहीं तो पर्यटकों को बुलाना कितना जायज?
नैनीताल/देहरादून-Bhanu Pratap Singh। उत्तराखंड को देश-दुनिया में पर्यटन, तीर्थाटन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी पर्यटन प्रदेश में सड़क पर सफर करना लगातार चिंता का विषय बनता जा रहा है।
14 अगस्त 2026 को नैनीताल जिले के मल्ला रामगढ़ क्षेत्र में पर्यटकों से भरा एक टेंपो ट्रैवलर खाई में जा गिरा। वाहन में 22 पर्यटक सवार बताए गए हैं। हादसे में कई लोग घायल हुए और पुलिस, एसडीआरएफ तथा स्थानीय लोगों ने बारिश के बीच रेस्क्यू अभियान चलाया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक वाहन सड़क किनारे पैराफिट तोड़कर करीब 100 फीट नीचे खाई में जा गिरा। दुर्घटना के कारणों की जांच की जा रही है।
यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है जो उत्तराखंड में वर्षों से पूछा जा रहा है—
क्या उत्तराखंड में सड़क सुरक्षा को वास्तव में प्राथमिकता दी जा रही है या हर हादसे के बाद मुआवजा, जांच और बयानबाजी ही व्यवस्था का स्थायी मॉडल बन चुका है?
10 साल का आंकड़ा: 9,740 मौतें
उत्तराखंड परिवहन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2016 से 2024 के बीच राज्य में 14,000 से अधिक सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं और 8,498 लोगों की मौत हुई।
2025 के iRAD आंकड़ों के अनुसार राज्य में 1,846 दुर्घटनाओं में 1,242 लोगों की मौत और 2,056 लोग घायल हुए।
इस तरह 2016-2025 के उपलब्ध पूर्ण-वर्षीय आंकड़ों को जोड़ने पर लगभग 15,418 दुर्घटनाएं और 9,740 मौतें सामने आती हैं।
उत्तराखंड में सड़क दुर्घटनाओं का दशक
| वर्ष | दुर्घटनाएं | मौतें | घायल |
|---|---|---|---|
| 2016 | 1,591 | 962 | 1,735 |
| 2017 | 1,603 | 942 | 1,631 |
| 2018 | 1,468 | 1,047 | 1,571 |
| 2019 | 1,352 | 867 | 1,457 |
| 2020 | 1,041 | 674 | 854 |
| 2021 | 1,405 | 820 | 1,091 |
| 2022 | 1,674 | 1,042 | 1,613 |
| 2023 | 1,691 | 1,054 | 1,488 |
| 2024 | 1,747 | 1,090 | 1,547 |
| 2025 | 1,846 | 1,242 | 2,056 |
स्रोत: उत्तराखंड परिवहन विभाग/राज्य iRAD डेटा; 2016-2024 के आंकड़े परिवहन विभाग की आधिकारिक तालिका में उपलब्ध हैं। 2025 के आंकड़े iRAD के आधार पर रिपोर्ट किए गए हैं।
आंकड़े क्या बताते हैं?
2016 से 2025 के बीच:
- दुर्घटनाओं की संख्या लगभग 16% बढ़ी।
- मौतों की संख्या लगभग 29% बढ़ी।
- 2020 के बाद दुर्घटनाएं लगातार बढ़ती गईं।
- 2022, 2023 और 2024 में हर साल 1,000 से अधिक मौतें हुईं।
- 2025 में 1,242 मौतें दशक के उपलब्ध आंकड़ों में सबसे अधिक रहीं।
यानी समस्या खत्म होने के बजाय हाल के वर्षों में और गंभीर हुई है।
2018: पहाड़ को हिला देने वाला बस हादसा
1 जुलाई 2018 को पौड़ी गढ़वाल में एक बस खाई में गिर गई थी। हादसे में 48 लोगों की मौत हुई थी।
यह दुर्घटना उत्तराखंड के इतिहास के सबसे भयावह सड़क हादसों में गिनी जाती है।
उस समय भी सवाल वही थे—
ओवरलोडिंग क्यों?
फिटनेस जांच कहां थी?
सड़क की सुरक्षा व्यवस्था कहां थी?
ड्राइवर की निगरानी कौन कर रहा था?
हादसे से पहले जोखिम की पहचान क्यों नहीं हुई?
लेकिन छह साल बाद नवंबर 2024 में फिर एक बस 200 मीटर गहरी खाई में गिरी।
2024: अल्मोड़ा ने फिर दिखाई व्यवस्था की कमजोरी
4 नवंबर 2024 को अल्मोड़ा के मार्चुला क्षेत्र में एक बस खाई में गिर गई।
बस की क्षमता 37 सीट की थी लेकिन उसमें 63 लोग सवार थे। हादसे में 36 लोगों की मौत और 27 लोग घायल हुए।
यह हादसा केवल ड्राइवर की गलती का मामला नहीं था।
यह सवाल था—
बस में क्षमता से इतने अधिक यात्री कैसे बैठे?
ओवरलोडिंग की जांच किसने की?
फिटनेस और परमिट व्यवस्था कहां थी?
रूट पर निगरानी कौन कर रहा था?
हादसे के बाद कार्रवाई हुई, जांच के आदेश हुए और मुआवजे की घोषणा हुई। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिस्टम में स्थायी बदलाव हुआ?
नैनीताल: पर्यटन और सड़क सुरक्षा का विरोधाभास
नैनीताल उत्तराखंड का सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र है। यहां हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।
लेकिन हाल के वर्षों में नैनीताल और उसके आसपास लगातार गंभीर सड़क हादसे सामने आए हैं।
अक्टूबर 2023 में कालाढूंगी क्षेत्र में पर्यटकों से भरी बस खाई में गिर गई थी। हादसे में सात लोगों की मौत हुई और 26 लोग घायल हुए। बस हरियाणा से आए पर्यटकों को लेकर नैनital से लौट रही थी।
दिसंबर 2024 में भीमताल में उत्तराखंड रोडवेज की बस गहरी खाई में गिर गई। बस में 28 लोग सवार थे; चार लोगों की मौत और 24 लोग घायल हुए।
नवंबर 2025 में नैनीताल-हल्द्वानी हाईवे पर डो गांव के पास तीर्थयात्रियों से भरा टेंपो ट्रैवलर लगभग 50 फीट गहरी खाई में गिर गया। इसमें दो लोगों की मौत और 16 लोग घायल हुए।
मई 2026 में कैंची धाम के पास एक कार करीब 500 फीट गहरी खाई में गिर गई और उसमें सवार पांचों लोगों की मौत हो गई।
और अब अगस्त 2026 में मल्ला रामगढ़ के पास पर्यटकों का टेंपो ट्रैवलर फिर खाई में जा गिरा।
क्या इन घटनाओं को अलग-अलग हादसे मानकर भूल जाना चाहिए या इनके पीछे सड़क सुरक्षा की कोई साझा समस्या है?
हाईकोर्ट तक पहुंचा सड़क सुरक्षा का सवाल
नैनीताल जिले में सड़क सुरक्षा की समस्या केवल दुर्घटनाओं और मीडिया रिपोर्टों तक सीमित नहीं रही।
2025 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने काठगोदाम-लालकुआं सड़क के खतरनाक रोड कट्स को लेकर NHAI की आलोचना की थी। रिपोर्ट के अनुसार उस सड़क खंड पर एक साल में 14 मौतें हुई थीं और अदालत ने उच्चस्तरीय जांच की मांग की थी।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—
अगर सड़क की डिजाइन ही दुर्घटना का जोखिम बढ़ा रही है तो केवल वाहन चालक को दोषी ठहराकर समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
हादसे के लिए सिर्फ ड्राइवर जिम्मेदार है?
हर दुर्घटना के बाद सबसे आसान जवाब होता है—
“ड्राइवर की गलती थी।”
लेकिन सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार दुर्घटना अक्सर कई कारकों के संयुक्त परिणाम से होती है।
2025 में उत्तराखंड परिवहन विभाग से संबंधित रिपोर्ट में ओवरस्पीडिंग, हेलमेट/सीट बेल्ट का इस्तेमाल न करना और दुर्घटना के बाद चिकित्सा सहायता में देरी जैसे कारण सामने आए। अधिकारियों ने यह भी कहा कि दुर्घटना की जांच में ड्राइवर की गलती के साथ वाहन इंजीनियरिंग और सड़क डिजाइन जैसी परिस्थितियों की भी जांच होनी चाहिए।
इसलिए जांच के कम से कम पांच स्तर होने चाहिए—
- ड्राइवर की गलती
- वाहन की फिटनेस
- ओवरलोडिंग
- सड़क की डिजाइन और पैराफिट/क्रैश बैरियर
- प्रशासनिक निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया
क्या पर्यटन बढ़ाना और सड़क सुरक्षा घटाना साथ-साथ चल सकता है?
उत्तराखंड पर्यटन को बढ़ावा देना चाहता है।
सरकार पर्यटकों को नैनीताल, मसूरी, ऋषिकेश, चारधाम, कैंची धाम, औली और दूसरे पर्यटन स्थलों तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करती है।
लेकिन पर्यटन का अर्थ केवल पर्यटकों को बुलाना नहीं है।
पर्यटक को सुरक्षित घर वापस पहुंचाना भी पर्यटन नीति का हिस्सा होना चाहिए।
अगर किसी पर्यटन मार्ग पर—
- पर्याप्त क्रैश बैरियर नहीं हैं,
- सड़क किनारे पैराफिट कमजोर हैं,
- ब्लैक स्पॉट चिन्हित होने के बावजूद सुधार नहीं हुआ,
- रात में पर्याप्त संकेतक नहीं हैं,
- बारिश में सड़क की स्थिति खतरनाक है,
- ओवरलोड पर्यटक वाहन चल रहे हैं,
- ड्राइवरों की थकान और गति पर निगरानी नहीं है,
तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या हम पहले पर्यटकों को बुला रहे हैं और बाद में उनकी सुरक्षा के बारे में सोच रहे हैं?
उत्तराखंड में सड़क सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?
यह केवल परिवहन विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।
परिवहन विभाग
फिटनेस, परमिट, वाहन जांच और ड्राइवर संबंधी नियमों की निगरानी।
पुलिस/ट्रैफिक पुलिस
स्पीड, नशे में ड्राइविंग, ओवरलोडिंग, हेलमेट, सीट बेल्ट और यातायात नियमों का प्रवर्तन।
PWD/NHAI/सड़क निर्माण एजेंसियां
सड़क डिजाइन, क्रैश बैरियर, पैराफिट, साइनेज, ड्रेनेज और ब्लैक स्पॉट सुधार।
जिला प्रशासन
संवेदनशील मार्गों की पहचान, मानसून और पर्यटन सीजन में विशेष व्यवस्था।
स्वास्थ्य विभाग
दुर्घटना के बाद गोल्डन ऑवर में उपचार और ट्रॉमा नेटवर्क।
पर्यटन विभाग
पर्यटन मार्गों की सुरक्षा ऑडिट और पर्यटक वाहनों के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल।
सवाल यह है कि इन सभी विभागों के बीच दुर्घटना के लिए एक संयुक्त जवाबदेही व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
हर दुर्घटना के बाद जांच, फिर क्या?
उत्तराखंड में हादसे के बाद अक्सर एक पैटर्न दिखाई देता है—
हादसा → राहत एवं बचाव → मुआवजा → जांच के आदेश → कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई → मामला शांत।
लेकिन असली road-safety model होना चाहिए—
Risk identification → Prevention → Enforcement → Crash investigation → Corrective action → Public monitoring
यानी दुर्घटना होने से पहले जोखिम को खत्म करना।
सरकार से 10 बड़े सवाल
1. पिछले 10 वर्षों में कितने ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए गए और कितने वास्तव में सुधारे गए?
2. कितनी सड़कों का independent road safety audit हुआ?
3. कितने पैराफिट और क्रैश बैरियर मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए?
4. पर्यटक वाहनों की फिटनेस और ड्राइवरों की जांच कितनी नियमित है?
5. ओवरलोडिंग के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद बसों में क्षमता से अधिक यात्री कैसे पहुंचते हैं?
6. हादसे के बाद हुई विभागीय जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं होती?
7. जांच में केवल चालक को दोषी ठहराया जाता है या सड़क डिजाइन और प्रशासनिक लापरवाही भी जांची जाती है?
8. पर्यटन सीजन से पहले प्रमुख पर्यटन मार्गों का safety audit क्यों अनिवार्य नहीं किया जाता?
9. क्या प्रत्येक बड़े हादसे के बाद संबंधित सड़क पर permanent corrective action की समयसीमा तय है?
10. सड़क सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अधिकारी/विभाग के performance indicators में “कितने हादसे रोके गए” जैसी measurable accountability क्यों नहीं है?
आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं
2016 में उत्तराखंड में 1,591 सड़क दुर्घटनाएं और 962 मौतें दर्ज हुई थीं।
2024 में दुर्घटनाएं बढ़कर 1,747 और मौतें 1,090 हो गईं।
और 2025 के iRAD आंकड़ों में दुर्घटनाएं 1,846 तथा मौतें 1,242 तक पहुंच गईं।
अर्थात पिछले दशक में सड़क सुरक्षा की स्थिति में वह सुधार नहीं आया जिसकी उम्मीद की जानी चाहिए थी।
उलटे हाल के वर्षों में मौतों का आंकड़ा फिर ऊपर गया है।
निष्कर्ष: पर्यटक भी सुरक्षित, स्थानीय भी सुरक्षित
उत्तराखंड की सड़कें केवल पर्यटकों के लिए नहीं हैं।
इन सड़कों से स्कूल जाने वाले बच्चे, कर्मचारी, किसान, मरीज, पहाड़ से मैदान आने वाले परिवार, सेना के जवान और स्थानीय ग्रामीण रोज गुजरते हैं।
इसलिए सड़क सुरक्षा को केवल पर्यटन सुरक्षा नहीं, बल्कि जनजीवन और नागरिक अधिकार का विषय माना जाना चाहिए।
नैनीताल में आज कोई पर्यटक घायल होता है तो खबर बनती है।
लेकिन इसी सड़क पर रोज सफर करने वाला स्थानीय व्यक्ति दुर्घटना में मरता है तो वह शायद सिर्फ एक स्थानीय खबर बनकर रह जाता है।
व्यवस्था को दोनों की जिंदगी की कीमत बराबर समझनी होगी।
उत्तराखंड को पर्यटक चाहिए, विकास चाहिए, सड़कें चाहिए और कनेक्टिविटी चाहिए—लेकिन जान की कीमत पर नहीं।
सबसे बड़ा सवाल
जब सड़क ही सुरक्षित नहीं है, तो क्या सिर्फ पर्यटन बढ़ाने के आंकड़ों पर गर्व करना पर्याप्त है?
उत्तराखंड को अब यह तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकता क्या है—
“ज्यादा पर्यटक” या “सुरक्षित पर्यटक”?
असल जवाब होना चाहिए—
सुरक्षित सड़क + सुरक्षित स्थानीय + सुरक्षित पर्यटक = सुरक्षित उत्तराखंड
— देवभूमि के लोग | विशेष रिपोर्ट