
देहरादून, 20 मार्च 2026- सिद्धार्थ राणा: उत्तराखंड वन विकास निगम (UFDC) के मुख्यालय में वित्तीय अनियमितताओं का एक और बड़ा मामला सामने आया है, जो सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ राज्य के संवेदनशील वन प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल खड़ा करता है। तत्कालीन प्रबंध निदेशक गिरिजा शंकर पांडेय पर अप्रैल 2025 की एक विदेश यात्रा के दौरान फर्जी बिलिंग के जरिए लाखों रुपये की हेराफेरी का गंभीर आरोप लगा है।
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक ही व्यक्ति द्वारा एक ही तारीखों पर दो-तीन अलग-अलग शहरों या देशों में होटल ठहरने के बिल पास कर दिए गए, जबकि आधिकारिक रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से बताते हैं कि उस दौरान पांडेय देहरादून में ही मौजूद थे। कुल फर्जी भुगतान 9.30 लाख रुपये से अधिक का है, जिसमें होटल बिल, क्रूज ठहराव, निजी खरीदारी और अन्य खर्च शामिल हैं। यह मामला सरकारी नियमों की खुलेआम अवहेलना, टेंडर प्रक्रिया की अनदेखी और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण है।
अभी तक किसी औपचारिक एफआईआर या सीबीआई/ईडी जांच की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राज्य सरकार, वन विभाग और लोक लेखा समिति के स्तर पर तत्काल प्रशासनिक और जांच संबंधी कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। उत्तराखंड वन विकास निगम जैसा संगठन, जो हिमालयी जंगलों की रक्षा और व्यावसायिक उपयोग दोनों की जिम्मेदारी संभालता है, ऐसे घोटालों से गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
घोटाले की पूरी डिटेल: हर बिल की बारीकी से जांच, ओवरलैपिंग तारीखें और नियमों का स्पष्ट उल्लंघन
घोटाले का मुख्य केंद्र बिंदु गिरिजा शंकर पांडेय की 2 अप्रैल 2025 से 8 अप्रैल 2025 तक की विदेश यात्रा है। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों और बिलों की जांच से कई असंगतियां और असंभव दावे सामने आते हैं। आइए हर हिस्से को विस्तार से समझते हैं:
1. देहरादून में मौजूदगी के दौरान हनोई के Dolce Hotel का बिल – असंभव चेक-इन
एक टूर एजेंसी को 1 अप्रैल 2025 से 5 अप्रैल 2025 तक वियतनाम के हनोई स्थित Dolce Hotel में ठहरने के नाम पर 2,75,258 रुपये का भुगतान किया गया। लेकिन निगम के आंतरिक रिकॉर्ड और उपस्थिति रजिस्टर स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि 1 अप्रैल 2025 को गिरिजा शंकर पांडेय देहरादून मुख्यालय में ही मौजूद थे और आधिकारिक ड्यूटी पर थे। हजारों किलोमीटर दूर विदेश में उसी दिन होटल चेक-इन कैसे संभव था?
यह बिल यात्रा शुरू होने से एक दिन पहले का है, जो सामान्य प्रक्रिया के विपरीत है। सरकारी नियमों के अनुसार विदेश यात्रा के लिए पहले से मंजूरी, यात्रा कार्यक्रम और बजट स्वीकृति जरूरी होती है। यहां तो बिल यात्रा शुरू होने से पहले पास हो गया था, जो संदेह को और गहरा करता है।
2. निजी उपयोग की वस्तुओं पर सरकारी खर्च – 44,880 रुपये के शॉल और टोपियां
यात्रा के दौरान शॉल, टोपियां और अन्य निजी उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी के लिए 44,880 रुपये निगम के खाते से निकाले गए। General Financial Rules (GFR) 2017 और विदेश यात्रा दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं कि आधिकारिक टूर पर निजी खरीदारी (स्मृति-चिन्ह, व्यक्तिगत सामान) सरकारी फंड से नहीं की जा सकती।
यह राशि DA/TA (Dearness Allowance/Travelling Allowance) के दायरे से पूरी तरह बाहर है। क्या ये सामान पांडेय के परिवार, रिश्तेदारों या दोस्तों के लिए खरीदा गया? या फिर फर्जी इनवॉइस के जरिए पैसे निकालने का एक तरीका था? लगभग 45 हजार रुपये का यह निजी फायदा सीधे जनता के टैक्स से लिया गया।
3. एक ही तारीखों पर दो अलग-अलग होटलों का बिल – Melia और Saim Reap का ओवरलैप
6 और 7 अप्रैल 2025 के लिए हनोई के Melia Hotel में ठहरने का 1,17,237 रुपये का बिल पास किया गया। ठीक उसी तारीखों (6 अप्रैल से 8 अप्रैल 2025) के लिए कंबोडिया के Siem Reap (Saim Reap लिखा गया) स्थित होटल में 1,42,857 रुपये का भुगतान दिखाया गया।
यानी 6 और 7 अप्रैल को एक ही व्यक्ति दो अलग-अलग देशों (वियतनाम और कंबोडिया) के दो अलग-अलग होटलों में ठहरा कैसे? दोनों शहरों के बीच उड़ान में भी कई घंटे लगते हैं और एक ही दिन में दोनों जगह चेक-इन/चेक-आउट शारीरिक रूप से असंभव है। इन दो बिलों से कुल 2,60,094 रुपये का फर्जी भुगतान हुआ। यह धोखाधड़ी इतनी स्पष्ट है कि किसी भी बेसिक ऑडिट में पकड़ी जा सकती थी।
4. क्रूज ठहराव का अलग बिल – एक ही दिन तीन अलग-अलग लोकेशन्स
4 और 5 अप्रैल 2025 के लिए “क्रूज पर ठहरने और यात्रा” के नाम पर अलग से 3,50,191 रुपये का भुगतान किया गया। लेकिन उसी अवधि में Dolce Hotel का बिल भी चल रहा था (1 से 5 अप्रैल तक)। यानी 4 और 5 अप्रैल को एक व्यक्ति तीन अलग-अलग जगहों पर ठहरा: Dolce Hotel (हनोई), एक विदेशी क्रूज और संभवतः Siem Reap की शुरुआत। क्रूज बिल अकेला ही 3.5 लाख का है, जो लग्जरी ट्रैवल का संकेत देता है। सरकारी यात्रा में क्रूज जैसा खर्च कौन मंजूर करता है?
कुल फर्जी राशि और तरीका
उपरोक्त बिलों का कुल जोड़ 9,30,423 रुपये है। विभिन्न रिपोर्टों में इसे 10 लाख रुपये से अधिक बताया गया है। पूरी विदेश यात्रा एक टूर एजेंसी के माध्यम से कराई गई, जबकि नियमों के अनुसार DA/TA क्लेम व्यक्तिगत रूप से होता है। एजेंसी का चयन बिना टेंडर के हुआ – GFR 2017 का खुला उल्लंघन।
उत्तराखंड वन विकास निगम: जिम्मेदारी और चुनौतियां
UFDC की स्थापना 1974 में हुई। यह लकड़ी निकासी, राल संग्रह, इको-टूरिज्म, नदी खनन रॉयल्टी संभालता है। सैकड़ों करोड़ का राजस्व जमा करता है। प्रबंध निदेशक IFS अधिकारी होते हैं। विदेश यात्राएं कॉन्फ्रेंस के लिए होती हैं, लेकिन यहां फर्जी बिलिंग ने सिस्टम की कमजोरी उजागर की।
नियमों का कितना बड़ा उल्लंघन? कानूनी आयाम
विदेश यात्रा नियम, प्रोक्योरमेंट नियम (GFR), Prevention of Corruption Act – सभी टूटे। CAG और इंटरनल ऑडिट में छूट गया। जांच में वसूली, जेल और बर्खास्तगी संभव।
इस घोटाले के व्यापक प्रभाव
10 लाख का घोटाला छोटा लगता है, लेकिन खजाने का नुकसान, जनता का विश्वास टूटना और पर्यावरणीय खतरा पैदा करता है। सही जगह लगता तो वनरोपण, निगरानी बेहतर होती। अब डिजिटल ट्रैकिंग जरूरी।
सरकारी विभागों में सार्वजनिक कोष से मोबाइल, लैपटॉप और एक्सेसरी खरीद का व्यापक घोटाला: CAG रिपोर्ट्स में बार-बार खुलासा, फिर भी दुरुपयोग जारी
यह UFDC फर्जी बिलिंग घोटाला अकेला नहीं है। भारत के लगभग सभी सरकारी विभागों – वन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदिवासी विकास, परिवहन, कौशल विकास आदि में – सार्वजनिक कोष (जनता का टैक्स पैसा) से मोबाइल फोन, आईफोन, लैपटॉप, फ्रिज, कूलर और अन्य व्यक्तिगत एक्सेसरी खरीदने या रिचार्ज कराने के मामले CAG रिपोर्ट्स में बार-बार सामने आए हैं। CAG खुद इन अनियमितताओं को उजागर करता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में पूर्ण जवाबदेही नहीं बन पाती और “CAG गिनती नहीं कर पाता” जैसी स्थिति बनी रहती है क्योंकि फॉलो-अप एक्शन कमजोर होता है।
उत्तराखंड वन विभाग का ही उदाहरण (CAMPA फंड दुरुपयोग):
CAG की 2021-22 रिपोर्ट में स्पष्ट खुलासा हुआ कि Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority (CAMPA) के तहत वन संरक्षण के लिए आए फंड को वन विभाग और स्वास्थ्य विभाग ने iPhone, लैपटॉप, फ्रिज, कूलर खरीदने, भवन नवीनीकरण और अदालती मामलों पर खर्च कर दिया। 13.86 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि वन रोपण के बजाय इन व्यक्तिगत/अनधिकृत खर्चों पर चली गई। वन विभाग के डिविजनल स्तर पर टाइगर सफारी प्रोजेक्ट, पर्सनल ट्रैवल और ऑफिस सजावट के नाम पर भी फंड डायवर्ट हुए। यही विभाग जहां UFDC का घोटाला हुआ, वहीं CAMPA फंड से आईफोन खरीदने का मामला CAG ने पकड़ा, लेकिन पूर्ण वसूली और अभियोजन अभी तक प्रभावी नहीं दिखा।
ओडिशा में आदिवासी विकास एजेंसियों (ITDA) का मामला:
CAG की हालिया रिपोर्ट (2018-23) में 11 ITDA में इंजीनियरों (JE/AE) द्वारा सार्वजनिक फंड (621.79 करोड़) को 71 बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर personal transactions किए गए। इनमें ATM से कैश निकासी, POS पेमेंट, इंश्योरेंस प्रीमियम, मोबाइल फोन रिचार्ज और UPI ट्रांजेक्शन शामिल थे – कुल 148.75 करोड़ रुपये का संदिग्ध दुरुपयोग। ट्राइबल वेलफेयर के फंड से मोबाइल रिचार्ज जैसे व्यक्तिगत खर्च – यह स्पष्ट मिसएप्रोप्रिएशन है, लेकिन स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी तय करने में देरी हो रही है।
अन्य विभागों के उदाहरण:
- स्वास्थ्य विभाग (उत्तराखंड और अन्य राज्यों में): CAG रिपोर्ट्स में PMJAY/Ayushman Bharat जैसे स्कीम फंड से डेड पेशेंट के नाम पर क्लेम और गैजेट खरीद के मामले।
- कौशल विकास (Skill India): CAG ने ghost beneficiaries और डेटा फ्रॉड के साथ फंड मिसयूज पकड़ा।
- परिवहन और अन्य PSU: BSNL जैसे विभागों में भी अनियमित खर्च।
- शिक्षा, ग्रामीण विकास आदि: लैपटॉप/मोबाइल खरीद बिना टेंडर या व्यक्तिगत उपयोग पर।
ये मामले दिखाते हैं कि मोबाइल और एक्सेसरी खरीद का दुरुपयोग सभी विभागों में व्यवस्थित है। CAG रिपोर्ट्स हर साल लाखों करोड़ के अनियमित खर्च उजागर करती हैं, लेकिन “CAG गिनती नहीं कर पाता” क्योंकि राज्य सरकारें फॉलो-अप में ढील देती हैं और अधिकारी बच निकलते हैं।
सार्वजनिक कोष की जिम्मेदारी: जनता का टैक्स पैसा, फिड्यूशियरी ड्यूटी
सार्वजनिक कोष (Consolidated Fund of India/राज्य कोष) जनता के टैक्स, फीस और राजस्व से बनता है। अधिकारी इसके ट्रस्टी (fiduciary) हैं – Article 266 Constitution के तहत। GFR 2017, Delegation of Financial Powers Rules और Prevention of Corruption Act 1988 के तहत हर खर्च “public purpose” के लिए, transparent और accountable होना चाहिए। व्यक्तिगत मोबाइल/एक्सेसरी खरीदना या रिचार्ज कराना fiduciary breach है।
दुरुपयोग पकड़ना: CAG की भूमिका और नई तकनीकें
CAG compliance/performance audit से पकड़ता है (जैसे Uttarakhand CAMPA, Odisha ITDA)। लेकिन catching misuse के लिए:
- AI/ML और digital forensic tools (CAG स्वयं सुझाव दे रहा है) – beneficiary schemes में fraud detect करने के लिए।
- e-procurement portal, GPS tracking, real-time bill upload।
- Whistleblower protection और RTI से आमजन की भागीदारी।
- Internal audit + third-party verification अनिवार्य।
CAG ने हाल ही में कहा कि digital tools से fraudulent cases बड़े पैमाने पर पकड़े जा रहे हैं, लेकिन राज्यों में implementation कमजोर।
जवाबदेही, पारदर्शिता और अधिकारियों का अभियोजन लाना
जवाबदेही: Vigilance Department, CVC, CBI/ED जांच अनिवार्य। संपत्ति जब्ती, promotion रोकना।
पारदर्शिता: All purchases >5 लाख e-tender पर, public dashboard पर खर्च display। Post-audit report सार्वजनिक।
अभियोजन: PCA 1988 की धारा 7,13 के तहत – criminal case, jail + recovery। CAG findings पर स्वतः FIR, fast-track court। उत्तराखंड CAMPA और Odisha ITDA मामलों में अभी तक mass prosecution नहीं हुई – यही मुख्य समस्या।
सरकार को चाहिए:
- Special audit cell हर विभाग में।
- Officer accountability law – CAG report पर 3 महीने में action report।
- Digital India के तहत blockchain billing।
जनता, मीडिया और NGO को दबाव बनाना होगा। अगर आज मोबाइल/फर्जी बिल छूट गए तो कल करोड़ों का घोटाला होगा।
अब आगे क्या? जांच, सुधार और जवाबदेही की जरूरत
- ED/Vigilance जांच तुरंत।
- पांडेय से स्पष्टीकरण + संपत्ति जांच।
- पूरे UFDC + सभी विभागों का special audit।
- नई पॉलिसी: विदेश टूर + गैजेट खरीद पर ब्लॉकचेन और थर्ड पार्टी वेरिफिकेशन।
निष्कर्ष: पारदर्शिता और जवाबदेही ही हिमालय के जंगलों और सार्वजनिक कोष का भविष्य बचा सकती है
UFDC घोटाला + CAMPA iPhone खरीद + Odisha mobile recharge जैसे मामले पूरे सरकारी तंत्र में सड़न दिखाते हैं। गिरिजा शंकर पांडेय जैसे अधिकारी और अन्य विभागों के कर्मचारी अगर जनता के पैसे से व्यक्तिगत लग्जरी लेते हैं तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
सरकार को सख्ती दिखानी होगी – FIR, जांच, सजा और बरामदगी। CAG रिपोर्ट्स को action में बदलना होगा। केवल तभी वन संरक्षण, विकास और जनता का विश्वास मजबूत होगा। उत्तराखंड के जंगल पूरे देश की पर्यावरणीय सुरक्षा हैं – इन्हें बचाने के लिए सिस्टम की साफ-सफाई जरूरी है।