कत्यूरी विरासत एवं संस्कृति के संरक्षक जे.एस. बिष्ट का आह्वान: राजमाता जिया की बलिदान स्थली को मानसखंड मंदिर माला मिशन में शामिल करे सरकार
कुमाऊँ के ‘हरिद्वार’ की उपेक्षा कब तक?
राजमाता जिया की तपस्थली, त्यागस्थली और बलिदान भूमि के विकास के लिए उठी बुलंद आवाज
रानीबाग/नैनीताल, विशेष संवाददाता। जगत सिंह बिष्ट- तिमली, अल्मोड़ा /भानु प्रताप सिंह
कत्यूरी इतिहास, संस्कृति और विरासत के संरक्षण के लिए लंबे समय से कार्यरत कत्यूरी हेरिटेज एंड कल्चर (कत्यूरी विरासत एवं संस्कृति) के संरक्षक एवं इतिहासकार जे.एस. बिष्ट ने चित्रशिला रानीबाग के समग्र विकास के लिए व्यापक जनजागरण का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि राजमाता जिया की तपस्थली, त्यागस्थली और बलिदान स्थली चित्रशिला रानीबाग को राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी मानसखंड मंदिर माला मिशन योजना में शामिल किया जाना चाहिए।
जे.एस. बिष्ट ने कहा कि चित्रशिला रानीबाग केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता, गौरव, शौर्य और बलिदान का प्रतीक है। लोक परंपराओं और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, यहीं पर राजमाता जिया ने बाहरी आक्रांताओं से उत्तराखंड की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। यही कारण है कि यह स्थल कत्यूरियों की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
“चित्रशिला केवल मंदिर नहीं, हमारी पहचान है”
कत्यूरी विरासत एवं संस्कृति के संरक्षक जे.एस. बिष्ट का कहना है कि चित्रशिला रानीबाग को “कुमाऊँ का हरिद्वार” कहा जाता है। यह मानसखंड क्षेत्र के अनेक प्रमुख मंदिरों और तीर्थों का प्रवेश द्वार है। इसके बावजूद आज तक इस स्थल को धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर वह स्थान नहीं मिल पाया है जिसका यह वास्तविक हकदार है।
उन्होंने मुख्यमंत्री, पर्यटन मंत्री, उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, स्थानीय विधायक, सांसद और जिलाधिकारी नैनीताल से मांग की कि चित्रशिला को मानसखंड मंदिर माला मिशन में शामिल कर यहां विश्वस्तरीय सुविधाओं का विकास किया जाए।
देश-विदेश में फैले कत्यूरी समाज ने एक स्वर में उठाई मांग
कत्यूरी विरासत एवं संस्कृति के संरक्षक एवं इतिहासकार जे.एस. बिष्ट के आह्वान को व्यापक समर्थन मिल रहा है। उनके संदेश के बाद उत्तराखंड के कुमाऊँ, गढ़वाल और जौनसार-बावर सहित पड़ोसी क्षेत्रों हिमाचल प्रदेश, नेपाल तथा देश-विदेश में बसे कत्यूरी समाज के लोगों ने एक सुर में राज्य सरकार से मांग की है कि राजमाता जिया की तपस्थली एवं बलिदान भूमि चित्रशिला रानीबाग को मानसखंड मंदिर माला मिशन में शामिल कर इसका भव्य विकास किया जाए।
समाज के प्रतिनिधि और वरिष्ठ नागरिक परिपूर्ण वात्सायन जी का कहना है कि चित्रशिला रानीबाग केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कत्यूरी इतिहास, उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना और बलिदान की गौरवगाथा का प्रतीक है। इसलिए इस धरोहर को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए विशेष विकास योजना बनाई जानी चाहिए।
उत्तराखंड के सबसे व्यापक सामाजिक समूहों में एक है कत्यूरी समाज
गौरतलब है कि कत्यूरी समाज उत्तराखंड का एक बड़ा और ऐतिहासिक समाज माना जाता है, जिसकी विशेषता इसकी व्यापक सामाजिक समावेशिता है। समाज के जानकारों के अनुसार कत्यूरी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत में उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों, वर्गों और समुदायों की सहभागिता रही है। यही कारण है कि कत्यूरी पहचान को केवल एक समुदाय तक सीमित न मानकर उत्तराखंड की साझा सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी देखा जाता है।
समाज के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि राजमाता जिया का बलिदान सम्पूर्ण उत्तराखंड की अस्मिता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। इसलिए चित्रशिला रानीबाग का विकास केवल एक तीर्थस्थल का विकास नहीं होगा, बल्कि यह उत्तराखंड की ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक धरोहर और धार्मिक पर्यटन को नई पहचान देने का कार्य करेगा।”जय जिया – जागो कत्यूरियो” बना जनजागरण का स्वरजे.एस. बिष्ट के आह्वान के बाद “जय जिया – जागो कत्यूरियो” का नारा अब केवल एक भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, ऐतिहासिक स्थलों के विकास और उत्तराखंड की गौरवशाली पहचान को पुनर्स्थापित करने के अभियान के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है।
सरकार से प्रमुख मांगें
- चित्रशिला रानीबाग को मानसखंड मंदिर माला मिशन में शामिल किया जाए।
- राजमाता जिया की स्मृति में भव्य स्मारक का निर्माण हो।
- कत्यूरी इतिहास एवं संस्कृति पर आधारित संग्रहालय और शोध केंद्र स्थापित किया जाए।
- तीर्थयात्रियों के लिए सड़क, पार्किंग, पेयजल, शौचालय और विश्राम गृह जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं।
- क्षेत्र का सौंदर्यीकरण और धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकास किया जाए।
“इतिहास बचाना है तो जागना होगा”
अपने संदेश में जे.एस. बिष्ट ने कत्यूर समाज से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि यदि समाज अपनी गौरवशाली विरासत और ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण के लिए आगे नहीं आएगा तो आने वाली पीढ़ियां अपने अतीत से कट जाएंगी। उन्होंने कहा कि कत्यूरियों के भीतर वही चेतना, ऊर्जा और स्वाभिमान जागृत होना चाहिए जिसने कभी हिमालयी क्षेत्र को गौरव प्रदान किया था।
उनका संदेश अब क्षेत्र में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और विरासत संरक्षण के अभियान के रूप में देखा जा रहा है।
