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उत्तराखंड में वन्यजीवों का आतंक: पिछले एक सप्ताह में जानलेवा हमले, मौतें और घायल, पहाड़ी जनता की मजबूरी और बढ़ता पलायन

देहरादून/नैनीताल/पौड़ी, 23 अप्रैल 2026 – उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में वन्यजीवों के हमलों ने एक बार फिर आतंक मचा रखा है। पिछले एक सप्ताह (16 से 23 अप्रैल 2026 तक) में कई गंभीर घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें कम से कम एक महिला की मौत और कई घायल होने की खबरें हैं। इन हमलों में मुख्य रूप से तेंदुए (लेपर्ड), भालू और कभी-कभी बाघ शामिल हैं। राज्य के वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2026 के पहले तीन महीनों (जनवरी-मार्च) में ही 117-118 हमले दर्ज हुए, जिनमें 20 लोगों की मौत और 97-98 घायल हुए। बाघों के हमलों में सबसे ज्यादा मौतें हुईं।

पिछले सप्ताह की सबसे चर्चित घटना नैनीताल जिले के ज्योलीकोट (Jeolikote) क्षेत्र में हुई। 50 वर्षीय एक महिला चारा इकट्ठा करने जंगल गई थीं, जहां एक वन्यजीव (संभवतः तेंदुआ या भालू) ने उन पर हमला कर दिया। महिला की मौके पर ही मौत हो गई। यह घटना मात्र चार महीनों में उस प्रभाग की पांचवीं ऐसी मौत है, जिससे स्थानीय ग्रामीणों में भारी आक्रोश फैल गया है। वन विभाग ने जांच शुरू कर दी है और आसपास के क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है।

पौड़ी गढ़वाल जिले में भी तनाव बना हुआ है। अप्रैल की शुरुआत में ही पोखरा क्षेत्र के भटकोट गांव में 4 वर्षीय बालिका दृष्टि रावत की तेंदुए के हमले में मौत हो गई। घटना रात करीब 9 बजे हुई, जब बच्ची अपनी बहन और दादी के साथ घर के पास भोजन कर रही थी। तेंदुए ने अचानक हमला कर बच्ची को उठा लिया। इस घटना ने पूरे जिले को झकझोर दिया। पौड़ी में इस साल अब तक कई हमले दर्ज हैं, जहां घायलों की संख्या सबसे ज्यादा (19 तक) बताई जा रही है।

भालुओं के हमले भी पिछले दिनों में बढ़े हैं। चमोली और पौड़ी जैसे जिलों में भालू अक्सर गांवों और स्कूलों तक घुस आ रहे हैं। एक घटना में चमोली के पोखरी ब्लॉक में एक भालू और उसके बच्चे ने स्कूल परिसर में घुसकर 11 वर्षीय छात्र को घायल कर दिया। छात्र को उसके साथी ने बचाया, लेकिन पूरे स्कूल में दहशत फैल गई। भालू के हमलों में महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं, क्योंकि वे चारा, ईंधन और जलाऊ लकड़ी जुटाने जंगलों में जाती हैं।

पिछले एक सप्ताह की प्रमुख घटनाएं (विस्तार से)

  1. नैनीताल – ज्योलीकोट हमला (22-23 अप्रैल के आसपास): 50 वर्षीय महिला का चारा इकट्ठा करते समय हमला। मौत। ग्रामीणों ने वन विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाया। यह क्षेत्र पहले से ही वन्यजीव हमलों से प्रभावित है।
  2. पौड़ी – भटकोट घटना (अप्रैल की शुरुआत, लेकिन प्रभाव जारी): 4 वर्षीय दृष्टि रावत की मौत। तेंदुआ घर के निकट हमला। परिवार सदमे में। गांव के लोग अब शाम ढलते ही घरों में कैद रहने लगे हैं।
  3. चमोली क्षेत्र – स्कूल में भालू घुसपैठ: 11 वर्षीय बच्चे पर हमला। स्कूल स्टाफ ने भालू को भगाया, लेकिन बच्चों में भय का माहौल। आसपास के गांवों में भालू दर्शन और हमलों की खबरें लगातार आ रही हैं।
  4. अन्य संभावित घटनाएं: रामनगर और नैनीताल वन प्रभागों में तेंदुए और भालू की गतिविधियां बढ़ी हैं। हालांकि पिछले ठीक सात दिनों में कोई नई बड़ी मौत रिपोर्ट नहीं हुई, लेकिन चोटिल होने और जानवरों के दर्शन की घटनाएं रोजाना हो रही हैं। वन विभाग ने इन क्षेत्रों में ट्रैप कैमरे और गश्त बढ़ाई है, लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि यह पर्याप्त नहीं।

ये घटनाएं अकेली नहीं हैं। पूरे राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) एक बड़ी समस्या बन चुकी है। 2000 से अब तक 900 से ज्यादा मौतें और हजारों घायल हो चुके हैं। तेंदुओं ने सबसे ज्यादा (548) मौतें कीं, उसके बाद हाथी (230), बाघ (106) और भालू (70)। 2025 में भी 30 के करीब मौतें हुईं। 2026 में शुरुआती तीन महीनों में ही 20 मौतें हो चुकी हैं, जिसमें बाघ सबसे घातक साबित हुए।

पहाड़ी जनता की मजबूरी और बढ़ता संकट

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके पहले से ही कई समस्याओं से जूझ रहे हैं – बेरोजगारी, कृषि क्षति, पलायन, अस्पतालों और शिक्षा की कमी। अब वन्यजीव हमले रोजाना निर्दोष लोगों की जान ले रहे हैं, जिससे स्थिति और बदतर हो गई है।

बेरोजगारी और पलायन: पहाड़ों में युवा रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों या शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। गांवों में बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे अकेले रह जाते हैं। जंगल के किनारे बसे ये गांव अब खतरे में हैं। एक गांव वाले ने बताया, “हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, क्योंकि रास्ते जंगलों से होकर गुजरते हैं। महिलाएं चारा लाने नहीं जा पातीं। पशु पालन भी मुश्किल हो गया है।”

कृषि क्षति: तेंदुए, भालू, सूअर और बंदर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। किसान कहते हैं कि खेतों की रखवाली के लिए रात-रात भर जागना पड़ता है। कई परिवारों ने खेती छोड़ दी है।

स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी: घायल होने पर अस्पताल दूर होते हैं। कई बार घायल व्यक्ति रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। पहाड़ी रास्ते खराब, एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाती। एक घायल महिला के परिवार ने बताया, “हमने घायल को कंधे पर उठाकर घंटों चलकर अस्पताल पहुंचाया, लेकिन देर हो चुकी थी।”

शिक्षा पर असर: स्कूलों के पास जानवर घुस आते हैं। कई स्कूल अस्थायी रूप से बंद किए गए हैं। बच्चे पढ़ाई से वंचित हो रहे हैं।

महिलाओं पर सबसे ज्यादा बोझ: उत्तराखंड में वन्यजीव हमलों की 80% पीड़ित महिलाएं हैं। वे घरेलू कामों के लिए जंगलों में जाती हैं – चारा, ईंधन, पानी। भालू और तेंदुए इन्हीं मौकों पर हमला करते हैं। महिलाओं के चेहरे और सिर पर गंभीर चोटें आम हैं, जो आजीवन विकलांगता का कारण बनती हैं।

लोगों की मजबूरी यह है कि वे जंगलों से घिरे हुए हैं। वन क्षेत्र बढ़ रहे हैं, लेकिन मानव बस्तियां सिकुड़ रही हैं। वन विभाग के अनुसार, कई गांव “खतरे के जोन” में आ चुके हैं। फिर भी पर्याप्त सुरक्षा नहीं। लोग खुद बंदूकों या लाठियों से परिवार की रक्षा करते हैं।

सरकारी प्रयास और जनता की मांग

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मानव-वन्यजीव संघर्ष पर कई बैठकें की हैं। वन विभाग ने 800 से ज्यादा खतरे वाले जोन चिन्हित किए हैं। मुआवजा राशि बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी गई है। शूटर तैनात किए जा रहे हैं, ट्रैप कैमरे लगाए जा रहे हैं, और समस्या वाले जानवरों को पकड़कर अन्य जगह छोड़ा जा रहा है। लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि ये कदम पर्याप्त नहीं।

जनता की मांग है:

  • जंगलों के आसपास बाड़बंदी और सोलर लाइट्स।
  • नियमित गश्त और त्वरित एक्शन टीम।
  • प्रभावित परिवारों को तुरंत मुआवजा और पुनर्वास।
  • जागरूकता अभियान और वैकल्पिक रोजगार।
  • स्कूलों और गांवों के आसपास सुरक्षा व्यवस्था।

सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे संघर्ष को प्राकृतिक आपदा मानने और 10 लाख मुआवजे के निर्देश दिए हैं।

विस्तृत विश्लेषण: समस्या के कारण

  1. वन्यजीवों की बढ़ती संख्या: बाघ और तेंदुओं की आबादी बढ़ी है। संरक्षण सफल रहा, लेकिन मानव-वन्यजीव सीमा पर दबाव बढ़ा।
  2. वन क्षेत्रों में बदलाव: कुछ जगहों पर एकल प्रजाति के पेड़ लगाए गए, जिससे जानवरों का प्राकृतिक भोजन कम हुआ। वे गांवों की ओर मुड़ रहे हैं।
  3. कूड़ा और आकर्षण: गांवों के किनारे कूड़ा ढेर जानवरों को खींचता है।
  4. जलवायु परिवर्तन: मौसम बदलाव से जानवरों का व्यवहार प्रभावित।
  5. जनसंख्या दबाव: पहाड़ों में बस्तियां जंगलों के करीब आ गई हैं।

प्रभावित परिवारों की कहानियां

  • भटकोट, पौड़ी: दृष्टि रावत के परिवार में अब शोक का माहौल है। दादी रोज रोती हैं, “वो मेरे पास खेल रही थी, अचानक तेंदुआ आ गया।” गांव के लोग अब बच्चों को अकेला नहीं छोड़ते।
  • ज्योलीकोट, नैनीताल: मृत महिला के परिवार ने कहा, “वह रोज चारा लाती थीं। अब हम क्या करें? पशु भूखे मरेंगे या हम।”
  • चमोली स्कूल: घायल बच्चे के माता-पिता ने स्कूल प्रशासन से सुरक्षा की मांग की। “हमारे बच्चे पढ़ने जाएं या जान बचाने?”

ऐसी सैकड़ों कहानियां हैं। कई परिवार पलायन कर चुके हैं। गांव “भूतिया” बनते जा रहे हैं।

समाधान की राह

  • दीर्घकालिक: वन्यजीव कॉरिडोर प्रबंधन, मिश्रित प्रजाति के पेड़ लगाना, फसल सुरक्षा फेंसिंग।
  • तात्कालिक: प्रभावित क्षेत्रों में विशेष टास्क फोर्स, हेलीपैड और मेडिकल किट।
  • समुदाय भागीदारी: स्थानीय युवाओं को ट्रेनिंग देकर वन गार्ड बनाना।
  • जागरूकता: स्कूलों में शिक्षा, महिलाओं के लिए सुरक्षित चारा संग्रहण केंद्र।

उत्तराखंड की पहाड़ी जनता पहले से ही विकास की मुख्यधारा से कट रही है। बेरोजगारी ने युवाओं को शहर भेज दिया, कृषि नुकसान ने किसानों को हतोत्साहित किया, स्वास्थ्य और शिक्षा की कमी ने जीवन कठिन बना दिया। अब वन्यजीव रोज निर्दोषों की जान ले रहे हैं। यह केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय संकट है।

सरकार, वन विभाग और समाज को मिलकर समाधान निकालना होगा। अन्यथा पहाड़ खाली होते जाएंगे। जनता की पुकार है – “हमें बचाओ, हमारी जानें बचाओ।”

By The Common Man

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