पहाड़ में रोजगार की कमी नहीं, कमी है हुनरमंद युवाओं और सही प्रशिक्षण व्यवस्था की! उत्तराखंड सरकार हर युवा को बनाए कुशल कारीगर और उद्यमी
टाटा जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों से एमओयू, गांव-गांव तक विशेष कौशल केंद्र और ₹2–5 लाख तक ऋण की गारंटी; पहाड़ में ही रोजगार और स्वरोजगार का मजबूत नेटवर्क बनाने का समय
देहरादून। भानु प्रताप सिंह।
उत्तराखंड के पहाड़ों में रोजगार की संभावनाएं केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं हैं। निर्माण कार्य, बिजली और प्लंबिंग सेवाएं, पर्यटन, होटल उद्योग, वाहन मरम्मत, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर सेवाएं, कृषि आधारित व्यवसाय और स्थानीय उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में बड़ी संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। इसके बावजूद अनेक युवा रोजगार के लिए मैदानी शहरों और दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं।
सवाल यह है कि क्या पहाड़ में रोजगार के अवसर वास्तव में कम हैं, या स्थानीय युवाओं को उन अवसरों के अनुरूप प्रशिक्षण, पूंजी, बाजार और कंपनियों से जुड़ाव नहीं मिल पा रहा है?
यदि उत्तराखंड सरकार योजनाबद्ध तरीके से युवाओं को व्यावहारिक कौशल सिखाए, प्रतिष्ठित संस्थानों से प्रशिक्षण की गुणवत्ता सुनिश्चित करे और स्वरोजगार के लिए वित्तीय सहायता के साथ बाजार उपलब्ध कराए, तो पहाड़ों में रोजगार का एक नया आर्थिक मॉडल तैयार हो सकता है।
जरूरत हर युवा को नौकरी देने के वादे की नहीं, बल्कि हर युवा को रोजगार योग्य बनाने और अपना व्यवसाय शुरू करने का वास्तविक अवसर देने की है।
टाटा या बाहरी उत्कृष्ट कंपनियों से हो समझौता, प्रशिक्षण केवल प्रमाणपत्र तक सीमित न रहे
उत्तराखंड सरकार को टाटा समूह और उसकी संबंधित कौशल प्रशिक्षण संस्थाओं, अन्य प्रतिष्ठित औद्योगिक कंपनियों, तकनीकी संस्थानों तथा प्रमाणित प्रशिक्षण संगठनों के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) करने की दिशा में पहल करनी चाहिए।
इन समझौतों का उद्देश्य केवल युवाओं को प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देना नहीं, बल्कि उन्हें वास्तविक काम सिखाना, उपकरणों का इस्तेमाल कराना, व्यावसायिक अनुशासन विकसित करना और प्रशिक्षण के बाद रोजगार अथवा स्वरोजगार से जोड़ना होना चाहिए।
प्रशिक्षण केंद्रों का संचालन स्थानीय आईटीआई, पॉलिटेक्निक, सरकारी भवनों और उपलब्ध तकनीकी संस्थानों के माध्यम से किया जा सकता है। दुर्गम क्षेत्रों में मोबाइल प्रशिक्षण इकाइयां और ब्लॉक स्तर पर कौशल शिविर भी चलाए जा सकते हैं।
प्रशिक्षण की गुणवत्ता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि कितने युवाओं ने वास्तविक कौशल हासिल किया, कितनों को नौकरी मिली और कितनों का व्यवसाय छह महीने या एक वर्ष बाद भी सफलतापूर्वक चल रहा है।
किन क्षेत्रों में प्रशिक्षित किए जाएं पहाड़ के युवा?
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों और स्थानीय मांग को ध्यान में रखते हुए सरकार को रोजगारपरक कौशलों का एक व्यापक कार्यक्रम तैयार करना चाहिए।
1. निर्माण एवं तकनीकी सेवाएं
- प्लंबर और पाइपलाइन तकनीशियन
- घरेलू एवं औद्योगिक बिजली मिस्त्री
- कारपेंटर और फर्नीचर निर्माण
- राजमिस्त्री, टाइल्स लगाने और पेंटिंग का काम
- सोलर पैनल स्थापना और रखरखाव
- जल आपूर्ति, वाटर पंप और घरेलू उपकरणों की मरम्मत
2. वाहन और आधुनिक तकनीक
- मोटर मैकेनिक और दोपहिया वाहन मरम्मत
- इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी रखरखाव
- मोबाइल फोन रिपेयरिंग
- कंप्यूटर हार्डवेयर और नेटवर्किंग
- आईटी सपोर्ट, डिजिटल सेवाएं और ऑनलाइन कार्य
- सीसीटीवी तथा घरेलू सुरक्षा उपकरणों की स्थापना
3. पर्यटन और आतिथ्य सेवाएं
- प्रशिक्षित पर्यटन गाइड
- होटल, होमस्टे और रिसॉर्ट प्रबंधन
- कुकिंग, बेकरी और खाद्य सेवा
- ट्रेकिंग एवं साहसिक पर्यटन में सुरक्षा प्रशिक्षण
- प्राथमिक उपचार और आपदा प्रबंधन
- स्थानीय संस्कृति, इतिहास और विरासत की जानकारी
4. भाषा, व्यवहार और व्यावसायिक दक्षता
तकनीकी प्रशिक्षण के साथ युवाओं को बुनियादी अंग्रेजी, ग्राहक संवाद, शिष्टाचार, समयपालन, डिजिटल भुगतान, बिलिंग, हिसाब-किताब और व्यवसाय प्रबंधन भी सिखाया जाना चाहिए।
किसी होटल में काम करने वाले कर्मचारी, पर्यटन गाइड, बिजली मिस्त्री या मोबाइल रिपेयरिंग संचालक के लिए केवल तकनीकी जानकारी पर्याप्त नहीं है। ग्राहकों से अच्छा व्यवहार, स्पष्ट संवाद और समय पर सेवा देना भी उसकी कमाई और प्रतिष्ठा बढ़ाता है।
5. स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्वरोजगार
मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण, फल-सब्जी संरक्षण, स्थानीय उत्पादों की पैकेजिंग, हस्तशिल्प, होमस्टे, डेयरी और पहाड़ी उत्पादों की डिजिटल बिक्री जैसे क्षेत्रों में भी प्रशिक्षण और उद्यमिता सहायता दी जा सकती है।
₹2 लाख से ₹5 लाख तक ऋण: युवा अपना व्यवसाय शुरू कर सकें
प्रशिक्षण तभी प्रभावी होगा जब युवाओं के पास काम शुरू करने के लिए पूंजी भी हो। सरकार को पात्र युवाओं के लिए ₹2 लाख से ₹5 लाख तक के ऋण की सुविधा वाला एक लक्षित कार्यक्रम तैयार करना चाहिए।
उदाहरण के लिए, प्रशिक्षित बिजली मिस्त्री को उपकरण खरीदने, प्लंबर को औजार और परिवहन की व्यवस्था करने, मोबाइल रिपेयरिंग प्रशिक्षु को दुकान व मशीनें स्थापित करने तथा वाहन मैकेनिक को छोटा सर्विस सेंटर खोलने के लिए वित्तीय सहायता दी जा सकती है।
सरकार को इस दिशा में निम्नलिखित व्यवस्था पर विचार करना चाहिए:
- पात्रता और कौशल प्रमाणन के आधार पर सरल आवेदन प्रक्रिया।
- बैंक ऋण के साथ सरकारी क्रेडिट गारंटी या ब्याज सहायता की व्यवस्था, जहां नियमों के तहत संभव हो।
- जरूरतमंद युवाओं के लिए उपकरण खरीदने की सहायता।
- व्यवसाय योजना, लेखांकन और डिजिटल भुगतान का प्रशिक्षण।
- महिलाओं, दूरस्थ गांवों के युवाओं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए लक्षित सहायता।
- व्यवसाय शुरू होने के बाद कम-से-कम एक वर्ष तक मार्गदर्शन और प्रगति की निगरानी।
यह स्पष्ट होना चाहिए कि ₹2–5 लाख की सहायता एक प्रस्तावित नीति है, मौजूदा सार्वभौमिक सरकारी गारंटी नहीं। ऋण की शर्तें, पात्रता, पुनर्भुगतान और सरकारी गारंटी की सीमा योजना के नियमों के अनुसार तय की जानी चाहिए।
कंपनियों से हो सीधा समझौता, पहाड़ में ही मिले काम
सरकार को केवल प्रशिक्षण संस्थानों से समझौता करने के बजाय स्थानीय सेवा बाजार और कंपनियों के साथ भी साझेदारी करनी चाहिए।
होटल समूह, अस्पताल, निर्माण कंपनियां, वाहन सर्विस नेटवर्क, सोलर ऊर्जा कंपनियां, दूरसंचार सेवा प्रदाता और आईटी कंपनियां प्रशिक्षित युवाओं के लिए रोजगार, अप्रेंटिसशिप अथवा सेवा अनुबंध उपलब्ध करा सकती हैं।
जिन युवाओं का उद्देश्य अपना व्यवसाय शुरू करना है, उन्हें कंपनियों के अधिकृत सेवा प्रदाता, विक्रेता या फ्रेंचाइजी नेटवर्क से जोड़ने की संभावना तलाशनी चाहिए। इससे उन्हें शुरुआती ग्राहक, तकनीकी सहायता, उपकरणों की उपलब्धता और बाजार तक पहुंच मिल सकती है।
उदाहरण के तौर पर, किसी दूरस्थ ब्लॉक में प्रशिक्षित युवाओं का समूह प्लंबिंग, बिजली मरम्मत, सोलर उपकरणों और घरेलू मशीनों की सेवाएं देने वाला स्थानीय नेटवर्क बना सकता है। पर्यटन क्षेत्रों में प्रशिक्षित गाइड, वाहन चालक, होमस्टे संचालक और आतिथ्य कर्मियों का साझा नेटवर्क विकसित किया जा सकता है।
सरकारी विभागों और स्थानीय संस्थानों की मरम्मत एवं रखरखाव सेवाओं में भी, जहां खरीद और अनुबंध नियम इसकी अनुमति दें, योग्य स्थानीय सेवा प्रदाताओं को निष्पक्ष अवसर दिया जा सकता है।
गांव और ब्लॉक स्तर पर बने कौशल केंद्र
उत्तराखंड में प्रशिक्षण की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि युवाओं को हर बार देहरादून, हल्द्वानी या दूसरे बड़े शहरों में न जाना पड़े।
प्रत्येक जिले में रोजगार की मांग का आकलन करके ब्लॉक स्तर पर प्रशिक्षण केंद्रों का नेटवर्क बनाया जा सकता है। दुर्गम क्षेत्रों में स्थानीय विद्यालयों, आईटीआई और अन्य उपलब्ध संस्थानों के संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है।
सरकार को पहले चरण में चुनिंदा ब्लॉकों में पायलट परियोजना शुरू करनी चाहिए। स्थानीय रोजगार की मांग का सर्वेक्षण करके प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तय किए जाएं और फिर परिणामों के आधार पर योजना का विस्तार किया जाए।
इस मॉडल में युवाओं की संख्या के बजाय प्रशिक्षण के परिणामों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। प्रशिक्षण पूरा करने वालों में कितने युवाओं को रोजगार मिला, कितनों ने व्यवसाय शुरू किया, उनकी औसत आय कितनी बढ़ी और कितने व्यवसाय एक वर्ष बाद भी चल रहे हैं—इन आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
पलायन रोकने के लिए रोजगार को गांव की अर्थव्यवस्था से जोड़ना होगा
पहाड़ों से पलायन का कारण केवल बेरोजगारी नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, बाजार, इंटरनेट, पूंजी और स्थायी आय की कमी भी इसमें भूमिका निभाती है। इसलिए कौशल विकास कार्यक्रम को अन्य ग्रामीण विकास योजनाओं से जोड़ना जरूरी है।
यदि किसी गांव में प्रशिक्षित बिजली मिस्त्री या प्लंबर को पर्याप्त ग्राहक ही नहीं मिलते, तो उसका प्रशिक्षण अकेले स्थायी रोजगार नहीं दे सकता। इसी तरह पर्यटन गाइड को प्रशिक्षित करने के साथ पर्यटन मार्गों, परिवहन, सुरक्षा, प्रचार और पर्यटक सुविधाओं का विकास भी जरूरी है।
सरकार को स्थानीय मांग का आकलन करके यह तय करना चाहिए कि किस क्षेत्र में कितने प्रशिक्षित लोगों की जरूरत है और कितने युवाओं के लिए वास्तविक काम उपलब्ध कराया जा सकता है।
सरकार के सामने पांच ठोस मांगें
- कौशल साझेदारी: प्रतिष्ठित कंपनियों और प्रमाणित प्रशिक्षण संस्थानों के साथ समयबद्ध समझौते किए जाएं।
- ब्लॉक स्तर पर प्रशिक्षण: पहाड़ी जिलों में मांग आधारित तकनीकी, आईटी और पर्यटन प्रशिक्षण शुरू किया जाए।
- ₹2–5 लाख की वित्तीय सहायता: पात्र प्रशिक्षित युवाओं के लिए ऋण, क्रेडिट गारंटी और आवश्यकतानुसार ब्याज सहायता की व्यवस्था बनाई जाए।
- बाजार से जुड़ाव: प्रशिक्षण के बाद युवाओं को कंपनियों, अप्रेंटिसशिप, अधिकृत सेवा नेटवर्क और स्थानीय ग्राहकों से जोड़ा जाए।
- पारदर्शी परिणाम: हर जिले में प्रशिक्षण, रोजगार, स्वरोजगार, आय और व्यवसाय की निरंतरता के आंकड़े सार्वजनिक किए जाए
युवा केवल नौकरी मांगने वाला नहीं, सरकार सही स्किल सिखाए और सहायता करे तो रोजगार स्वयं करेगा ।
उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार के लिए लगातार दूसरे राज्यों की ओर जाने के बजाय अपने क्षेत्र में काम करने और व्यवसाय स्थापित करने के अवसर मिलने चाहिए। इसके लिए सरकार को कौशल विकास को प्रमाणपत्र बांटने वाली योजना के बजाय रोजगार और उद्यमिता से जुड़ी आर्थिक पहल के रूप में विकसि।
यदि तकनीकी प्रशिक्षण, अंग्रेजी और व्यवहार कौशल, शुरुआती पूंजी, कंपनियों से साझेदारी और स्थानीय बाजार को एक साथ जोड़ा जाए, तो पहाड़ों में अनेक छोटे व्यवसाय विकसित हो सकते हैं। इससे युवाओं की आय बढ़ाने, स्थानीय सेवाओं की उपलब्धता सुधारने और पलायन का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
उत्तराखंड सरकार के लिए अब सवाल यह है—क्या ऐसा कौशल एवं स्वरोजगार मॉडल तैयार किया जाएगा, जिसमें पहाड़ का युवा हुनर सीखे, सरकारी सहायता से अपना काम शुरू करे और अपने ही क्षेत्र में सम्मानजनक आजीविका अर्जित कर सके?
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