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गंगा घाट हरिद्वार पर दो दोस्त के तेज धारा में, प्रशासन बेपरवाह,गंगा घाटों पर डूबने की घटनाएं: लापरवाही का दर्दनाक सिलसिला और सुरक्षा की मांग

Dehradun, 04-04-2026/ उत्तराखंड के गंगा घाट हरिद्वार पर दो दोस्तों के तेज धारा में डूबने की ताजा घटना ने एक बार फिर सिस्टम की गंभीर लापरवाही को उजागर कर दिया है। दो युवक स्नान करते समय गंगा की प्रचंड लहरों में समा गए, जिससे परिवार शोकाकुल है। यह कोई पहली घटना नहीं है — हर साल कांवड़ यात्रा, स्नान पर्व और पर्यटन सीजन में दर्जनों लोग डूबते हैं। SDRF और जल पुलिस बचाव कार्य करती है, लेकिन रोकथाम लगभग न के बराबर है।

घटना का दर्दनाक विवरण

दोनों युवक गंगा घाट पर नहाने गए थे। अचानक तेज बहाव ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। बचाव प्रयास नाकाम रहे और दोनों की जान चली गई। ऐसी घटनाएं नियमित रूप से हो रही हैं — कंगड़ा घाट, हर की पौड़ी, त्रिवेणी घाट, शिवपुरी आदि जगहों पर युवा, कांवड़िए और पर्यटक बार-बार धारा में बह जाते हैं। कई बार चेतावनी रेलिंग पार करके सेल्फी या स्टंट करने की कोशिश में जान जाती है।

सुरक्षा व्यवस्था में घोर लापरवाही

  • निगरानी की भारी कमी: घाटों पर वाटर पुलिस की पर्याप्त तैनाती नहीं है। SDRF की टीमें घटना के बाद बचाव करती हैं, लेकिन निरंतर पेट्रोलिंग और रोकथाम का इंतजाम कमजोर है।
  • लाइफगार्ड और उपकरणों की कमी: ज्यादातर घाटों पर स्थायी लाइफगार्ड नहीं हैं। लाइफ जैकेट, फ्लोटिंग बैरियर, बचाव बोट और CPR किट पर्याप्त नहीं।
  • चेतावनी व्यवस्था फेल: कुछ जगहों पर बोर्ड लगे हैं, लेकिन लाउडस्पीकर से नियमित चेतावनी या रीयल-टाइम जल स्तर की जानकारी नहीं दी जाती। खतरनाक क्षेत्रों में सख्त बैरिकेडिंग भी नहीं है।
  • प्रशासन और पुलिस की असंवेदनशीलता: पिछले कई वर्षों की घटनाओं के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं। घाट प्रशासन सिर्फ भीड़ नियंत्रण पर ध्यान देता है, सुरक्षा पर नहीं।

घाटों से राजस्व तो आता है, सुरक्षा नहीं

हरिद्वार और ऋषिकेश के घाट लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों से भरे रहते हैं। ये घाट सरकार के लिए अच्छा-खासा राजस्व पैदा करते हैं — दान, पर्यटन शुल्क और संबंधित गतिविधियों से। लेकिन इस राजस्व का एक छोटा सा हिस्सा भी लोगों की जान बचाने पर खर्च नहीं होता। घाट सिर्फ कमाई का साधन बनकर रह गए हैं, जबकि आस्था के केंद्र होने के नाते यहां सुरक्षा पहले होनी चाहिए।

जरूरी सुरक्षा उपाय — विस्तार से क्या किया जाए

गंगा घाटों को सुरक्षित बनाने के लिए निम्नलिखित व्यापक उपाय तुरंत अपनाए जाने चाहिए:

  1. मानव संसाधन:
  • स्थायी जल पुलिस की तैनाती — हर प्रमुख घाट पर 24×7 बोट पेट्रोलिंग।
  • प्रशिक्षित लाइफगार्ड और SDRF की नियमित ड्यूटी, खासकर सीजन में।
  • घाट अपनाने वाली संस्थाओं को सुरक्षा गार्ड रखना अनिवार्य।
  1. भौतिक इंतजाम:
  • खतरनाक क्षेत्रों में मजबूत बैरिकेडिंग और फ्लोटिंग बैरियर।
  • लाइफ जैकेट किराए पर उपलब्ध और कुछ जगहों पर अनिवार्य।
  • बचाव उपकरण (रस्सी, बोट, लाइफ ब्यूयॉय) हर घाट पर।
  1. तकनीकी व्यवस्था:
  • सीसीटीवी कैमरे और कंट्रोल रूम से रीयल-टाइम निगरानी।
  • जल स्तर सेंसर और स्वचालित अलर्ट सिस्टम।
  • फिसलन रोधक घाट, बेहतर रोशनी और आपात निकास पथ।
  1. जागरूकता और सख्ती:
  • बड़े चेतावनी बोर्ड, लाउडस्पीकर और सोशल मीडिया अभियान।
  • गैर-निर्दिष्ट जगहों पर नहाने पर जुर्माना और कानूनी कार्रवाई।
  • पर्यटकों/श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा टिप्स अनिवार्य।
  1. प्रशासनिक सुधार:
  • घाटों से प्राप्त राजस्व का बड़ा हिस्सा सुरक्षा पर खर्च।
  • नियमित समीक्षा बैठकें और लाइफगार्डों की ट्रेनिंग।
  • घाटों का सुरक्षित डिजाइन और मरम्मत।

सावधानी और अपील

दो युवकों की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही का नतीजा है। इतनी मौतों के बाद भी प्रशासन जाग नहीं रहा। कब तक घाट सिर्फ राजस्व का स्रोत रहेंगे और लोगों की जान खतरे में पड़ी रहेगी?

सुरक्षा पहले, राजस्व बाद में — यह mantra अब अपनाने का समय है। उत्तराखंड सरकार, हरिद्वार-ऋषिकेश प्रशासन और पुलिस से अपील है कि तुरंत प्रभावी कदम उठाए जाएं — स्थायी जल पुलिस, लाइफगार्ड, बैरिकेडिंग, जागरूकता और सख्त निगरानी।

गंगा मां की गोद में स्नान करने आए हर व्यक्ति को सुरक्षित लौटना चाहिए। लापरवाही जारी रही तो निर्दोष जानें बेवजह चली जाएंगी। अब सिर्फ बचाव नहीं, रोकथाम पर फोकस करने की जरूरत है।

आस्था का सम्मान तभी संभव है जब सुरक्षा सुनिश्चित हो।

By The Common Man

News and public affairs

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