
खटीमा/नई दिल्ली/बरेली, 6 मार्च 2026
उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के नानकमत्ता (खटीमा क्षेत्र) में थारू जनजाति की उभरती हुई लोकगायिका रिंकू राणा (36 वर्ष) की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। यह घटना होली के बाद गुरुवार दोपहर हुई, जब रिंकू अपनी 10 वर्षीय भतीजी आयिश्का के साथ बिचपुरी (नानकमत्ता) से स्कूटी पर घर लौट रही थीं। ईंटों से लदी एक तेज रफ्तार ट्रैक्टर-ट्रॉली ने उनकी स्कूटी को जोरदार टक्कर मार दी। हादसे में रिंकू को गंभीर चोटें आईं और अस्पताल पहुंचते ही उनकी मौत हो गई। भतीजी घायल हुईं, जिनका इलाज जारी है। ट्रैक्टर चालक मौके से फरार हो गया। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा और जांच शुरू कर दी है।
रिंकू राणा कोतवाली क्षेत्र के ग्राम पूरनगढ़ नौगजा (नोगजा) की निवासी थीं। वे पति महेश सिंह और 9 वर्षीय पुत्र निशांत सिंह के साथ रहती थीं। थारू जनजाति की प्रथम प्रमुख लोकगायिका के रूप में पहचान बनाने वाली रिंकू बंटी राणा म्यूजिकल/सांस्कृतिक दल की मुख्य कलाकार थीं। वे राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में थारू लोक संस्कृति, संगीत और परंपराओं को जीवंत रखने में सक्रिय योगदान दे रही थीं। उनकी असामयिक मौत से थारू समाज, लोक कला जगत और पूरे क्षेत्र में गहरा शोक व्याप्त है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शोक संवेदना व्यक्त करते हुए कहा, “रिंकू राणा का लोक संस्कृति और लोक संगीत के संरक्षण में योगदान हमेशा याद किया जाएगा।” खटीमा विधायक एवं विपक्ष के उपनेता भुवन कपड़ी ने इसे समाज और लोक संस्कृति के लिए बड़ी क्षति करार दिया।
यह घटना भारत में सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती त्रासदी का नवीनतम उदाहरण है, जहां युवा प्रतिभाएं और आम नागरिक अनावश्यक रूप से अपनी जान गंवा रहे हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में देशभर में 1,77,177 मौतें हुईं—यानी रोजाना औसतन 485 लोग सड़कों पर मारे गए। यह संख्या 2023 (1.73 लाख) से 2.3% अधिक है और अब तक का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। युवा वर्ग (18-45 वर्ष) सबसे ज्यादा प्रभावित है—66.5% से 70% तक मौतें और चोटें इसी आयु समूह में होती हैं। 18-35 वर्ष के युवा पुरुष विशेष रूप से जोखिम में हैं, जबकि दोपहिया वाहन चालक और पैदल यात्री सबसे अधिक शिकार बनते हैं।
ओवरस्पीडिंग (71-72% मौतों का मुख्य कारण), लापरवाही, हेलमेट/सीटबेल्ट न पहनना, मोबाइल फोन का उपयोग, शराब पीकर ड्राइविंग, खराब सड़कें, पॉटहोल और ट्रैफिक नियमों की अनदेखी जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। हाल के वर्षों में कई युवा कलाकार, छात्र और सेलिब्रिटी भी ऐसे हादसों का शिकार बने हैं, लेकिन जागरूकता और जवाबदेही की कमी चिंताजनक है। सरकार द्वारा हेलमेट, स्पीड लिमिट और सेफ्टी कैंपेन चलाए जाते हैं, लेकिन सख्त प्रवर्तन, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और कानूनी सजा में ढिलाई के कारण मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत सड़क मौतों में विश्व स्तर पर शीर्ष पर है, और युवाओं में यह मौत का प्रमुख कारण बना हुआ है।
यह समय है कि समाज, सरकार और सिस्टम गंभीरता से सोचे। हर हादसा सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि एक परिवार की तबाही, सांस्कृतिक नुकसान और युवा ऊर्जा का अपव्यय है। जरूरी बदलावों में शामिल हैं:
- स्कूल-कॉलेज स्तर पर सड़क सुरक्षा शिक्षा को अनिवार्य बनाना।
- ट्रैफिक पुलिस में बढ़ोतरी, CCTV/AI मॉनिटरिंग और सख्त चालान/सजा।
- सड़कों का बेहतर रखरखाव, फुटपाथ, स्पीड ब्रेकर और स्ट्रीट लाइट्स।
- हिट एंड रन मामलों में तुरंत कार्रवाई और दोषियों पर कड़ी सजा।
- समाज की भूमिका: माता-पिता बच्चों को नियम सिखाएं, हेलमेट/सीटबेल्ट अनिवार्य करें।
यदि अब जवाबदेही तय नहीं की गई, तो युवा पीढ़ी का नुकसान जारी रहेगा, और समाज मानसिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से निरंतर अवसाद में डूबता जाएगा। रिंकू राणा जैसी प्रतिभाओं की मौत हमें जगाने के लिए काफी है—सड़क सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।
रिंकू राणा की आत्मा को शांति मिले, परिवार को इस दुख से उबरने की ताकत मिले, और थारू लोक संस्कृति को नई ऊर्जा मिले।