Fri. Apr 3rd, 2026

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में नई शराब दुकान लाइसेंस के खिलाफ महिलाओं का आक्रोश: परिवारों के विनाश, शांति भंग और विकास की अनदेखी की विस्तृत रिपोर्ट

परिचय: देवभूमि उत्तराखंड में शराब बनाम परिवार, समाज और भविष्य की जंग

उत्तराखंड की पहाड़ियों में इन दिनों शराब की नई दुकानों के लाइसेंस के खिलाफ महिलाओं का आंदोलन चरम पर है। मार्च-अप्रैल 2026 में पिथौरागढ़ के उडियारी बैंड, नैनीताल के मंगोली और रातीघाट, पौड़ी, टिहरी-देवप्रयाग, अल्मोड़ा और रुद्रप्रयाग जैसे क्षेत्रों में सैकड़ों महिलाएं सड़कों पर उतर आई हैं। वे खाली बर्तन बजाते हुए, बिच्छू घास हाथ में लेकर नारे लगा रही हैं – “शराब नहीं, पानी दो!”, “परिवार बचाओ, दुकान बंद करो!”। सरकार की नई आबकारी नीति 2025-26 में धार्मिक स्थलों के पास दुकानें बंद करने का प्रावधान है और राजस्व लक्ष्य 5060 करोड़ रुपये का है, लेकिन पहाड़ी गांवों-कस्बों में नए लाइसेंस जारी होने से महिलाओं का गुस्सा फूट पड़ा है।

यह आंदोलन केवल एक दुकान का विरोध नहीं है। यह पहाड़ी परिवारों के टूटने, महिलाओं-बच्चों पर हो रहे अत्याचार, आर्थिक बर्बादी, सड़क दुर्घटनाओं, अपराध वृद्धि और सरकारी प्राथमिकताओं के विरुद्ध जन-विद्रोह है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है, “जहां विरोध है, वहां दुकान नहीं खुलेगी। सिर्फ राजस्व के लिए शराब की दुकान नहीं खोली जाती।” लेकिन ग्रामीण महिलाएं पूछ रही हैं – तो फिर क्यों पहाड़ों में खुल रही हैं? स्कूल बंद हो रहे हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, सड़कें टूटी हुई हैं, लेकिन देहरादून में प्राथमिकता शराब राजस्व को दी जा रही है। यह रिपोर्ट इन सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करती है – ओगला, उडियारी बैंड, पिथौरागढ़ की कहानी, नैनीताल, पौड़ी, टिहरी की घटनाएं, सांसद अजय भट्ट का पत्र, शराब का परिवार-समाज पर विनाशकारी प्रभाव, अपराध-दुर्घटनाएं, अन्य मॉडल और सरकारी माइंडसेट का विश्लेषण।

महिलाएं सड़कों पर क्यों? रोज की पीड़ा और परिवारों का विनाश

उत्तराखंड की पहाड़ी महिलाएं शराब दुकानों के खिलाफ इसलिए सड़क पर हैं क्योंकि वे रोजाना इसके घातक परिणाम भुगत रही हैं। पुरुष और किशोर शराब पीकर घर लौटते हैं, परिवार पर अत्याचार करते हैं, बच्चों से मारपीट करते हैं और घर की छोटी-मोटी बचत शराब में उड़ा देते हैं। आर्थिक नुकसान के साथ सामाजिक और शारीरिक हानि भी होती है। महिलाएं कहती हैं, “शराब ने हमारे घरों को नर्क बना दिया। बचत खत्म, बच्चे लड़ते हैं, पति पीकर मारते हैं।”

पिथौरागढ़ के बेरीनाग तहसील के उडियारी बैंड में यह सच्चाई सबसे तीखी है। यहां दो साल से पानी की मांग लंबित है, लेकिन आबकारी विभाग ने शराब की नई दुकान खोल दी। ग्राम प्रधान हेमा महरा के नेतृत्व में महिलाएं हाथों में खाली बर्तन और बिच्छू घास लेकर अस्कोट-कर्णप्रयाग मोटर मार्ग पर प्रदर्शन कर रही हैं। हेमा महरा कहती हैं, “हम 2 किलोमीटर दूर नाले से पानी लाते हैं। घर में सुबह भरकर रखते हैं, दिनभर चलता है। लेकिन शराब की दुकान खुल गई। बाहर के लोग इसे ‘सरकार का तोहफा’ बता रहे थे। हम अपने बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं होने देंगे।” महिलाओं ने तहसीलदार और आबकारी अधिकारियों को घेरा, विधायक आवास घेराव की चेतावनी दी। दर्जा राज्य मंत्री नारायण राम आर्या ने आश्वासन दिया, लेकिन महिलाएं कह रही हैं – “झूठे आश्वासन। शराब नहीं, पानी और शिक्षा दो।” यह प्रदर्शन 13 दिनों से लगातार चल रहा है।

नैनीताल जिले में रातीघाट बाजार और मंगोली क्षेत्र में भी यही दृश्य। महिलाओं ने तहसील मुख्यालय पर प्रदर्शन किया, कुमाऊं कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा। वे कह रही हैं कि प्रस्तावित दुकान स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र के पास है, जो बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा को खतरे में डालेगी। एक महिला ने कहा, “पति पीकर आता है, घर में झगड़ा, बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। छोटी बचत शराब में चली जाती है।” अल्मोड़ा, चंपावत और ऊधम सिंह नगर में भी 55 नई दुकानों के प्रस्ताव पर विरोध है।

पौड़ी गढ़वाल में 2017 की यादें ताजा हैं। तब महिलाओं के प्रदर्शन के बाद तीन दुकानें (पौड़ी, अगरोड़ा, कोट) सील की गई थीं। आज भी महिलाएं कहती हैं, “शराब ने युवाओं को बेरोजगार बना दिया। पहले खेती-मजदूरी होती थी, अब नशा।” टिहरी के देवप्रयाग में धार्मिक स्थल के पास दुकान के खिलाफ एक विधवा महिला चार दिन से भूख हड़ताल पर है। उन्होंने कहा, “यह दुकान हमारे गांव को बर्बाद कर रही है। जमीन बिकेगी, बच्चों का भविष्य अंधकार में।” रुद्रप्रयाग की केदारघाटी में अवैध शराब और यात्रा मार्गों पर दुकानों के खिलाफ महिलाओं ने रैली निकाली।

ये कहानियां एक पैटर्न दिखाती हैं। पहाड़ों में पुरुष पलायन या मजदूरी करते हैं, महिलाएं अकेली खेती-घर संभालती हैं। शराब उपलब्ध होने से पुरुष नशे में लौटते हैं, घरेलू हिंसा बढ़ती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-5) के अनुसार, शराब पीने वाले पतियों की पत्नियां दोगुनी बार शारीरिक-मानसिक हिंसा का शिकार होती हैं। उत्तराखंड में क्रूरता के मामले हर नौ मिनट में दर्ज होते हैं, और शराब इसका प्रमुख कारण।

शराब परिवारों का विनाशक क्यों साबित हुई पहाड़ों में? विस्तृत विश्लेषण

पहाड़ी इलाकों में शराब का प्रभाव और गहरा है क्योंकि यहां की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक संरचना ही ऐसी है। पहाड़ों में खेती छोटी जोत की, पशुपालन और पर्यटन पर निर्भरता। पुरुषों का पलायन (लगभग 40-50% युवा बाहर) महिलाओं को अकेला छोड़ देता है। शराब सस्ती और आसानी से उपलब्ध हो जाने से नशाखोरी बढ़ी।

आर्थिक नुकसान: एक औसत पहाड़ी परिवार की मासिक बचत 2000-4000 रुपये होती है। शराब में यह पूरी उड़ जाती है। कर्ज बढ़ता है, जमीन-जायदाद बिकती है। एक अध्ययन (उत्तर भारत के गरीब परिवारों पर) बताता है कि शराब से आय का 20-30% हिस्सा नशे में चला जाता है, जिससे भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च घटता है। सामाजिक नुकसान: बच्चे स्कूल छोड़कर झगड़ों में लग जाते हैं। भाई-भाई, पड़ोसी-पड़ोसी में लड़ाई। शारीरिक नुकसान: लीवर सिरोसिस, कैंसर, मानसिक विकार। महिलाएं कहती हैं, “पहाड़ की मेहनत की संस्कृति चली गई। पहले सामूहिक खेती होती थी, अब पुरुष सुबह से शाम नशे में।”

NFHS डेटा और NCRB रिपोर्ट्स से साफ है कि शराब से घरेलू हिंसा 36-50% मामलों में जुड़ी है। पहाड़ों में महिलाएं अकेली, बच्चों का पालन-पोषण अकेले। नशे में पति मारपीट, गाली-गलौज। बच्चे लड़ते हैं, स्कूल छूटता है। आर्थिक तंगी से कुपोषण, बीमारी। यह विनाश चक्र है – शराब → हिंसा → गरीबी → और ज्यादा शराब।

पहाड़ों की शांति और काम का विनाशक: शराब का सामाजिक प्रभाव

पहाड़ पहले शांति, सहयोग और सामूहिक कार्य के प्रतीक थे। गांवों में उत्सव, सामूहिक खेती, पशु चराना। शराब ने इसे नष्ट कर दिया। नशे के बाद झगड़े, चोरी, मारपीट आम। पहले भाई-भाई मिलकर काम करते थे, अब शराब पीकर लड़ते हैं। काम का नुकसान: युवा बेरोजगार, समय नशे में बर्बाद। महिलाएं अकेली खेती संभालती हैं, लेकिन परिवार टूट जाता है।

शांति भंग: रात में नशेड़ी घूमते, महिलाओं-बच्चों को डर। पर्यटन प्रभावित – पहाड़ शांतिप्रिय पर्यटकों के लिए मशहूर, लेकिन नशे की छवि से पर्यटक दूर। काम की संस्कृति: पहाड़ी पुरुष पहले मेहनती, अब नशे में सुस्त। उत्पादकता घटती है, पलायन बढ़ता है।

ड्रिंक एंड ड्राइव: पहाड़ी सड़कों पर मौत का खेल

पहाड़ी सड़कें घुमावदार, संकरी, खड़ी चढ़ाई। नशे में ड्राइविंग से हर तीसरा-चौथा एक्सीडेंट जुड़ा। उत्तराखंड ट्रैफिक पुलिस के अनुसार, ड्रंक ड्राइविंग पर सख्ती है, लेकिन लागू नहीं। हिली जिलों में रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट (RTA) में 60-70% ड्राइवर फॉल्ट, जिसमें अल्कोहल शामिल। NCRB 2021 डेटा: भारत में 1,73,860 सड़क मौतों में 2,935 शराब/ड्रग्स से। उत्तराखंड में पहाड़ी जिलों में 20-30% दुर्घटनाएं ड्रंक ड्राइविंग से। 2010-11 में 500+ मौतें, आज संख्या बढ़ी।

महिलाएं कहती हैं, “पति नशे में गाड़ी चलाता, एक्सीडेंट हो जाता, परिवार बर्बाद।” हिल रोड्स पर स्पीड + नशा = मौत। एक अध्ययन (भारत के सड़क हादसों पर) बताता है कि शराब से दुर्घटनाएं 2-33% घायलों और 6-48% मृतकों में जुड़ी। पहाड़ों में यह और खतरनाक क्योंकि अस्पताल दूर, बचाव मुश्किल।

अपराध दर में वृद्धि और शराब का रोल

शराब से जुड़े अपराध बढ़े हैं। NCRB: घरेलू हिंसा, यौन अपराध, सड़क हिंसा में 39% (इंग्लैंड-वेल्स जैसे अध्ययनों से तुलना) अल्कोहल से। उत्तराखंड में महिलाओं के खिलाफ अपराध, चोरी, मारपीट बढ़े। शराब माफिया सक्रिय, अवैध शराब भी समस्या। एक रिपोर्ट: शराब-ड्रग्स से महिलाओं के खिलाफ अपराध 20-30% बढ़े। गांवों में नशे के बाद झगड़े, हत्या तक। शांति भंग से सामाजिक ताना-बाना टूटता है।

पिथौरागढ़ (उडियारी बैंड/ओगला, बेरीनाग): जैसा ऊपर वर्णित। महिलाओं ने बर्तन बजाए, बिच्छू घास लेकर प्रदर्शन। हेमा महरा: “शराब नहीं, पानी और शिक्षा।” कांग्रेस ने समर्थन दिया, एसडीएम को ज्ञापन। प्रदर्शन 13 दिन से प्रदर्शन जारी।

नैनीताल (रातीघाट, मंगोली): महिलाएं तहसील में भड़कीं। स्कूल-हॉस्पिटल पास दुकान का विरोध। कुमाऊं कमिश्नर को शिकायत।

पौड़ी: पुरानी घटनाएं – 2017 में तीन दुकानें सील। आज भी विरोध।

टिहरी (देवप्रयाग): भूख हड़ताल, धार्मिक स्थल पास दुकान। महिलाएं: “पवित्र धाम में नशा नहीं।”

ये कहानियां दिखाती हैं – महिलाएं आगे, सरकार पीछे।

सांसद अजय भट्ट का पत्र और राजनीतिक हस्तक्षेप

नैनीताल- उधम सिंह नगर संसदीय क्षेत्र से जुड़े सांसद अजय भट्ट ने पहले भी शराब नीति पर सवाल उठाए। हाल के संदर्भ में कैंची धाम और संवेदनशील क्षेत्रों में दुकानों पर बंदी की मांग की। उन्होंने सीएम को पत्र लिखकर रातीघाट, मंगोली जैसे क्षेत्रों में दुकानें बंद करने पर जोर दिया। भट्ट ने जनभावनाओं का सम्मान मांगा। हालांकि नई नीति में धार्मिक स्थल पास बंदी है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में लागू करने की मांग जारी।

अधिकारी क्यों शराब और राजस्व पर फोकस? माइंडसेट का विश्लेषण

2025-26 आबकारी नीति: 5060 करोड़ राजस्व लक्ष्य (2023-24 में 4038 करोड़, 2024-25 में 4439 करोड़ टारगेट)। कुल टैक्स रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा। लेकिन बजट: शिक्षा 12,466 करोड़, स्वास्थ्य 4,748 करोड़। ग्रामीण शिकायत – स्कूल बंद, टीचर नहीं, डॉक्टर नहीं, सड़कें खस्ता, जल जीवन मिशन अमल नहीं। लोग कहते हैं, “देहरादून में प्राथमिकता शराब। यह पैसा कमाने का माइंडसेट है।” नीति में MRP से ज्यादा बिक्री पर लाइसेंस रद्द, लेकिन राजस्व पहले। आज के अधिकारी सिर्फ धन कमाने तक सीमित हैं किंतु सामाजिक सुरक्षा और शराब से उजड़ने वाली व्यवस्था पर उनका बिल्कुल ध्यान नहीं है।

अन्य मॉडल जो सामाजिक शांति नहीं बिगाड़ते

  1. पूर्ण ड्राई जोन: संवेदनशील गांवों में पूर्ण प्रतिबंध
  2. सरकारी नियंत्रित आउटलेट: सीमित समय (10 AM-5 PM), उम्र जांच, 500 मीटर दूरी स्कूल-हॉस्पिटल।
  3. कम्युनिटी मॉनिटरिंग: ग्राम सभा तय करे, राजस्व गांव को।
  4. अल्टरनेटिव राजस्व: पर्यटन, कृषि, हर्बल उत्पाद। गुजरात मॉडल (प्रतिबंध लेकिन ब्लैक मार्केट) से सीख।

ये मॉडल राजस्व बनाए रखते शांति बचाते।

पहाड़ों को बचाने और नशा मुक्त कर समृद्ध करने का समय**

उत्तराखंड देवभूमि है। शराब यहां परिवार, शांति, काम नष्ट कर रही। महिलाओं का आंदोलन जन-आंदोलन बन चुका। सरकार को सुनना चाहिए – दुकानें बंद जहां विरोध, राजस्व अल्टरनेटिव से, विकास बुनियादी सुविधाओं पर। अन्यथा परिवार टूटेंगे, समाज बिखरेगा, पहाड़ सूने होंगे। यह रिपोर्ट तथ्यों, कहानियों, विश्लेषण और सुझावों पर आधारित है। बदलाव जरूरी है।

(सभी तथ्य उपलब्ध समाचारों और रिपोर्टों पर आधारित।)

By The Common Man

News and public affairs

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *