देवभूमि के लोग | विशेष रिपोर्ट
देहरादून, 16 जुलाई।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में यदि किसी पर्व ने प्रकृति, कृषि, पर्यावरण और लोकजीवन को एक सूत्र में पिरोया है, तो वह हरेला है। हर वर्ष श्रावण मास के आरंभ (कर्क संक्रांति) पर मनाया जाने वाला यह लोकपर्व हरियाली, नई फसल, समृद्धि और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक माना जाता है। आज यह पर्व केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का वैश्विक संदेश देने वाला जनआंदोलन बन चुका है।
किसने शुरू किया हरेला?
इतिहास में ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि हरेला की शुरुआत किसी एक राजा, संत या व्यक्ति ने की हो। इतिहासकारों का मत है कि यह पर्व हिमालयी समाज की प्राचीन कृषि और प्रकृति-पूजक परंपरा से विकसित हुआ। जब उत्तराखंड के लोग पूरी तरह खेती और वर्षा पर निर्भर थे, तब अच्छी बारिश और भरपूर फसल की कामना के लिए बीज बोने और हरियाली का उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई, जो आगे चलकर हरेला पर्व के रूप में स्थापित हो गई।
भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ा है हरेला
लोकमान्यताओं के अनुसार हरेला भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन तथा सृष्टि के नवजीवन का प्रतीक है। इसलिए इस दिन शिव-पार्वती की पूजा की जाती है और परिवार, पशुधन तथा खेतों की समृद्धि की कामना की जाती है। घरों में दस दिन पहले सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं और उनके हरे अंकुरों को शुभ माना जाता है।
कत्यूरी राजवंश ने दिया संरक्षण
इतिहासकारों का मानना है कि उत्तराखंड के कत्यूरी राजवंश (लगभग 1वीं–15वीं शताब्दी) ने कृषि, शिव उपासना और मंदिर संस्कृति को व्यापक संरक्षण दिया। केदारनाथ, बद्रीनाथ, जागेश्वर, बैजनाथ, द्वाराहाट और अनेक प्राचीन मंदिरों के विकास के साथ कृषि आधारित लोकपर्वों को भी राजकीय संरक्षण मिला। इसी काल में हरेला जैसी लोकपरंपराएँ समाज में और अधिक संगठित रूप से प्रचलित हुईं। इसके बाद गढ़वाल, कुमाऊं और नेपाल में टूटने के उपरांत भी प्रकृति संरक्षण का यह तो कार्य जारी रहा।
चंद राजाओं ने बनाया जनपर्व
कत्यूरी शासन के बाद चंद राजवंश (लगभग 11वीं–18वीं शताब्दी) ने कुमाऊँ में हरेला को और अधिक व्यापक सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप दिया। चंद शासकों ने कृषि, लोककला, मंदिरों और ग्रामीण परंपराओं को संरक्षण दिया, जिसके कारण हरेला घर-घर में मनाया जाने वाला प्रमुख लोकपर्व बन गया। आज भी कुमाऊँ में हरेला की सबसे समृद्ध परंपरा चंद शासनकाल की सांस्कृतिक विरासत मानी जाती है।
हरेला कैसे मनाया जाता है?
हरेला से लगभग दस दिन पहले मिट्टी के पात्र में सात प्रकार के बीज—जैसे गेहूँ, जौ, धान, मक्का, तिल, उड़द और गहत—बोए जाते हैं। दसवें दिन जब ये अंकुरित होकर हरे हो जाते हैं तो इन्हें काटकर परिवार के सदस्यों के सिर पर रखा जाता है। बड़े-बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं—
“जी रये, जागि रये, धरती जस आगव, आकाश जस चाकव।”
यह आशीर्वाद लंबी आयु, समृद्धि और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन का संदेश देता है।
आज के भारत और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हरेला की प्रासंगिकता
आज जब भारत सहित पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन (Global Warming), अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान, जंगलों की कटाई, जैव विविधता के क्षरण और प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, तब उत्तराखंड का हरेला पर्व केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि सतत विकास (Sustainable Development) और पर्यावरण संरक्षण का जीवंत मॉडल बनकर सामने आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हरेला की मूल भावना—”प्रकृति का सम्मान, वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण”—को पूरे भारत और विश्व में जनआंदोलन के रूप में अपनाया जाए, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। हर वर्ष लाखों लोग यदि एक-एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल का संकल्प लें, तो यह कार्बन अवशोषण बढ़ाने, भूमि संरक्षण और जैव विविधता को मजबूत करने में सहायक होगा।
उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सबसे पहले और सबसे अधिक महसूस कर रहे हैं। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, बादल फटना, भूस्खलन, वनाग्नि, जलस्रोतों का सूखना और मौसम के बदलते स्वरूप इस संकट की गंभीरता को दर्शाते हैं। ऐसे समय में हरेला का संदेश केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए प्रेरणा है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना मानव विकास संभव नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs)—विशेष रूप से जलवायु कार्रवाई (Climate Action), भूमि पर जीवन (Life on Land) और सतत समुदायों (Sustainable Cities and Communities)—की भावना भी हरेला जैसे लोकपर्वों से मेल खाती है, जो पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व के रूप में स्थापित करते हैं।आज आवश्यकता केवल हरेला मनाने की नहीं, बल्कि उसकी भावना को जीवन में उतारने की है।
यदि प्रत्येक नागरिक हरेला के अवसर पर एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल का संकल्प ले, तो यह पर्व केवल उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान नहीं रहेगा, बल्कि भारत और विश्व के लिए जलवायु संकट से लड़ने का एक प्रभावी जनआंदोलन बन सकता है। हरेला का संदेश आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है—”धरती बचेगी तो मानवता बचेगी, हरियाली बचेगी तो भविष्य सुरक्षित रहेगा।”
हमारे पूर्वजों की दूरदृष्टि का प्रतीक है हरेला
हरेला का सबसे बड़ा संदेश यह है कि हमारे पूर्वज प्रकृति के प्रति अत्यंत संवेदनशील, वैज्ञानिक सोच वाले और दूरदर्शी थे। हजारों वर्ष पहले, जब न औद्योगीकरण था, न प्रदूषण की समस्या और न ही आज जैसी विशाल जनसंख्या, तब भी उन्होंने प्रकृति के संरक्षण को समाज का नैतिक कर्तव्य बनाया। यह उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण है कि उन्होंने केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रकृति संरक्षण को एक लोकपर्व का स्वरूप दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी जंगल, जल, भूमि और जैव विविधता के महत्व को कभी न भूलें।
उस समय उत्तराखंड सहित भारत का अधिकांश भूभाग घने वनों से आच्छादित था और जनसंख्या भी बहुत कम थी। इसके बावजूद हमारे पूर्वजों ने यह समझ लिया था कि यदि मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बिगड़ा, तो भविष्य में गंभीर संकट उत्पन्न हो सकते हैं। इसी सोच के कारण हरेला जैसे पर्वों की परंपरा विकसित हुई, जिसमें बीज बोना, हरियाली का स्वागत करना, वृक्षारोपण करना और प्रकृति को देवतुल्य मानकर उसका सम्मान करना सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बना।
आज, जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, प्रदूषण और जैव विविधता के संकट से जूझ रही है, तब हरेला यह याद दिलाता है कि जिस पर्यावरणीय चेतना को आधुनिक विश्व आज विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से समझ रहा है, उसकी झलक भारतीय लोकपरंपराओं में सदियों पहले से मौजूद थी।
हरेला इसलिए केवल उत्तराखंड का एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस प्राचीन पर्यावरणीय चेतना का जीवंत उदाहरण है, जो सिखाती है कि प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलित सह-अस्तित्व ही मानव सभ्यता के दीर्घकालिक अस्तित्व की आधारशिला है।
“यदि दुनिया आज हरेला की भावना को अपनाए, तो यह केवल एक त्योहार नहीं रहेगा, बल्कि पृथ्वी को बचाने का वैश्विक जनआंदोलन बन सकता है
उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा
हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जीवन शैली, कृषि परंपरा, लोकसंस्कृति और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व बताता है कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं, यदि समाज अपनी जड़ों और प्रकृति से जुड़ा रहे।
हरेला का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
“एक पौधा लगाइए, प्रकृति बचाइए; हरियाली ही उत्तराखंड की सबसे बड़ी पहचान है।
प्रकृति है तो जीवन है, पेड़ पौधे नहीं रहेंगे तो मानव जीवन नहीं रहेगा, पेड़ पौधे कम होंगे तो जीवन भी स्वतः कम हो जाएगा।
