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दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: चेक पर हस्ताक्षर न करने वाले गैर-ड्रॉअर व्यक्ति पर धारा 138 NI एक्ट के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता – समन आदेश रद्द

नई दिल्ली, 31 मार्च 2026 – चेक बाउंस मामलों में एक बड़ा राहत भरा फैसला देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI एक्ट) की धारा 138 के तहत आपराधिक जिम्मेदारी केवल चेक के वास्तविक ड्रॉअर (जारीकर्ता) तक सीमित है। चेक पर हस्ताक्षर न करने वाले व्यक्ति को, भले ही संयुक्त देनदारी हो, आरोपी नहीं बनाया जा सकता और उसके खिलाफ समन जारी नहीं किया जा सकता।

जस्टिस सौरभ बनर्जी की एकलपीठ ने सुधा देवी बनाम अनिल कुमार मामले में याचिका स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा जारी समन आदेश और पूरी आपराधिक शिकायत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि “आपराधिक जिम्मेदारी पूरी तरह से चेक के ‘ड्रॉअर’ तक सीमित है, जो याचिकाकर्ता नहीं हैं।”

मामले के तथ्य

अगस्त 2020 से अप्रैल 2021 के बीच शिकायतकर्ता अनिल कुमार ने सुधा देवी और उनके बेटे तरुण कुमार को वित्तीय कठिनाई के कारण घर बेचने के लिए 10 लाख रुपये किश्तों में दिए। बाद में सुधा देवी ने संपत्ति बेचने से इनकार कर दिया। राशि वापस करने के लिए तरुण कुमार ने 1 सितंबर 2021 को अपने बैंक खाते से 10 लाख रुपये का चेक जारी किया। चेक “अपर्याप्त धन” के कारण डिशोनर हो गया। कानूनी नोटिस के बावजूद भुगतान न होने पर अनिल कुमार ने निचली अदालत में धारा 138 NI एक्ट के तहत शिकायत दर्ज की।

15 दिसंबर 2021 को निचली अदालत ने सुधा देवी और तरुण कुमार दोनों को समन जारी कर दिया। सुधा देवी ने दिल्ली हाईकोर्ट में CrPC की धारा 482 के तहत याचिका दायर कर समन रद्द करने की मांग की।

कोर्ट का तर्क और फैसला

हाईकोर्ट ने धारा 138 NI एक्ट की तीन अनिवार्य शर्तों पर जोर दिया:

  1. चेक किसी व्यक्ति द्वारा अपने बैंक खाते से जारी किया गया हो।
  2. चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाली देनदारी के बदले जारी किया गया हो।
  3. चेक बैंक द्वारा अपर्याप्त धन या अन्य कारणों से बिना भुगतान के वापस कर दिया गया हो।

कोर्ट ने पाया कि चेक तरुण कुमार द्वारा उनके नाम के बैंक खाते से जारी किया गया था। सुधा देवी न तो चेक की हस्ताक्षरकर्ता थीं और न ही खाता उनके नाम पर (अकेले या संयुक्त) था।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने स्पष्ट रूप से कहा:
“तथ्यों से पता चलता है कि स्वीकार्य रूप से, न तो विवादित चेक याचिकाकर्ता द्वारा जारी किया गया है और न ही यह उनके द्वारा संचालित किसी बैंक खाते से जारी हुआ है। आपराधिक जिम्मेदारी पूरी तरह से चेक के ‘ड्रॉअर’ तक सीमित है, जो याचिकाकर्ता नहीं हैं।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अलका खंडू अव्हाड बनाम अमर श्यामप्रसाद मिश्रा मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि NI एक्ट की धारा 138 संयुक्त देनदारी की बात नहीं करती। व्यक्तिगत मामलों में भी, संयुक्त देनदारी होने पर भी, चेक जारी न करने वाले व्यक्ति पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

निचली अदालत द्वारा “यांत्रिक तरीके” से समन जारी करने की आलोचना करते हुए कोर्ट ने कहा कि समन जारी करने से पहले तथ्यों की गहन जांच जरूरी है। अंत में, सुधा देवी के खिलाफ शिकायत और समन आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया गया।

धारा 138 NI एक्ट के तहत महत्वपूर्ण नियम

धारा 138 NI एक्ट चेक बाउंस को आपराधिक अपराध मानती है, लेकिन इसमें सख्त शर्तें हैं:

  • ड्रॉअर कौन? केवल वह व्यक्ति जिसने चेक पर हस्ताक्षर किए हों और जिसके नाम का बैंक खाता हो (अकेले या संयुक्त रूप से)।
  • कानूनी देनदारी: चेक किसी लागू ऋण या देनदारी के बदले ही जारी होना चाहिए।
  • डिशोनर का कारण: अपर्याप्त धन या चेक अमाउंट से अधिक व्यवस्था होने पर।
  • प्रक्रिया: डिशोनर के 30 दिनों के अंदर कानूनी नोटिस भेजना, नोटिस मिलने के 15 दिनों के अंदर भुगतान न होने पर 1 महीने के अंदर शिकायत दर्ज करना।
  • सजा: 2 वर्ष तक की कैद, चेक अमाउंट का दोगुना जुर्माना, या दोनों।

कंपनी मामलों में धारा 141: कंपनी के मामले में डायरेक्टर या अधिकारी पर vicarious liability (साझा जिम्मेदारी) लग सकती है, लेकिन शिकायत में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख करना जरूरी है कि आरोपी कंपनी के दैनिक कार्यों का प्रबंधन और जिम्मेदार था। गैर-साइनेटरी या इंडिपेंडेंट डायरेक्टर पर बिना सबूत के मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

शिकायतकर्ताओं के लिए सावधानियां और बातें जानना जरूरी

  1. चेक की जांच करें: शिकायत दर्ज करने से पहले चेक पर हस्ताक्षरकर्ता और खाता धारक की पहचान सत्यापित करें। गैर-हस्ताक्षरकर्ता को आरोपी न बनाएं।
  2. स्पष्ट औसत दें: कंपनी के मामलों में शिकायत में स्पष्ट लिखें कि आरोपी कंपनी के दैनिक कार्यों में शामिल था।
  3. समय सीमा का पालन: नोटिस और शिकायत की समय सीमा का सख्ती से पालन करें।
  4. दस्तावेज रखें: चेक, बैंक रिटर्न मेमो, नोटिस, डाक रसीद आदि सुरक्षित रखें।
  5. निचली अदालत में सतर्कता: समन आदेश यांत्रिक न हो, अदालत को तथ्यों पर विचार करना चाहिए।

आरोपी/याचिकाकर्ताओं के लिए सावधानियां

  1. समन मिलने पर तुरंत कार्रवाई: अगर आप चेक पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं या खाता आपके नाम पर नहीं है, तो तुरंत हाईकोर्ट में CrPC धारा 482 के तहत याचिका दायर करें।
  2. सबूत जुटाएं: चेक की कॉपी, बैंक स्टेटमेंट, हस्ताक्षर न होने का प्रमाण आदि रखें।
  3. संयुक्त देनदारी का भ्रम न रखें: भले ही ऋण संयुक्त हो, चेक न जारी करने वाले पर धारा 138 लागू नहीं होती।
  4. कंपनी के मामले में: अगर कंपनी ड्रॉअर है, तो कंपनी को भी आरोपी बनाना जरूरी है। केवल साइनेटरी डायरेक्टर पर मुकदमा पर्याप्त नहीं हो सकता।

इस फैसले के व्यापक निहितार्थ

यह फैसला चेक बाउंस मामलों में अनावश्यक मुकदमेबाजी को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट्स ने स्पष्ट किया है कि धारा 138 की जिम्मेदारी व्यक्तिगत और सख्त है। निचली अदालतों को अब समन जारी करते समय ज्यादा सतर्क रहना होगा, वरना उनके आदेश हाईकोर्ट में रद्द हो सकते हैं।

यह निर्णय उन परिवारों या साझेदारों के लिए राहत है जहां एक सदस्य चेक जारी करता है और दूसरे को बिना वजह आरोपी बना दिया जाता है। साथ ही, शिकायतकर्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे सही व्यक्ति के खिलाफ ही शिकायत दर्ज करें, ताकि मुकदमा लंबा न खिंचे और न्याय की प्रक्रिया प्रभावित न हो।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि कानून की नजर में चेक बाउंस की जिम्मेदारी केवल चेक जारी करने वाले ड्रॉअर पर है। गैर-हस्ताक्षरकर्ता व्यक्ति को बिना आधार के फंसाना गलत है। नागरिकों को सलाह है कि वित्तीय लेन-देन में चेक जारी करते समय सावधानी बरतें और कानूनी प्रक्रिया का सही ढंग से पालन करें।

यह फैसला NI एक्ट के तहत लंबे समय से चली आ रही अस्पष्टताओं को दूर करने में मददगार साबित होगा और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष और कुशल बनाएगा।

By The Common Man

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