नई दिल्ली/देहरादून, 26 अप्रैल 2026: Bhanu Pratap Singh– अप्रैल 2026 के अंतिम सप्ताह में भारत ने एक बार फिर चरम गर्मी का सामना किया। भारत मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में तापमान 42-45°C तक पहुंच गया। कई जगहों पर 44-45°C दर्ज किए गए। विश्व स्तर पर भी भारत सुर्खियों में रहा, क्योंकि दुनिया के सबसे गर्म शहरों में से अधिकांश भारत में थे।
इस बीच, उत्तराखंड में भी गर्मी का प्रभाव साफ दिख रहा है। राज्य के मैदानी इलाकों (जैसे रुड़की, खटीमा, ऊधम सिंह नगर) में तापमान 40°C तक पहुंच गया है। 24 अप्रैल 2026 को रुड़की में 40.0°C दर्ज किया गया, जबकि देहरादून में लगभग 33-35°C के आसपास रहा। पहाड़ी क्षेत्रों में भी तापमान सामान्य से ऊपर है – न्यूनतम तापमान भी ऊंचे रहे (मुक्तेश्वर में 14.3°C)। IMD के 24 अप्रैल बुलेटिन के अनुसार, मैदानी इलाकों में अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर से काफी ऊपर रहा, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में सामान्य से ऊपर रहा। अगले 4-5 दिनों में तापमान में कोई बड़ा बदलाव नहीं होने की संभावना है।
कुछ जिलों में बारिश और आंधी-तूफान की चेतावनी भी जारी की गई है, लेकिन कुल मिलाकर राज्य गर्मी की दोहरी मार झेल रहा है – मैदानों में भीषण गर्मी और पहाड़ों में सूखापन व जंगल की आग।
उत्तराखंड में क्यों “जल रहे” हैं पहाड़? इस वर्ष असामान्य गर्मी के मुख्य कारण
पारंपरिक रूप से ठंडे माने जाने वाले हिमालयी क्षेत्र इस वर्ष गर्मी से बुरी तरह प्रभावित हैं। उत्तराखंड में 2026 की शुरुआत से ही जंगल की आग की घटनाएं बढ़ी हुई हैं। नवंबर 2025 से फरवरी 2026 तक ही 54 से अधिक आग की घटनाएं दर्ज की गईं, जो सामान्य से काफी अधिक हैं। पूरे वर्ष में जंगल की आग की घटनाओं में 56% की वृद्धि (2019-2024 की तुलना में) देखी गई। आग अब 3000-4000 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच रही है, जो पहले कम देखा जाता था।
मुख्य कारण:
- जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग: हिमालय क्षेत्र भारत के अन्य हिस्सों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है। सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) कमजोर और कम संख्या में आ रहे हैं, जिससे सर्दियों में वर्षा और बर्फबारी में भारी कमी आई। 2021 में सर्दियों की वर्षा 182 मिमी थी, जो 2026 में लगभग शून्य के करीब पहुंच गई। बर्फबारी में 70% की कमी से हाइड्रोलॉजिकल सूखा (hydrological drought) पैदा हो गया। सूखी मिट्टी, कम नमी और बढ़ता तापमान जंगल की आग को बढ़ावा दे रहा है।
- वन कटाई, वनस्पति ह्रास और सूखा: उत्तराखंड में वनों की कटाई, कृषि विस्तार, अवैध कटाई और प्रदूषण से वनस्पति घट रही है। सैटेलाइट अध्ययनों से पता चला कि कुछ क्षेत्रों में वन कवर में गिरावट आई है। चिर पाइन (chir pine) के सूखे पत्ते और सुइयां अत्यधिक ज्वलनशील हैं। सूखे मौसम में ये ईंधन (fuel load) का काम करती हैं।
- मानवीय गतिविधियां: कृषि अवशेष जलाना, सिगरेट के टुकड़े, कैंप फायर और पर्यटन से जुड़ी गतिविधियां आग की मुख्य वजह बन रही हैं। परंपरागत वन प्रबंधन (जैसे चराई और नियंत्रित जलाना) कम होने से जंगल के फर्श पर सूखा पत्ती-कचरा जमा हो गया है।
- शहरीकरण और स्थानीय प्रभाव: पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियां, सड़कें और कंक्रीट संरचनाएं स्थानीय माइक्रोक्लाइमेट बिगाड़ रही हैं। मैदानी इलाकों (देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर) में शहरी हीट आइलैंड प्रभाव से गर्मी बढ़ रही है।
IMD के पूर्वानुमान में भी अप्रैल-जून 2026 में उत्तराखंड सहित पश्चिमी हिमालय में तापमान सामान्य से ऊपर रहने और हीटवेव दिनों की संभावना जताई गई थी।
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भारत में तापमान वृद्धि के व्यापक कारण (पहले की रिपोर्ट से संक्षेप)
- ग्लोबल वार्मिंग: ग्रीनहाउस गैसें, 2024-2025 सबसे गर्म वर्ष।
- शहरी हीट आइलैंड (UHI): कंक्रीट, अस्फाल्ट गर्मी सोखते हैं और रात में छोड़ते हैं।
- वन कटाई: evapotranspiration घटने से प्राकृतिक शीतलन कम।
- एल नीनो जैसी घटनाएं और कम वर्षा।
उत्तराखंड में ये कारण और तीव्र हो गए क्योंकि पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र अत्यधिक संवेदनशील है।
पेड़ों-पौधों की भूमिका और कंक्रीट का कम उपयोग क्यों जरूरी
पेड़ प्राकृतिक एयर कंडीशनर की तरह काम करते हैं:
- छाया: सतह को 5-15°C ठंडा रख सकते हैं।
- वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration): हवा को ठंडा करते हैं – एक बड़ा पेड़ कई AC जितनी शक्ति देता है।
- घने वन क्षेत्र खुले या कंक्रीट क्षेत्रों से काफी ठंडे होते हैं।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की कमी से सूखापन बढ़ा और आग फैली। शहरों में कंक्रीट और अस्फाल्ट 95% सूर्य ऊर्जा अवशोषित करते हैं, जबकि पेड़-पौधे शीतलन प्रदान करते हैं।
कंक्रीट कम क्यों करें?
- उच्च थर्मल इनर्शिया: दिन में गर्मी सोखता है, रात में छोड़ता है → गर्म रातें।
- शहरी कैन्यन प्रभाव: हवा का बहाव रुकता है।
- समाधान: शहरी वानिकी, ग्रीन रूफ्स, कूल रूफ मटेरियल, permeable surfaces और देशी पेड़ों का रोपण। अध्ययनों में पेड़ बढ़ाने से 2-5°C तापमान कम हो सकता है।
उत्तराखंड में वन संरक्षण, नियंत्रित पर्यटन और सस्टेनेबल निर्माण जरूरी है।
स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर प्रभाव
- स्वास्थ्य: हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, श्वसन समस्या। मजदूर, किसान और बुजुर्ग सबसे प्रभावित।
- जंगल की आग: जैव विविधता हानि, मिट्टी की उर्वरता घटना, कार्बन उत्सर्जन बढ़ना।
- अर्थव्यवस्था: कृषि प्रभावित (सूखा), पर्यटन में कमी, बिजली की मांग बढ़ना।
- पहाड़ों पर: ग्लेशियर पिघलना तेज, नदियां सूखना, फसलें खराब।
समाधान और सुझाव
- वृक्षारोपण: देशी प्रजातियां (जैसे देवदार, बुरांश) लगाएं। शहरों और गांवों में हरित कवर बढ़ाएं।
- वन प्रबंधन: सूखे ईंधन को साफ करना, सामुदायिक भागीदारी।
- शहरी नियोजन: कंक्रीट कम, ग्रीन बिल्डिंग्स और वाटर बॉडीज बचाएं।
- नीतियां: हीट एक्शन प्लान को मजबूत करें, जलवायु अनुकूल कृषि।
- व्यक्तिगत: दोपहर में बाहर कम निकलें, पानी ज्यादा पिएं, पेड़ लगाएं।
उत्तराखंड मौसम अपडेट (26 अप्रैल 2026 तक): मैदानों में गर्मी जारी, कुछ पहाड़ी जिलों में बारिश/आंधी संभव। IMD सलाह दे रहा है कि सतर्क रहें। लंबे समय में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे।
भारत में बढ़ती गर्मी कोई अस्थायी घटना नहीं, बल्कि जलवायु संकट का संकेत है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पेड़ बचाना और कंक्रीट का अंधाधुंध उपयोग रोकना अब जीवन-मरण का सवाल बन गया है। प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर ही हम इस कहर को कम कर सकते हैं।
सभी नागरिकों से अपील: पेड़ लगाएं, जंगलों की रक्षा करें और सस्टेनेबल जीवन अपनाएं – अपनी और आने वाली पीढ़ियों के लिए।
संदर्भ: IMD बुलेटिन (अप्रैल 2026), Down To Earth, India Today, Mongabay और अन्य वैज्ञानिक रिपोर्ट्स।
अधिक जानकारी के लिए mausam.imd.gov.in देखें।
