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उत्तर प्रदेश और बिहार का विभाजन जरूरी: छोटे राज्यों की सफलता, विकास की कुंजी और तेज प्रगति का रास्ता

नई दिल्ली/लखनऊ/पटना, 18 जून 2026/-B P Singh– भारत की राजनीतिक और आर्थिक बहस में एक बार फिर बड़ा सवाल उठ रहा है: क्या विशाल राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश (यूपी) और बिहार को छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित कर विकास को तेज किया जा सकता है? वर्ष 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद से छोटे राज्यों की सफलता के उदाहरण सामने हैं। यूपी को लगभग 10 छोटे राज्यों और बिहार को कम से कम 5 छोटे राज्यों में बांटने की मांग जोर पकड़ रही है। यह रिपोर्ट जनसंख्या, जीडीपी, विकास संकेतकों, प्रवासन, सीमा क्षेत्रों के उदाहरणों, छोटे राज्यों की प्रगति और दोनों राज्यों के आर्थिक-सामाजिक विश्लेषण पर विस्तृत आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई है।

भारत में बड़े बनाम छोटे राज्यों की वास्तविकता

भारत में बड़े राज्य प्रशासनिक चुनौतियों, संसाधनों के असमान वितरण, दूर-दराज क्षेत्रों तक शासन की पहुंच न होने और भ्रष्टाचार की जड़ों से जूझते हैं। यूपी की अनुमानित जनसंख्या 2026 में 24.35 करोड़ (कुछ अनुमानों में 24.82 करोड़) है, जो पूरे देश की आबादी का करीब 17% है। बिहार की जनसंख्या 13.29 करोड़ (132.85 मिलियन) के आसपास है।

जनसंख्या डेटा (2026 अनुमानित):

  • उत्तर प्रदेश: 24.35 करोड़
  • बिहार: 13.29 करोड़
  • झारखंड: लगभग 4.11 करोड़
  • उत्तराखंड: लगभग 1.20 करोड़

यदि यूपी एक अलग देश होता तो यह दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल होता। बड़े राज्यों में एक मुख्यमंत्री या प्रशासन के लिए पूरे क्षेत्र की विविध समस्याओं (कृषि, उद्योग, पर्यटन, आदिवासी विकास) को संभालना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। छोटे राज्य बेहतर फोकस, जवाबदेही, तेज निर्णय और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नीतियां बनाने में सक्षम साबित होते हैं।

जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय: छोटे राज्यों की बेहतर स्थिति

जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय डेटा (2024-25 या नवीनतम अनुमान):

  • उत्तराखंड: प्रति व्यक्ति आय ₹2.96 लाख से ₹3.19 लाख (राष्ट्रीय औसत के करीब या ऊपर)। कुल जीएसडीपी में योगदान उल्लेखनीय।
  • झारखंड: प्रति व्यक्ति आय ₹1.16 लाख से ₹1.28 लाख।
  • उत्तर प्रदेश: प्रति व्यक्ति आय ₹1.08 लाख से ₹1.24 लाख (राष्ट्रीय औसत से नीचे)।
  • बिहार: प्रति व्यक्ति आय ₹76,490 (देश में सबसे कम में से एक)।

उत्तराखंड ने 2000 में यूपी से अलग होने के बाद प्रति व्यक्ति आय में दोगुने से अधिक सुधार दिखाया। 2000 से पहले यूपी का हिस्सा बड़ा था, लेकिन अब उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय यूपी से काफी ऊपर है। झारखंड ने खनिज संसाधनों पर फोकस कर कुछ प्रगति की, हालांकि चुनौतियां बनी रहीं। छोटे राज्यों में एचडीआई (Human Development Index), साक्षरता, स्वास्थ्य और आय संकेतक अक्सर बेहतर होते हैं। केरल, गोवा, हिमाचल जैसे छोटे राज्य उच्च एचडीआई (0.75+) दिखाते हैं, जबकि यूपी (लगभग 0.59) और बिहार (लगभग 0.57) निचले पायदान पर हैं।

छोटे राज्यों की सफलता: विकास और प्रगति के उदाहरण

उत्तराखंड: 2000 में यूपी से अलग होने के बाद पर्यटन, उद्योग (SIDCUL), शिक्षा और स्वास्थ्य पर फोकस। प्रति व्यक्ति आय यूपी से दोगुनी से ज्यादा। सड़क, बिजली, डिजिटल प्रशासन में सुधार। हालांकि पलायन और सीमांत क्षेत्रों की चुनौतियां बनी हैं।

झारखंड: बिहार से अलग होकर खनिज-आधारित उद्योगों, राजस्व और शहरी विकास में वृद्धि। रांची, जमशेदपुर जैसे क्षेत्र औद्योगिक केंद्र बने।

छत्तीसगढ़: मध्य प्रदेश से अलग होकर आदिवासी विकास पर फोकस।

अध्ययनों से साफ है कि छोटे राज्य बेहतर शासन, संसाधन आवंटन और नागरिक पहुंच सुनिश्चित करते हैं। उत्तराखंड ने यूपी से अलग होकर “असाधारण” विकास दिखाया।

सीमावर्ती क्षेत्रों की तुलना: उत्तराखंड vs यूपी, झारखंड vs बिहार

उत्तराखंड के देहरादून, हरिद्वार, रुद्रपुर जैसे शहरों ने औद्योगिक विकास देखा। यूपी के सीमावर्ती जिलों (सहारनपुर, मुजफ्फरनगर आदि) में अभी भी चुनौतियां हैं। झारखंड के रांची-जमशेदपुर क्षेत्र ने निवेश आकर्षित किया, जबकि बिहार के कई जिलों में कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था प्रमुख है। ये उदाहरण दिखाते हैं कि क्षेत्रीय विशिष्ट जरूरतों (पहाड़ी पर्यटन, खनिज, आदिवासी विकास) को छोटे राज्य बेहतर संभाल सकते हैं।

प्रवासन: बड़े राज्यों की मजबूरी

बड़े राज्यों में बेरोजगारी, कम विकास और कृषि संकट के कारण भारी पलायन होता है।

यूपी से प्रवासन: दिल्ली-NCR, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, गुजरात आदि। लाखों लोग रोजगार की तलाश में जाते हैं।
बिहार से प्रवासन: दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र। बिहार देश के सबसे बड़े श्रमिक आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है।

छोटे राज्य स्थानीय रोजगार सृजन से इस पलायन को कम कर सकते हैं।

यूपी को 10 छोटे राज्यों में क्यों बांटें?

यूपी का क्षेत्रफल 2.43 लाख वर्ग किमी, 75 जिलों में बंटा। लखनऊ से पूर्वांचल या बुंदेलखंड तक प्रभावी शासन पहुंचना कठिन।

संभावित विभाजन (प्रस्तावित क्षेत्र):

  1. पश्चिम प्रदेश
  2. ब्रज प्रदेश
  3. अवध
  4. बुंदेलखंड
  5. पूर्वांचल
  6. काशी क्षेत्र
  7. गोरखप्रदेश
  8. तराई प्रदेश
  9. प्रयाग क्षेत्र
  10. मध्य गंगा प्रदेश

लाभ: बेहतर प्रशासनिक नियंत्रण, क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति, संसाधनों का समान वितरण, तेज विकास। प्रत्येक छोटा राज्य कृषि, उद्योग, पर्यटन आदि पर फोकस कर सकता है। जवाबदेही बढ़ेगी।

बिहार को कम से कम 5 छोटे राज्यों में विभाजन क्यों जरूरी?

बिहार की सांस्कृतिक-भौगोलिक विविधता (मगध, मिथिला, भोजपुर, सीमांचल, तिरहुत) को अलग-अलग राज्यों में बेहतर संभाला जा सकता है।

संभावित क्षेत्र: मिथिला, मगध, भोजपुर, सीमांचल, तिरहुत। इससे कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास में तेजी आएगी। झारखंड विभाजन से बिहार को कुछ फायदा हुआ, लेकिन और सुधार की जरूरत है।

छोटे राज्यों के आर्थिक लाभ

  1. प्रशासनिक दक्षता: स्थानीय जरूरतों को बेहतर समझ।
  2. निवेश आकर्षण: तेज निर्णय प्रक्रिया।
  3. बेहतर निगरानी: परियोजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन।
  4. क्षेत्रीय पहचान: स्थानीय संस्कृति, भाषा को प्रोत्साहन।

अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: जर्मनी (16 राज्य), अमेरिका (50 राज्य), स्विट्जरलैंड (26 कैंटन) – विकेंद्रीकरण विकास का आधार।

चुनौतियां

  • नई राजधानियों का खर्च
  • संसाधन बंटवारा
  • राजनीतिक विवाद
  • जल, बिजली, परिसंपत्तियों का विभाजन
  • प्रशासनिक ढांचा तैयार करना

2000 के अनुभव से सीखकर इनका समाधान संभव है। केवल विभाजन पर्याप्त नहीं – सुशासन, निवेश, शिक्षा और स्वास्थ्य जरूरी।

क्यों जरूरी है विभाजन- छोटा राज्य प्रगति की कुंजी?

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे विशाल राज्यों में प्रशासनिक चुनौतियां वास्तविक हैं। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के अनुभव बताते हैं कि छोटे राज्य कई मामलों में तेज विकास, बेहतर शासन और क्षेत्रीय संतुलन ला सकते हैं। यूपी और बिहार का विभाजन भारत की विकास गाथा को नई दिशा दे सकता है। आंकड़े, उदाहरण और विशेषज्ञ विश्लेषण साफ बताते हैं – छोटा शासन, बड़ा विकास। केंद्र और राज्य सरकारों को आयोग गठित कर विस्तृत अध्ययन करना चाहिए। यह बहस राष्ट्रहित में है।

संदर्भ: MoSPI, राज्य आर्थिक सर्वेक्षण, जनगणना अनुमान, NITI Aayog आदि। आंकड़े समय के साथ बदल सकते हैं। विकास की दिशा में यह चर्चा सकारात्मक है।

(लेखक भानु प्रताप सिंह – अस्कोट, पिथौरागढ़, उत्तराखंड से ताल्लुक रखते हैं और “देवभूमि के लोग अखबार” के संपादक हैं )

By B P Singh

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