आज उत्तरायणी (मकर संक्रांति) के पावन अवसर पर हल्द्वानी के रानीबाग क्षेत्र में भव्य धार्मिक आयोजन हो रहा है, जो देर रात तक जारी है। चित्रेश्वर महादेव मंदिर, माता जिया रानी की पवित्र गुफा और चित्रशीला (जिया रानी का घाघरा पत्थर) परिसर में सुबह से ही हजारों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
कुमाऊं–गढ़वाल के नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चम्पावत, टिहरी, पौड़ी सहित विभिन्न जिलों से ही नहीं, बल्कि नेपाल, दिल्ली, मुंबई और विदेशों तक बसे कत्युरी वंशज एवं माता जिया रानी के अनुयायी पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा में “जय जिया रानी” के जयकारों के साथ इस पवित्र तीर्थ पर पहुंचे। इस वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में कहीं अधिक देखी जा रही है, जो उत्तराखंड की सांस्कृतिक जड़ों और देवभूमि की रक्षा की भावना को दर्शाती है।
माता जिया रानी और राजा प्रीतमदेव की वीर गाथा
14वीं शताब्दी के अंत (लगभग 1398–1400 ई.) में जब तैमूर लंग की तुर्क-मंगोल सेनाओं ने उत्तर भारत पर आक्रमण किया और हरिद्वार तक पहुंचकर कुमाऊं-गढ़वाल की ओर बढ़ने का प्रयास किया, तब कत्युरी राजा प्रीतमदेव (पृथ्वीपाल) ने देवभूमि की रक्षा के लिए डटकर मुकाबला किया। उन्होंने स्थानीय पहाड़ी योद्धाओं को संगठित कर दुर्गम हिमालयी भूगोल का लाभ उठाते हुए तुर्क सेनाओं को कई बार पीछे हटने पर मजबूर किया।
युद्ध में राजा प्रीतमदेव वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनके बलिदान ने उत्तराखंड की पवित्र भूमि, मंदिरों और लोकसंस्कृति को बाहरी आक्रमण से बचाए रखा।
राजा के शहीद होने के बाद उनकी महारानी माता जिया रानी ने राज्य की बागडोर संभाली। लोककथाओं के अनुसार, तुर्क आक्रमणकारियों से घिरी जिया रानी ने समर्पण से इनकार किया और शिवभक्ति में लीन होकर अंतिम क्षण तक संघर्ष किया। मान्यता है कि जब दुश्मन उन्हें पकड़ने के करीब पहुंचा, तो उनका घाघरा पत्थर में परिवर्तित हो गया और वे गौला नदी तट स्थित पवित्र गुफा में समा गईं। यह घटना देवभूमि की रक्षा, धर्म और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का प्रतीक मानी जाती है।
उत्तराखंड की संस्कृति और पहचान की रक्षा
राजा प्रीतमदेव और माता जिया रानी के त्याग ने उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता, कत्युरी शैली के मंदिरों, लोक परंपराओं (जागर, छोलिया, झोड़ा) और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा। इन्हीं बलिदानों के कारण उत्तराखंड आज भी देवभूमि के रूप में जाना जाता है।
महोत्सव की प्रमुख झलकियां
- गौला नदी में उत्तरायणी स्नान
- रातभर चल रहे जागर गायन में जिया रानी की वीर गाथाएं
- सामूहिक पूजा, दीप प्रज्ज्वलन और जयकारे
- छोलिया और झोड़ा जैसे पारंपरिक लोकनृत्य
यह महोत्सव न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक एकता और देवभूमि की रक्षा की भावना का जीवंत प्रतीक है।
जय जिया रानी! जय उत्तराखंड!
