10 साल में 1.4 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र बढ़ाने का लक्ष्य, उपलब्धि केवल 0.03409 मिलियन हेक्टेयर; CAG ने बताई 97.57% कमी
नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट | देवभूमि के लोग न्यूज़
भारत में पर्यावरण संरक्षण, वनीकरण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए चलाए जा रहे ग्रीन इंडिया मिशन (Green India Mission-GIM) की जमीनी प्रगति पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
CAG के Report No. 4 of 2026 के अनुसार, ग्रीन इंडिया मिशन के तहत 2015-16 से 2024-25 के दौरान वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए 1.4 मिलियन हेक्टेयर का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन उपलब्धि केवल 0.03409 मिलियन हेक्टेयर रही। यानी लक्ष्य के मुकाबले 97.57 प्रतिशत की कमी रही।
सरल भाषा में कहें तो जिस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 100 कदम आगे बढ़ना था, वहां करीब 2 कदम के बराबर ही उपलब्धि दर्ज हुई।
वन क्षेत्र की गुणवत्ता सुधारने में भी भारी कमी
सिर्फ वन क्षेत्र बढ़ाने का लक्ष्य ही पूरा नहीं हुआ, बल्कि मौजूदा वन क्षेत्र की गुणवत्ता सुधारने के मामले में भी प्रदर्शन कमजोर रहा।
CAG के मुताबिक, 1.4 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र की गुणवत्ता सुधारने के लक्ष्य के मुकाबले केवल 0.11384 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में उपलब्धि दर्ज की गई। यह लगभग 91.87 प्रतिशत की कमी है।
इसका मतलब यह है कि केवल पेड़ लगाने की संख्या पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह भी है कि लगाए गए पौधे जीवित रहें, उनका विकास हो, स्थानीय जैव-विविधता सुरक्षित रहे और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हो।
CAG ने उठाए निगरानी और पारदर्शिता पर सवाल
ऑडिट रिपोर्ट में केवल लक्ष्य पूरा न होने की बात नहीं कही गई है, बल्कि योजना के नियोजन, वित्तीय प्रबंधन, निगरानी और आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर भी गंभीर कमियां सामने आई हैं।
CAG के अनुसार—
- 14 राज्यों ने आवश्यक सार्वजनिक वेब-लिंक उपलब्ध नहीं कराए, जिससे पारदर्शिता प्रभावित हुई।
- ऑडिट में कुछ मामलों में उपलब्धियों के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आई।
- गैर-मान्य KML फाइलों और GIS विश्लेषण से संबंधित समस्याएं मिलीं।
- जांचे गए स्थलों में लगभग 70 प्रतिशत नमूना स्थलों पर GIM के कारण कोई स्पष्ट बदलाव दिखाई नहीं दिया।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पर्यावरणीय योजनाओं की सफलता केवल बजट खर्च होने या पौधे लगाए जाने से नहीं, बल्कि वास्तविक पर्यावरणीय परिणाम से मापी जानी चाहिए।
कार्बन अवशोषण की निगरानी भी कमजोर
जलवायु परिवर्तन के दौर में जंगलों का एक महत्वपूर्ण काम वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करना है।
लेकिन CAG के मुताबिक 2015 से 2025 के बीच मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर किसी राज्य ने कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन का आकलन नहीं किया।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन की मात्रा मापने के लिए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगाए गए फ्लक्स टावरों के रखरखाव और उपयोग में भी कमी रही तथा लगभग ₹3.50 करोड़ की लागत से निर्मित बुनियादी ढांचा निष्क्रिय पड़ा रहा।
यानी जिस समय भारत को यह जानना चाहिए था कि उसके जंगल वास्तव में कितना कार्बन सोख रहे हैं, वहां वैज्ञानिक निगरानी ही पर्याप्त रूप से नहीं हो पाई।
ग्रीन इंडिया मिशन आखिर है क्या?
ग्रीन इंडिया मिशन को भारत की जलवायु परिवर्तन संबंधी रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में शुरू किया गया था।
इसका उद्देश्य केवल नए पेड़ लगाना नहीं है, बल्कि—
वन और वृक्ष आवरण बढ़ाना, खराब हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करना, वन क्षेत्र की गुणवत्ता सुधारना, जैव-विविधता को मजबूत करना और पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं को बेहतर बनाना है।
लेकिन CAG के निष्कर्ष बताते हैं कि योजना की जमीनी क्रियान्वयन क्षमता और निर्धारित लक्ष्यों के बीच बड़ा अंतर मौजूद है।
CAMPA, MGNREGA और दूसरी योजनाओं के साथ तालमेल की कमी
CAG ने योजना की एक प्रमुख कमजोरी के रूप में convergence, यानी अलग-अलग सरकारी योजनाओं को एक साथ जोड़कर काम करने की कमी को रेखांकित किया।
ग्रीन इंडिया मिशन को CAMPA, MGNREGS तथा अन्य केंद्रीय और राज्य स्तरीय वनीकरण योजनाओं के साथ बेहतर तरीके से जोड़ने की जरूरत थी।
लेकिन CAG के अनुसार अलग-अलग योजनाओं और संस्थाओं के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं बन पाया। इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और बड़े स्तर पर पर्यावरणीय परिणाम हासिल करने की संभावना प्रभावित हुई।
सिर्फ पेड़ लगाने से नहीं बचेगा पर्यावरण
यह रिपोर्ट एक बड़े सवाल की ओर भी ध्यान खींचती है।
क्या पर्यावरण संरक्षण का मतलब केवल पौधारोपण अभियान, फोटो और आंकड़े रह गया है?
एक पेड़ लगाने के बाद उसकी निगरानी कौन करेगा?
कितने पौधे वास्तव में जीवित बचे?
क्या लगाए गए पौधे स्थानीय प्रजातियों के हैं?
क्या वन क्षेत्र में जैव-विविधता बढ़ी?
क्या जलस्रोत पुनर्जीवित हुए?
क्या मिट्टी का कटाव कम हुआ?
क्या कार्बन अवशोषण बढ़ा?
क्या स्थानीय समुदाय को संरक्षण में शामिल किया गया?
इन सवालों के जवाब पर्यावरणीय योजनाओं की वास्तविक सफलता तय करते हैं।
भारत की वैश्विक पर्यावरण रैंकिंग भी चिंता बढ़ाती है
ग्रीन इंडिया मिशन की CAG रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब भारत की वैश्विक पर्यावरणीय स्थिति को लेकर भी चिंता बनी हुई है।
Yale Center for Environmental Law & Policy और Columbia University के सहयोग से जारी 2024 Environmental Performance Index (EPI) में भारत 180 देशों में 176वें स्थान पर रहा।
भारत का EPI स्कोर 27.6/100 था। इस सूचकांक में 58 संकेतकों को 11 पर्यावरणीय श्रेणियों में शामिल किया गया था।
भारत से नीचे केवल कुछ देश—पाकिस्तान, वियतनाम, लाओस और म्यांमार—रहे।
भारत की EPI स्थिति
| क्षेत्र | भारत की रैंक |
|---|---|
| Overall EPI | 176/180 |
| Ecosystem Vitality | 171 |
| Biodiversity & Habitat | 178 |
| Air Quality | 177 |
| Climate Change | 133 |
| EPI Score | 27.6/100 |
महत्वपूर्ण: अगस्त 2026 तक Yale के आधिकारिक EPI पोर्टल पर उपलब्ध नवीनतम व्यापक EPI संस्करण 2024 है। इसलिए सोशल मीडिया पर चल रहे किसी कथित “2026 EPI” रैंक को आधिकारिक मानने से पहले उसके मूल Yale स्रोत की पुष्टि जरूरी है।
हवा और जैव-विविधता सबसे बड़ी चिंता
EPI में भारत का Air Quality rank 177 रहा।
वहीं Biodiversity & Habitat में भारत 178वें स्थान पर रहा।
यह स्थिति बताती है कि पर्यावरणीय संकट केवल जंगलों तक सीमित नहीं है।
यह संकट—
हवा, पानी, जंगल, वन्यजीव, जैव-विविधता, भूमि, कचरा और जलवायु—सभी क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।
हालांकि Climate Change श्रेणी में भारत की स्थिति overall EPI से बेहतर रही और भारत 133वें स्थान पर रहा।
2014 से 2024: रैंकिंग का क्या संदेश है?
भारत का EPI rank 2014 में 155 था, जबकि 2024 में यह 176 रहा। 2022 में भारत 180वें स्थान पर था।
इसलिए केवल एक साल की रैंकिंग देखकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। EPI की methodology और indicators समय के साथ बदल सकते हैं।
लेकिन लगातार निम्न प्रदर्शन यह जरूर संकेत देता है कि आर्थिक विकास के साथ पर्यावरणीय परिणामों को समान प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
क्या पर्यावरण संरक्षण और विकास एक-दूसरे के विरोधी हैं?
नहीं।
असल चुनौती यह है कि विकास की ऐसी नीति बनाई जाए जिसमें सड़क, उद्योग, शहर, ऊर्जा और रोजगार के साथ—
जंगल, नदियां, पहाड़, मिट्टी, हवा और जैव-विविधता भी सुरक्षित रहें।
विशेषकर हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में यह और भी महत्वपूर्ण है।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में जंगल केवल हरियाली नहीं हैं। वे—
- जलस्रोतों के संरक्षण,
- भूस्खलन के जोखिम को कम करने,
- मिट्टी संरक्षण,
- जैव-विविधता,
- स्थानीय आजीविका,
- जलवायु नियंत्रण
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए हिमालय में पर्यावरणीय योजनाओं की सफलता का मूल्यांकन केवल कितने पौधे लगाए गए से नहीं, बल्कि कितने पौधे बचे और पारिस्थितिकी तंत्र कितना मजबूत हुआ से होना चाहिए।
CAG रिपोर्ट से निकलते हैं ये बड़े सवाल
1. लक्ष्य इतना बड़ा था तो जमीन पर उपलब्धि इतनी कम क्यों रही?
2. योजनाओं में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद परिणामों की स्वतंत्र निगरानी क्यों कमजोर रही?
3. पौधारोपण के बाद survival rate की नियमित जांच क्यों नहीं हुई?
4. GIS और KML आधारित आंकड़ों का स्वतंत्र सत्यापन क्यों नहीं हुआ?
5. कार्बन sequestration का वैज्ञानिक मूल्यांकन राज्यों में अनिवार्य क्यों नहीं किया गया?
6. स्थानीय ग्राम सभाओं और समुदायों की भूमिका क्यों मजबूत नहीं हुई?
7. CAMPA, MGNREGA और GIM के बीच बेहतर तालमेल क्यों नहीं बनाया गया?
8. पर्यावरणीय योजनाओं की सफलता को केवल expenditure और plantation numbers से क्यों मापा जाए?
अब क्या होना चाहिए?
भारत को पर्यावरण संरक्षण की नीति को “पेड़ लगाओ” से “पारिस्थितिकी तंत्र बचाओ” की दिशा में ले जाना होगा।
इसके लिए—
पहला, प्रत्येक पौधारोपण स्थल की GPS/GIS आधारित निगरानी हो।
दूसरा, पौधे लगाने वाली एजेंसी के भुगतान का एक हिस्सा कम-से-कम 3–5 वर्ष की survival rate से जोड़ा जाए।
तीसरा, हर जिले में सार्वजनिक environmental dashboard बनाया जाए।
चौथा, वन क्षेत्र, जलस्रोत, जैव-विविधता और कार्बन sequestration की नियमित वैज्ञानिक monitoring हो।
पांचवां, ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण में वास्तविक भागीदारी दी जाए।
छठा, पर्यावरणीय योजनाओं का social audit हो।
सातवां, satellite data, GIS और field verification को एक साथ इस्तेमाल किया जाए।
आठवां, केवल plantation नहीं बल्कि native species, natural regeneration और ecosystem restoration को प्राथमिकता दी जाए।
प्रकृति को आंकड़ों से नहीं, परिणामों से बचाना होगा
ग्रीन इंडिया मिशन में 97.57% की कमी का CAG निष्कर्ष केवल एक सरकारी योजना की विफलता का आंकड़ा नहीं है। यह उस बड़े सवाल की ओर संकेत करता है कि भारत में पर्यावरण संरक्षण की योजनाएं कागज से जमीन तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंच रही हैं।
भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो जंगलों, नदियों, पहाड़ों और जैव-विविधता को कमजोर कर दे, वह लंबे समय में स्वयं मानव जीवन और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।
CAG की 98% कमी और EPI में 176वीं रैंक—दोनों को मिलाकर देखें तो संदेश साफ है: अब पर्यावरण को विकास की “साइड इश्यू” नहीं, बल्कि विकास की बुनियादी शर्त बनाना होगा।
क्योंकि अंततः—
**“प्रकृति सुरक्षित होगी, तभी अर्थव्यवस्था सुरक्षित होगी;
और पर्यावरण बचेगा, तभी मानव जीवन बचेगा।”