नई दिल्ली, 26 अप्रैल 2026: आम आदमी पार्टी (AAP) को राज्यसभा में बड़ा झटका लगा है। पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की घोषणा कर दी। राघव चड्ढा के नेतृत्व में यह समूह AAP से अलग होकर BJP में विलय का दावा कर रहा है। इस घटना ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है और विपक्षी दलों ने इसे ‘ऑपरेशन लोटस’ का हिस्सा बताया है।**
जो सांसद शामिल हुए**: राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी। AAP अब राज्यसभा में सिर्फ 3 सांसदों (संजय सिंह, एनडी गुप्ता और बलवीर सिंह सीचेवाल) तक सीमित रह गई है। राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि दो-तिहाई से अधिक सांसदों के समर्थन से यह विलय वैध है।AAP ने इसे ‘बदलाव’ और ‘धोखा’ बताया। पार्टी नेता संजय सिंह ने राज्यसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति को पत्र लिखकर इन सांसदों की अयोग्यता की मांग की है। उन्होंने कहा कि दो-तिहाई का दावा कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
### संविधान के प्रावधान: एंटी-डिफेक्शन कानून (10वीं अनुसूची) कैसे लागू होता है? भारतीय संविधान की **10वीं अनुसूची** (52वें संशोधन 1985 द्वारा जोड़ी गई) राजनीतिक दल-बदल (defection) को रोकने के लिए बनी है। मुख्य प्रावधान:- अगर कोई सांसद अपनी पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दे या पार्टी के व्हिप (निर्देश) के खिलाफ वोट/अनुपस्थिति करे, तो वह अयोग्य (disqualified) हो सकता है।-
**विलय (Merger) का अपवाद**: अगर किसी दल का दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी अन्य दल में विलय का फैसला करे, तो वे अयोग्य नहीं माने जाते। – यहां AAP के 10 राज्यसभा सांसदों में 7 (दो-तिहाई से अधिक) होने का दावा किया जा रहा है, इसलिए चड्ढा गुट अयोग्यता से बचने की कोशिश कर रहा है।- निर्णय: लोकसभा/राज्यसभा के अध्यक्ष या स्पीकर लेते हैं। विवाद की स्थिति में अदालत जा सकती है (जैसे शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था)।-
AAP का तर्क: दो-तिहाई का नियम राज्य विधानसभाओं/संसद में लागू नहीं होता या कानूनी मान्यता नहीं है। उन्होंने शिवसेना मामले का हवाला दिया।यदि स्पीकर अयोग्यता घोषित करते हैं, तो इन सांसदों की सदस्यता समाप्त हो सकती है।
### 2014 से भाजपा ने अन्य दलों के लोगों को कैसे शामिल किया?2014 से भाजपा ने ‘ऑपरेशन लोटस’ या समान रणनीति के तहत कई विपक्षी नेताओं को शामिल किया है। ADR रिपोर्ट के अनुसार 2014-2021 के बीच पार्टी बदलने वाले 35% MPs/MLAs भाजपा में शामिल हुए। कांग्रेस सबसे ज्यादा प्रभावित रही।
**कुछ प्रमुख उदाहरण**:- हिमंत बिस्वा सरमा (कांग्रेस से), अशोक चव्हाण (कांग्रेस), नवीन जिंदल (कांग्रेस), अजित पवार गुट (NCP), एकनाथ शिंदे गुट (शिवसेना), सुवेंदु अधिकारी (TMC) आदि।- कई मामलों में शामिल होने के बाद उन्हें मंत्री पद या महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं।-
भाजपा का तर्क: ये नेता ‘राष्ट्रीय हित’ या ‘विकास’ के लिए आए। विपक्ष का आरोप: सत्ता का दुरुपयोग कर विपक्ष को तोड़ा जा रहा है।इस रणनीति से भाजपा कई राज्यों में सरकारें बनाने या मजबूत करने में सफल रही।
### ED छापों की भूमिका: छापे के बाद भाजपा में शामिल होने का ट्रेंडAAP मामले में ED छापों का जिक्र प्रमुख है। अशोक मित्तल (Lovely Professional University से जुड़े) पर ED ने FEMA उल्लंघन के आरोप में छापा मारा, जिसके कुछ दिनों बाद वे भाजपा में शामिल हुए।
AAP ने आरोप लगाया कि राघव चड्ढा और केंद्र सरकार की मिलीभगत से यह छापा पड़ा।
**ट्रेंड**: 2014 से 25 प्रमुख विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार जांच चल रही थी, जिनमें से 23 भाजपा या NDA में शामिल होने के बाद जांच में राहत मिली (Indian Express रिपोर्ट)। उदाहरण: अजित पवार, प्रफुल्ल पटेल, अशोक चव्हाण आदि।विपक्ष का आरोप: केंद्रीय एजेंसियां (ED, CBI) का दुरुपयोग कर विपक्षी नेताओं को डराया जाता है। छापे के बाद ‘सुरक्षा’ या ‘राहत’ के लिए भाजपा में शामिल होने का पैटर्न साफ दिखता है। भाजपा इसे ‘कानून का राज’ बताती है।
### लोकतंत्र के लिए खतरनाक मिसाल: विपक्ष की भूमिका क्यों जरूरी?विपक्ष लोकतंत्र का अहम स्तंभ है। वह सरकार की जवाबदेही तय करता है, नीतियों पर बहस करता है और जनहित की रक्षा करता है। अगर विपक्ष कमजोर या टूटता रहे, तो:- सत्ता का अहंकार बढ़ सकता है।- संसदीय बहस कमजोर हो जाती है।- जनता के वैकल्पिक विकल्प सीमित हो जाते हैं।- ‘ऑपरेशन लोटस’ जैसी रणनीतियां लोकतांत्रिक संतुलन बिगाड़ती हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार दल-बदल और एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल लोकतंत्र को कमजोर करता है। मजबूत विपक्ष बिना लोकतंत्र अधूरा है।
**AAP और भाजपा की प्रतिक्रियाएं**:- AAP: ‘धोखा’, ‘ऑपरेशन लोटस’, जांच की मांग।
– भाजपा: स्वागत किया, ‘सही रास्ते’ पर आने का दावा।- अन्य विपक्ष (कांग्रेस आदि): भाजपा पर विपक्ष तोड़ने का आरोप।
यह घटना भारतीय राजनीति में दल-बदल, एंटी-डिफेक्शन कानून और केंद्रीय एजेंसियों के इस्तेमाल पर नई बहस छेड़ रही है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रियाओं की जरूरत है।