देहरादून/पौड़ी गढ़वाल/रुद्रप्रयाग/नैनीताल/चमोली, उत्तराखंड – 6 फरवरी 2026
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष (human-wildlife conflict) अब एक गंभीर और लगातार बढ़ती आपदा बन चुकी है। भालू (Asiatic black bear), तेंदुआ (leopard), बाघ (tiger) और अन्य जंगली जानवरों के हमलों से 2025 में दर्जनों मौतें हुईं, जबकि 2026 की शुरुआत में ही कई घातक घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं। महिलाएं (चारा और लकड़ी इकट्ठा करने वाली), बच्चे (आंगन या स्कूल में खेलते) और बुजुर्ग सबसे ज्यादा शिकार बन रहे हैं। ग्रामीणों में भय का माहौल है, कई गांव “घोस्ट विलेज” (खाली गांव) बन रहे हैं, और पलायन बढ़ रहा है। राज्य सरकार और वन विभाग पर बड़ी स्तर पर विफलता के आरोप लग रहे हैं – ठोस योजना की कमी, संसाधनों का दुरुपयोग, प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और फंड्स का कम उपयोग प्रमुख मुद्दे हैं।
यहां रुद्रप्रयाग (सिंद्रवानी गांव) में 5 वर्षीय बच्चे (दक्ष बिष्ट) को तेंदुए ने घर के आंगन से उठाकर जंगल में घसीट लिया और मार डाला। बच्चा खेल रहा था। पुलिस और वन विभाग ने पुष्टि की। वहीं नैनीताल (भिमताल ब्लॉक, जूना एस्टेट) में 60 वर्षीय महिला को तेंदुए ने मार डाला। शव खाई में मिला, गहरी चोटें। ब्लॉक में दो महीनों में यह चौथी मौत। रेंज ऑफिसर विजय मेलकानी ने पुष्टि की। वन विभाग और प्रशासन पूरी तरह से फेल हो गया है I
राज्य में यह समस्या अब केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि आजीविका, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और ग्रामीण पलायन का भी मुद्दा बन चुकी है।
राज्य स्तर पर आंकड़े: बढ़ता बोझ और मौतों का सिलसिला
उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण सफल रहा है – तेंदुआ और बाघ संख्या बढ़ी है – लेकिन इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष भी तेजी से बढ़ा है। वन विभाग और मीडिया रिपोर्ट्स से प्रमुख आंकड़े:
- 2025 में कुल मौतें: मानव-वन्यजीव संघर्ष से 68 मौतें और 488 घायल (बाघ, तेंदुआ, भालू सहित)।
- तेंदुआ हमले: 19 मौतें और 102 घायल। 2000-2025 में 539 मौतें और 2,052+ घायल। पौड़ी गढ़वाल सबसे प्रभावित (2000-2020 में 290 हमले, औसतन 13.81 प्रति वर्ष)।
- भालू हमले: 71 हमले (2025 में सबसे अधिक), 6-8 मौतें (25 वर्षों में सबसे ज्यादा), 69+ घायल। महिलाओं में 80% पीड़ित (चारा/लकड़ी इकट्ठा करने वाली)। पिछले 25 वर्षों में 2,009 घायल।
- बाघ हमले: 12 मौतें और 5 घायल (2025 में)।
- कुल 2000 से अब तक: 900+ मौतें (तेंदुआ 548, हाथी 230, बाघ 106, भालू 70, सांप 260, अन्य 49)। घायल: तेंदुआ 2,126, भालू 2,013, आदि।
- 2026 की शुरुआत (जनवरी-फरवरी): 20 दिनों में 7 मौतें (4 बाघ, 2 तेंदुआ, अन्य)। जनवरी में तेंदुआ/भालू से कई मौतें और घायल।
वन्यजीव मौतें: 2020-2025 में 749 तेंदुआ और 86 बाघ मरे (सड़क हादसे, शिकार, संघर्ष)।
हालिया प्रमुख घटनाएं (जनवरी-फरवरी 2026)
- रुद्रप्रयाग (सिंद्रवानी गांव): 5 वर्षीय बच्चे (दक्ष बिष्ट) को तेंदुए ने घर के आंगन से उठाकर जंगल में घसीट लिया और मौत कर दी। बच्चा खेल रहा था। पुलिस और वन विभाग ने पुष्टि की।
- नैनीताल (भिमताल ब्लॉक, जूना एस्टेट): 60 वर्षीय महिला को तेंदुए (या बड़े बिल्ली) ने मार डाला। शव खाई में मिला, गहरी चोटें। ब्लॉक में दो महीनों में चौथी मौत। रेंज ऑफिसर विजय मेलकानी ने पुष्टि की।
- पौड़ी गढ़वाल (बारस्वार गांव, जयहरीखाल): 1.5-3 वर्षीय बच्ची को तेंदुए ने मां की गोद से छीनकर मौत कर दी। गांव अब “घोस्ट विलेज” बनने की कगार पर।
- पौड़ी गढ़वाल (गजाल्ट/बड़ा गांव): 45 वर्षीय राजेंद्र नौटियाल को तेंदुए ने मंदिर से लौटते समय मार डाला। जिले में एक महीने में तीसरी मौत।
- भालू हमले: चमोली में हरिशंकर जूनियर स्कूल में मादा भालू और बच्चा घुसकर 11 वर्षीय छात्र को घायल किया। स्कूल स्टाफ ने भगाया। 2025 में 71 हमले, महिलाओं पर 80% प्रभाव।
- अन्य: बाघ से 4 मौतें (कालागढ़, रामनगर, जनवरी 2026)। नैनीताल में महिला की मौत। रुद्रप्रयाग में भालू/तेंदुआ से 15+ घायल।
सरकारी और वन विभाग की बड़ी विफलता: आलोचना और आरोप
राज्य सरकार और वन विभाग पर कड़ी आलोचना हो रही है। विपक्षी दल , विशेषज्ञ और ग्रामीणों के अनुसार:
- ठोस योजना की कमी: कोई कंक्रीट प्लान नहीं। प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई (ट्रैपिंग, शूट-एट-साइट) पर निर्भरता, रोकथाम पर फोकस नहीं।
- संसाधनों का अभाव और दुरुपयोग: आधिकारिक शूटर्स की कमी से निजी शिकारियों पर निर्भरता। CAMPA फंड्स का कम उपयोग (2025-26 में 40% से कम खर्च; वन्यजीव क्षेत्र में केवल 41%)। Corbett Tiger Reserve में 18.32% उपयोग।
- प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण: शिकायतों पर कार्रवाई नहीं, हमले के बाद ही सक्रियता। कांग्रेस नेता गणेश गोदियाल: “सरकार में न इच्छाशक्ति है, न ठोस योजना। कई सुझाव दिए, लेकिन लागू नहीं किए।”
- जागरूकता/सुरक्षा उपायों में कमी: फेंसिंग, सोलर लाइट्स, AI अलर्ट सिस्टम की घोषणा हुई, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभाव सीमित। कई गांवों में स्कूल ऑनलाइन, बच्चे एस्कॉर्ट से जाते हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य/राहत की कमी: हमलों के बाद पीड़ितों को मनोवैज्ञानिक सहायता नहीं। परिवारों का पलायन (7-10% लोग वन्यजीव आतंक से पलायन का कारण बताते हैं)।
- राजनीतिक आलोचना: मंत्री सुबोध उनियाल ने निर्देश दिए (स्कूल एस्कॉर्ट, पौड़ी DFO हटाया), लेकिन ग्रामीणों में असंतोष। ज़बर्दस्त विरोध प्रदर्शन, सड़क जाम, वन कार्यालय घेराव आम बात हो चुकी है किन्तु फिर भी कोई कार्यवाही नहीं हो रही है, और घटनायें रुकने का नाम नहीं ले रही है।
कारण और चुनौतियां
- जलवायु परिवर्तन: कम बर्फबारी से भालू का हाइबरनेशन देरी से, भूखे भालू गांवों में।
- आवास सिकुड़ना: वन कटाई, फसल/कचरा से जानवर गांवों में।
- संरक्षण सफलता: तेंदुआ/बाघ संख्या बढ़ी, लेकिन शिकार कम।
- ग्रामीण प्रभाव: महिलाएं चारा इकट्ठा करने जाती हैं, बच्चे आंगन में खेलते हैं। शिक्षा प्रभावित (55 स्कूल ऑनलाइन)।
- सलाह: अकेले जंगल न जाएं, समूह में, शोर मचाकर भगाएं, बच्चों को अकेला न छोड़ें।
यह संकट राज्य सरकार से मजबूत नीतियां, फंड्स उपयोग, फेंसिंग, जागरूकता और स्थायी समाधान की मांग कर रहा है। निर्दोष लोग जान गंवा रहे हैं, परिवार खत्म हो रहे हैं, प्रशासन देहरादून में बैठकर मीटिंग-मीटिंग और कागजी आदेश तक सीमित है, सरकारी वन और राजस्व भूमि में कब्जे हो रहे हैं, और जमीनी कार्यवाही पर वन विभाग पूर्णतया विफल हो चुका है I
यदि विफलता जारी रही, तो पहाड़ी गांव खाली हो सकते हैं और पलायन बढ़ेगा।
