हिमाचल पुलिस चार सरकारी कर्मचारियों को गिरफ्तार कर ले गई, चोरी का माल पकड़ने वालों पर ही माल हड़पने का आरोप—विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल, व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न!
देवभूमि के लोग | विशेष रिपोर्ट
उत्तराखंड में कानून लागू कराने और अवैध शराब व तस्करी पर निगरानी रखने वाले आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिमला में एक घर से सोना, हीरे के आभूषण, नकदी, चांदी के सिक्के और अन्य कीमती सामान चोरी होने के मामले की जांच का तार उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर तक पहुंचा। आरोप है कि चोरी का सामान लेकर जा रहे लोगों को रुद्रपुर सीमा क्षेत्र में आबकारी विभाग की टीम ने रोका। लेकिन चोरी का माल पुलिस को सौंपने के बजाय उसमें से कीमती सामान का हिस्सा कथित तौर पर कर्मचारियों ने अपने पास रख लिया और आरोपियों को छोड़ दिया।
मामला खुलने के बाद हिमाचल पुलिस रुद्रपुर पहुंची। जांच में सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आबकारी विभाग के उप आबकारी निरीक्षक देवेंद्र कुमार, कांस्टेबल बलजीत सिंह, संविदा कर्मी पप्पू लाल और पीआरडी जवान नईम के नाम सामने आए। हिमाचल पुलिस ने चारों को गिरफ्तार कर लिया।
जिस विभाग को चोरी रोकनी थी, उसी पर चोरी का माल हड़पने का आरोप
मामले की गंभीरता सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जांच में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो जिस सरकारी टीम की जिम्मेदारी संदिग्ध गतिविधियों पर कार्रवाई करने और बरामद सामान को कानून के अनुसार सुरक्षित रखने की थी, उसी टीम पर बरामद चोरी का माल हड़पने का आरोप कैसे लगा?
रिपोर्टों के अनुसार, हिमाचल पुलिस की जांच के दौरान सीसीटीवी फुटेज से घटनाक्रम में शामिल कर्मचारियों की पहचान हुई। सूत्रों के हवाले से यह भी सामने आया है कि मामले में अन्य कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा सकती है।
सोशल मीडिया पर उठ रहे बड़े सवाल
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं—
क्या सरकारी चेकिंग व्यवस्था में बरामद सामान की कोई तत्काल पारदर्शी वीडियोग्राफी और जब्ती प्रक्रिया नहीं थी?
अगर चोरी का माल बरामद हुआ था तो उसे संबंधित पुलिस थाने को तत्काल क्यों नहीं सौंपा गया?
क्या सीमा क्षेत्रों की चेकिंग टीमों की निगरानी पर्याप्त है?
क्या सिर्फ निलंबन से सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही तय हो जाएगी?
और सबसे अहम सवाल—
अगर हिमाचल पुलिस जांच के लिए उत्तराखंड नहीं पहुंचती, तो क्या यह मामला सामने आता?
निलंबन के बाद भी असली सवाल बाकी
मामले में आबकारी दरोगा और कांस्टेबल के निलंबन की कार्रवाई की गई है। लेकिन निलंबन विभागीय कार्रवाई की शुरुआत हो सकती है, अंतिम जवाबदेही नहीं।
अब जरूरत इस बात की है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो—बरामद सामान कहां गया, किसके कब्जे में रहा, किसने किसे छोड़ा, सीसीटीवी में क्या दर्ज है, मौके पर कौन-कौन मौजूद था और क्या विभागीय प्रोटोकॉल का पालन हुआ?
ऐसे कर्मचारियों के कारण उत्तराखंड सरकार के विभाग की जग हंसवाई हो रहीं है। सोशियल मीडिया में लोग तरह तरह के सवाल उठा रहे हैं।
महत्वपूर्ण है कि क्या सरकार इन कर्मचारियों को कोई ट्रेनिंग नहीं देती है?
क्या सरकार की इन कर्मचारियों के व्यवहार पर कोई नजर नहीं रहती है?
क्या हिमाचल सरकार की पुलिस अगर जांच नहीं करती है तो ये खुलासा कभी हो पाता?
सरकार को शर्मसार करने वाले कर्मचारियों को बर्खास्त कर जेल नहीं होनी चाहिए?
सिस्टम पर बड़ा सवाल
यह मामला केवल चार कर्मचारियों की गिरफ्तारी का मामला बनकर खत्म नहीं होना चाहिए। यदि आरोप जांच में प्रमाणित होते हैं तो यह सरकारी अधिकार और जनता के भरोसे के दुरुपयोग का गंभीर मामला होगा।
आबकारी विभाग की टीमों को सड़क पर वाहन रोकने, तलाशी लेने और संदिग्ध सामान जब्त करने जैसी शक्तियां मिलती हैं। ऐसी शक्तियों के साथ पारदर्शिता, रिकॉर्डिंग, जब्ती की प्रक्रिया और वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।
उत्तराखंड सरकार और आबकारी विभाग के सामने अब सवाल साफ है—
क्या केवल कर्मचारियों को निलंबित कर मामला खत्म कर दिया जाएगा, या यह भी पता लगाया जाएगा कि सिस्टम में ऐसी स्थिति पैदा ही कैसे हुई?
देवभूमि के लोगों का सवाल है—अगर रक्षक पर ही चोरी के माल में हिस्सेदारी का आरोप लगे, तो जनता कानून-व्यवस्था पर भरोसा किस आधार पर करे?