जवाबदेही की आवश्यकता
विशेष विस्तृत रिपोर्ट – 7 मई 2026, बी पी सिंह/देहरादून- नैनीताल
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के भिकियासैंण क्षेत्र में रापड़-गगोडा-चमडखान-सोनी रानीखेत मोटर मार्ग पर एक भयावह सड़क दुर्घटना ने पूरे क्षेत्र को शोक में डुबो दिया है। एक कार अनियंत्रित होकर गहरी खाई में गिर गई, जिसकी चपेट में आने से कार के परखच्चे उड़ गए और सवार तीनों लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। यह घटना 7 मई को हुई, जब कार रानीखेत की ओर जा रही थी।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दुर्घटना इतनी भयानक थी कि इलाके में अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलते ही पुलिस, एसडीआरएफ और स्थानीय प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची। स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से शवों को खाई से निकाला गया। मृतकों की पहचान की प्रक्रिया जारी है। इस घटना ने एक बार फिर सवाल उठा दिया है कि देवभूमि उत्तराखंड, जो पर्यटन और तीर्थयात्रा का प्रमुख केंद्र है, अपनी सड़कों को सुरक्षित क्यों नहीं बना पा रहा है?
उत्तराखंड में सड़क दुर्घटनाएं: आंकड़े चिंताजनक
उत्तराखंड में सड़क दुर्घटनाएं कोई नई समस्या नहीं हैं। परिवहन विभाग और आईआरएडी (Integrated Road Accident Database) के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में राज्य में 1,846 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,242 लोगों की मौत हुई और 2,056 घायल हुए। 2024 में यह आंकड़ा 1,747 दुर्घटनाएं, 1,090 मौतें था। यानी एक साल में वृद्धि दर्ज की गई।
पहाड़ी क्षेत्रों में दुर्घटनाओं की गंभीरता (severity) बहुत अधिक है। प्रति 100 दुर्घटनाओं पर मौतों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। अप्रैल 2026 में ही टिहरी गढ़वाल के चंबा क्षेत्र में एक यूटिलिटी वाहन खाई में गिरने से 8 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि रुद्रप्रयाग में एक अन्य दुर्घटना में 3 मौतें हुईं – ऐसे ही हर दिन ऐसी खबरें जैसे अब आम हो चुकी हैं।
पिछले 10 दिनों (अप्रैल अंत से मई 2026 तक) में अल्मोड़ा, टिहरी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, चमोली समेत विभिन्न जिलों में कई छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं हुई हैं। रानीखेत क्षेत्र में ही हाल में कार घर की छत पर गिरने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। राज्य भर में पहाड़ी सड़कों पर वाहन खाई में गिरने की घटनाएं आम हैं।
पर्यटन राज्य की लापरवाही: सुरक्षित सड़कें क्यों नहीं?
उत्तराखंड पर्यटन पर निर्भर राज्य है। चारधाम यात्रा, हिल स्टेशंस, ट्रेकिंग और एडवेंचर टूरिज्म लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। लेकिन सड़कें इन आगंतुकों के लिए अभिशाप बन रही हैं। पहाड़ी इलाकों में संकरी, घुमावदार, बिना बैरियर वाली सड़कें, खराब रखरखाव, भूस्खलन और खराब मौसम दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं।
काले धब्बे (Black Spots): राज्य में सैकड़ों दुर्घटना-प्रवण स्थल चिन्हित हैं, लेकिन अधिकांश पर कोई स्थायी सुधार नहीं हुआ। राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी बैरियर, पैरापेट और साइनेज की कमी घातक साबित हो रही है।
सड़क निर्माण में खुला भ्रष्टाचार: आखिर इतना पैसा कहां जा रहा है?
यह खुला राज है कि उत्तराखंड में सड़क निर्माण और मरम्मत में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। नताओं का पसंदीदा कार्य ठेकेदारी ही है ताकि मोटा मुनाफा उठाया जा सके। ठेकेदार निम्न गुणवत्ता वाली सामग्री का उपयोग करते हैं, मोटी कमिशनबाजी होती है, और अधिकारी मिलीभगत से काम चलाते हैं। परिणामस्वरूप, मानसून आने से पहले सड़कें ध्वस्त हो जाती हैं।
कई रिपोर्ट्स और जांचों में पाया गया कि आवंटित फंड का बड़ा हिस्सा बीच में गायब हो जाता है। पीडब्ल्यूडी, बीआरओ और अन्य एजेंसियों के काम की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहते हैं। कंक्रीटिंग के नाम पर पतली परत, बिना ड्रेनेज सिस्टम, और बिना स्ट्रक्चरल सपोर्ट के काम किए जाते हैं। नतीजा – बारिश या हल्के भूस्खलन में सड़कें बह जाती हैं या क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
अधिकारियों पर कोई जवाबदेही नहीं। दुर्घटना के बाद मुआवजा, जांच का ऐलान होता है, लेकिन लंबे समय में सुधार नजर नहीं आता। परिवहन मंत्री बयान देते हैं, लेकिन ग्राउंड रियलिटी अलग है। समय समय पर सोशल मीडिया में बंदरबाट के वीडियो आम बात है किंतु दुर्भाग्य है कि जांच बैठा कर भी कहीं कोई कार्यवाही नहीं होती है, जिससे सुधार की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है क्योंकि जिम्मेदार को पता है कि लीपापोती कर के उसने अंत में बच ही जाना है, और लगातार निर्दोष लोग मौत के मुंह में समाते रहते हैं।
सुरक्षित सड़कें: विकास की कुंजी
सुरक्षित सड़कें न केवल जान-माल की रक्षा करती हैं बल्कि पर्यटन, व्यापार, कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारतीय सड़क सुरक्षा रिपोर्ट्स के अनुसार, सड़क दुर्घटनाएं आर्थिक नुकसान का बड़ा कारण हैं। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां यातायात मुख्य रूप से सड़क पर निर्भर है, यह और भी महत्वपूर्ण है।
समाधान के सुझाव:
- पैरापेट और क्रैश बैरियर: सभी पहाड़ी सड़कों पर मजबूत पैरापेट दीवारें और क्रैश बैरियर लगाए जाएं। इससे वाहन खाई में गिरने से बच सकते हैं।
- वृक्षारोपण: सड़क के दोनों ओर उपयुक्त पेड़ लगाएं। ये न केवल मिट्टी को बांधेंगे, भूस्खलन रोकेंगे, बल्कि प्राकृतिक बैरियर का काम भी करेंगे।
- ब्लैक स्पॉट्स पर तत्काल कार्य: सभी चिन्हित ब्लैक स्पॉट्स पर शॉर्ट-टर्म (साइनेज, स्पीड ब्रेकर, लाइटिंग) और लॉन्ग-टर्म (रोड वाइडनिंग, बैरियर) सुधार।
- ड्राइवर ट्रेनिंग और जागरूकता: स्थानीय ड्राइवरों के लिए अनिवार्य ट्रेनिंग, स्पीड लिमिट सख्ती से लागू, ओवरलोडिंग पर रोक।
- तकनीकी निगरानी: सीसीटीवी, AI आधारित मॉनिटरिंग, इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम।
- स्वतंत्र ऑडिट: हर सड़क प्रोजेक्ट का थर्ड-पार्टी ऑडिट अनिवार्य। भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई।
- कम्युनिटी इन्वॉल्वमेंट: स्थानीय पंचायतों और ग्रामीणों को सड़क रखरखाव में शामिल करें।
विगत की घटनाएं: सबक क्यों नहीं सीखा?
- 2024 में अल्मोड़ा के साल्ट में बस दुर्घटना में 36 मौतें।
- रुद्रप्रयाग में टेम्पो ट्रैवलर दुर्घटना में 15 मौतें।
- अप्रैल 2026 टिहरी में 8 मौतें।
- अब अल्मोड़ा में 3 मौतें।
- बिना दुर्घटना के कोई दिन नहीं
आंकड़ों से साफ है कि पहाड़ी जिलों (अल्मोड़ा, पौड़ी, चमोली, टिहरी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़) में दुर्घटनाएं अधिक घातक हैं।
अधिकारियों की निष्क्रियता और जवाबदेही की कमी
दुर्घटना के बाद नेतागण व्यक्त करते हैं, मुआवजे का ऐलान करते हैं, लेकिन सिस्टेमेटिक बदलाव नहीं आता। सड़क सुरक्षा समितियां बनती हैं, बैठकें होती हैं, लेकिन इम्प्लीमेंटेशन जीरो। भ्रष्टाचार की शिकायतें दबा दी जाती हैं।
पर्यटन विभाग और सड़क निर्माण विभाग के बीच समन्वय की कमी भी समस्या है। चारधाम यात्रा के दौरान सड़कें सुधारी जाती हैं, लेकिन बाकी समय उपेक्षा।
जवाबदेही है जरूरी
उत्तराखंड की सड़कें न केवल स्थानीय निवासियों बल्कि लाखों पर्यटकों, श्रद्धालुओं की जान ले रही हैं। यह स्वीकार्य नहीं। सरकार को तत्काल एक व्यापक रोड सेफ्टी मास्टर प्लान लागू करना चाहिए, जिसमें इंजीनियरिंग, एनफोर्समेंट, एजुकेशन और इमरजेंसी केयर (4E) शामिल हो।
हर दुर्घटना का कोई कारण होता है, सड़क बनाते वक्त क्रैश बैरियर आवश्यक है किंतु घटिया गुणवत्ता वाले क्रैश बैरियर बनाए जाते हैं, या फिर कई जगह भ्रष्टाचार कर बनाए ही नहीं जाते, इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में भ्रष्टाचार आम बात हो चुकी है जहां हर वर्ग पर नीयत कट तय किया जाता है। एक सड़क जिसे दस साल चलना चाहिए वो दस महीने भी मुश्किल से टिकती है, एक्सीडेंट होते हैं किंतु कमियों को सुधारा तक नहीं जाता और फिर वही पॉइंट पर कई बार एक्सीडेंट होते रहते हैं। जिस व्यवस्था में लगातार प्रगति और सुधार नहीं किया जाएगा तो एक सीमा के बाद व्यवस्था चरमरानी तय है।
वृक्षारोपण, मजबूत पैरापेट और क्रैश बैरियर जैसी सरल लेकिन प्रभावी उपायों से कई जानें बचाई जा सकती हैं। भ्रष्टाचार पर लगाम और अधिकारियों पर जवाबदेही तय किए बिना सुधार संभव नहीं।
देवभूमि की मिट्टी पर एक्सीडेंट और लाशों का बोझ बढ़ता जा रहा है। अब बस बयानों और आश्वासनों से काम नहीं चलेगा। ठोस कार्रवाई चाहिए। जनता सुरक्षित सड़कों की मांग कर रही है।
सड़कें सुरक्षित हों, तब जाकर देवभूमि सही मायने में स्वर्ग बनेगी।
