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उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा का बड़ा ऐलान: पहाड़ी लोगों के लिए संविधान की 5वीं अनुसूची की मांग और संघर्ष का वादा – जल, जंगल, जमीन की रक्षा अब पहाड़ी अधिकार बनेंगे

देहरादून/हल्द्वानी, 19 अप्रैल 2026। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों (गढ़वाल-कुमाऊं) में रहने वाले पहाड़ी लोगों की पहचान, संस्कृति, जमीन और पर्यावरण की रक्षा के लिए उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने एक बार फिर जोरदार मांग उठाई है। मोर्चा के अध्यक्ष बॉबी पंवार ने स्पष्ट कहा कि गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों को संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल किया जाए। मोर्चा ने न केवल यह मांग की है, बल्कि पूरे राज्य के पहाड़ी समाज से वादा भी किया है कि यह लड़ाई अंतिम सांस तक जारी रहेगी। मोर्चा का कहना है – “पहाड़ी लोगों की जमीन, जंगल और जल संसाधनों पर बाहरी हस्तक्षेप अब बंद होगा। 5वीं अनुसूची लागू होने से पहाड़ी युवा वापस लौटेंगे, पलायन रुकेगा और देवभूमि की रक्षा होगी।”

यह मांग केवल एक संगठन की नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंडी समाज की लंबे समय से चली आ रही आवाज है। उत्तराखंड एकता मंच जैसे अन्य संगठनों ने भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों पहाड़ियों को एकजुट कर इसी मांग को उठाया था। अब स्वाभिमान मोर्चा ने इसे और मजबूती दी है। मोर्चा ने स्पष्ट वादा किया है कि विधानसभा चुनाव 2027 से पहले यह मुद्दा पूरे राज्य में जन-जन तक पहुंचाया जाएगा और सरकार से प्रस्ताव पारित कराने के लिए आंदोलन तेज किया जाएगा।

5वीं अनुसूची क्या है? पहाड़ी लोगों के लिए क्यों जरूरी?

भारतीय संविधान की 5वीं अनुसूची (Fifth Schedule) अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) और अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है। यह अनुसूचित क्षेत्रों में गवर्नर को विशेष शक्तियां देती है, जैसे:

  • भूमि हस्तांतरण पर रोक: बाहरी (गैर-पहाड़ी) लोगों को पहाड़ी जमीन खरीदने या पट्टे पर लेने पर सख्ती।
  • जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council): पहाड़ी इलाकों में स्थानीय लोगों की सलाह से विकास योजनाएं बनाई जाएंगी।
  • जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा: वन संसाधनों, नदियों और खेती योग्य भूमि पर बाहरी शोषण रोका जाएगा।
  • सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संरक्षण: पहाड़ी संस्कृति, परंपराओं और जैव विविधता की रक्षा।
  • विशेष विकास योजनाएं: पलायन रोकने, रोजगार और शिक्षा के लिए लक्षित फंडिंग।

1972 से पहले उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में Scheduled District Act 1874 और Excluded Areas (1935) के तहत विशेष संरक्षण था। स्वतंत्रता के बाद भी यह व्यवस्था चली, लेकिन 1972 में इसे हटा दिया गया। अब पहाड़ी समाज कह रहा है – “हमारी पुरानी सुरक्षा वापस लौटाओ।” हिमाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम जैसे पहाड़ी राज्यों में यह व्यवस्था है, तो उत्तराखंड को क्यों नहीं?

स्वाभिमान मोर्चा का वादा: संघर्ष और समाधान

मोर्चा के अध्यक्ष बॉबी पंवार ने प्रेस से बात करते हुए कहा, “हम सिर्फ मांग नहीं कर रहे, बल्कि पूरा संघर्ष लड़ने का वादा कर रहे हैं। पहाड़ी लोगों की जमीन बिक रही है, जंगल कट रहे हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं और युवा पलायन कर रहे हैं। 5वीं अनुसूची लागू होने से:

  • पलायन रुकेगा: पहाड़ी युवाओं को स्थानीय रोजगार और अधिकार मिलेंगे।
  • जमीन बचेंगी: गैर-पहाड़ी खरीदारी पर रोक लगेगी।
  • पर्यावरण संरक्षित होगा: वन कटाई, खनन और अनियोजित विकास पर लगाम लगेगी।
  • संस्कृति बचेगी: पहाड़ी भाषा, रीति-रिवाज और परंपराएं संरक्षित होंगी।”

मोर्चा ने वादा किया है कि वह:

  1. पूरे राज्य में महापंचायतें आयोजित करेगा।
  2. विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराने के लिए सभी दलों से समर्थन मांगेगा।
  3. केंद्र सरकार से सीधा संवाद करेगा।
  4. युवा, महिलाओं और किसानों को इस आंदोलन से जोड़ेगा।

मोर्चा का स्पष्ट संदेश है – “यह पहाड़ी लोगों का अधिकार है। हम इसे हासिल करके रहेंगे।”

पहाड़ी समस्याएं और 5वीं अनुसूची का समाधान

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र आज कई संकटों से जूझ रहे हैं:

  • बड़े पैमाने पर पलायन: गांव खाली हो रहे हैं, स्कूल बंद हो रहे हैं।
  • भूमि शोषण: बाहरी लोग जमीन खरीद रहे हैं, होटल-रिसॉर्ट बन रहे हैं।
  • वन कटाई और पर्यावरण विनाश: सड़क-परियोजनाओं के नाम पर जंगल खत्म।
  • जल संकट: नदियां सूख रही हैं, भूस्खलन बढ़ रहा है।
  • बेरोजगारी: स्थानीय युवा बाहर जा रहे हैं।

5वीं अनुसूची लागू होने से ये समस्याएं हल हो सकती हैं। उत्तराखंड एकता मंच के आंदोलनकारियों ने जंतर-मंतर पर कहा था – “पहाड़ी क्षेत्र को जनजातीय क्षेत्र घोषित करो।” स्वाभिमान मोर्चा अब इसे जमीनी स्तर पर ले जा रहा है।

कांग्रेस ने भी 2027 चुनाव के लिए इस मांग को अपने एजेंडे में शामिल करने की बात कही है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसे नेता भी इसकी समर्थक हैं।

पहाड़ी एकता का समय आ गया

उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा का यह ऐलान पहाड़ी समाज के लिए उम्मीद की किरण है। मोर्चा ने मांग की है और संघर्ष का वादा किया है। अब सवाल यह है – क्या राज्य सरकार और केंद्र इस मांग को मानेंगे? क्या पहाड़ी लोगों को उनका संवैधानिक अधिकार मिलेगा?

हर पहाड़ी नागरिक से अपील – इस आंदोलन से जुड़ें। जल, जंगल, जमीन हमारी विरासत है। 5वीं अनुसूची लागू करो, पहाड़ बचाओ!

मोर्चा का संकल्प स्पष्ट है: “पहाड़ी लोगों के अधिकारों की लड़ाई हम लड़ेंगे और जीतेंगे।”

By The Common Man

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