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आईवीएफ में बड़े घोटाले का खुलासा: दिल्ली के एससीआई अस्पताल में भ्रूण स्वैप का आरोप, दंपति के जुड़वां बच्चों में डीएनए मिसमैच

नई दिल्ली, 15 जून 2026: दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित प्रतिष्ठित एससीआई आईवीएफ हॉस्पिटल में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। राठौर दंपति (नाम परिवर्तित) ने फरवरी 2025 में अपना अंडा (egg) और वीर्य (semen) सैंपल अस्पताल को दिया था। मई 2025 में भ्रूण प्रत्यारोपण (embryo transfer) के बाद जनवरी 2025 में जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ। लेकिन जन्म के तुरंत बाद बच्चों में परिवार से कोई समानता न दिखने पर संदेह हुआ। दो स्वतंत्र डीएनए टेस्टों ने पुष्टि कर दी कि बच्चे दंपति के जैविक नहीं हैं।

दिल्ली कोर्ट ने इस मामले में गंभीर संज्ञान लिया है और पुलिस को अस्पताल के खिलाफ embryo swap, forgery और IVF नियमों के उल्लंघन की जांच करने का आदेश दिया है। दंपति ने अस्पताल पर आरोप लगाया है कि उनके सैंपल्स को गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया या स्वैप कर दिया गया, जबकि अस्पताल का दावा है कि सैंपल अनुपयोगी (unviable) पाए गए थे, इसलिए अनाम डोनर्स के इस्तेमाल किए गए — जिसे राठौर दंपति सिरे से खारिज कर रहे हैं।

घटना का विस्तृत विवरण

राठौर दंपति लंबे समय से संतानहीनता से जूझ रहे थे। उन्होंने एससीआई आईवीएफ हॉस्पिटल में इलाज कराने का फैसला किया, जो आईवीएफ के क्षेत्र में प्रसिद्ध है। फरवरी 2025 में उन्होंने अपने स्वयं के सैंपल दिए। मई में सफल embryo transfer के बाद गर्भावस्था आगे बढ़ी और 5 जनवरी 2026 को जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ।

जन्म के बाद ही परिवार को संदेह हुआ क्योंकि नवजात शिशुओं का चेहरा, रंग या अन्य विशेषताएं माता-पिता या परिवार से मेल नहीं खा रही थीं। संदेह की पुष्टि के लिए दो अलग-अलग लैबों से डीएनए टेस्ट कराए गए, जिनमें दोनों बच्चों का डीएनए दंपति से मैच नहीं किया।

दंपति ने अस्पताल प्रबंधन से जवाब मांगा तो अस्पताल ने दावा किया कि उनके सैंपल अनुपयोगी पाए गए थे, इसलिए अनाम डोनर्स के भ्रूण इस्तेमाल किए गए। राठौर दंपति ने इसे झूठा करार देते हुए कहा कि उन्हें कभी इसकी सूचना नहीं दी गई और सहमति भी नहीं ली गई।

अदालती कार्रवाई

दिल्ली कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए पुलिस को तुरंत जांच शुरू करने का आदेश दिया है। जांच में embryo swapping, दस्तावेजों में हेराफेरी, मरीजों की सहमति के बिना डोनर सामग्री इस्तेमाल और IVF क्लिनिक नियमों (ICMR गाइडलाइंस) के उल्लंघन के पहलुओं को शामिल किया जाएगा।

दंपति फिलहाल बच्चों की देखभाल कर रहे हैं और उन्हें अपना मानकर पाल रहे हैं। उन्होंने सार्वजनिक अपील की है कि 2025 में एससीआई आईवीएफ हॉस्पिटल में इलाज कराने वाले अन्य दंपतियों को भी अपने बच्चों का डीएनए टेस्ट जरूर करवाना चाहिए।

आईवीएफ घोटालों की बढ़ती घटनाएं

यह मामला आईवीएफ उद्योग में पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है। देश में कई क्लिनिकों पर पहले भी embryo mix-up, गलत डोनर्स और बिना सूचना के डोनेशन के आरोप लग चुके हैं। ICMR और स्वास्थ्य मंत्रालय ने सख्त गाइडलाइंस जारी की हैं, लेकिन क्रियान्वयन पर सवाल उठ रहे हैं।

जनता के लिए विस्तृत सावधानियां (Precautions for Public)

आईवीएफ जैसी संवेदनशील प्रक्रिया कराने वाले दंपतियों को इन सावधानियों का पालन अवश्य करना चाहिए:

  1. क्लिनिक चयन:
  • केवल ICMR रजिस्टर्ड और NABH प्रमाणित अस्पताल/क्लिनिक चुनें।
  • पिछले मरीजों की समीक्षाएं (reviews), सफलता दर और शिकायतें चेक करें।
  • डॉक्टर की क्रेडेंशियल्स और अनुभव जांचें।
  1. दस्तावेजीकरण और सहमति:
  • हर स्टेप पर लिखित सहमति (informed consent) लें।
  • सैंपल कलेक्शन, स्टोरेज, लेबलिंग और ट्रांसफर की पूरी प्रक्रिया लिखित रूप में रिकॉर्ड रखें।
  • सैंपल्स पर बारकोड/यूनिक आईडी लगवाएं और खुद भी नोट करें।
  1. प्रक्रिया के दौरान:
  • सैंपल कलेक्शन के समय मौजूद रहें या विश्वसनीय व्यक्ति को साथ रखें।
  • embryo transfer से पहले embryo की पहचान (photograph/video अगर संभव हो) सुनिश्चित करें।
  • किसी भी डोनर सामग्री के इस्तेमाल पर लिखित सूचना और सहमति अनिवार्य।
  1. बच्चे के जन्म के बाद:
  • जन्म के तुरंत बाद डीएनए टेस्ट (paternity/maternity test) करवाने पर विचार करें, खासकर अगर कोई संदेह हो।
  • 2025 में एससीआई या अन्य संदिग्ध क्लिनिकों में इलाज कराने वाले तुरंत डीएनए टेस्ट कराएं।
  1. सामान्य सलाह:
  • इलाज से पहले कानूनी सलाहकार या मेडिकल एथिक्स एक्सपर्ट से बात करें।
  • सभी रिपोर्ट्स, प्रिस्क्रिप्शन और दस्तावेज सुरक्षित रखें।
  • संदेह होने पर तुरंत कोर्ट/पुलिस/मेडिकल काउंसिल में शिकायत करें।
  • मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें — ऐसे मामलों में काउंसलिंग लें।

सरकार और विशेषज्ञों का संदेश: स्वास्थ्य मंत्रालय और ICMR को आईवीएफ क्लिनिकों पर सख्त निगरानी बढ़ानी चाहिए। पारदर्शी प्रक्रिया और नियमित ऑडिट जरूरी हैं।

राठौर दंपति की इस लड़ाई से कई अन्य प्रभावित परिवारों को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। मामले की जांच जारी है और आगे की अपडेट्स का इंतजार है।

सुरक्षित और पारदर्शी आईवीएफ प्रक्रिया ही सही समाधान है।
(समाचार उपलब्ध तथ्यों और रिपोर्ट्स पर आधारित।)

By B P Singh

News and public affairs

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