देवभूमि के लोग डेस्क, नई दिल्ली | 24 नवंबर 2025
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में आज एक ऐतिहासिक दिन जुड़ गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा शपथ दिलाए जाने के बाद, जस्टिस सूर्यकांत ने 24 नवंबर 2025 को भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के रूप में अपनी जिम्मेदारी संभाल ली। हरियाणा के एक साधारण गांव से निकलकर सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुंचने वाली यह यात्रा न केवल मेहनत और दृढ़ संकल्प की मिसाल है, बल्कि यह दर्शाती है कि शिक्षा और न्याय के प्रति समर्पण किसी भी बाधा को पार कर सकता है। जस्टिस सूर्यकांत का कार्यकाल 9 फरवरी 2027 तक चलेगा, और वे हरियाणा से आने वाले पहले सीजेआई हैं। आइए, जानते हैं उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि, माता-पिता की परवरिश, शिक्षा और जीवन यात्रा के बारे में।
एक साधारण शिक्षक परिवार की विरासत
जस्टिस सूर्यकांत का जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार जिले के पेतवार गांव में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनका परिवार शिक्षकों का था, जहां कानून की कोई परंपरा नहीं थी। पिता मदन गोपाल शर्मा एक संस्कृत शिक्षक थे, जो गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे। मां शशी देवी गृहिणी थीं। जस्टिस सूर्यकांत सबसे छोटे बेटे हैं—उनके चार भाई और एक बहन हैं। भाई ऋषि कांत एक सेवानिवृत्त सरकारी स्कूल शिक्षक हैं। परिवार की यह पृष्ठभूमि सादगी और शिक्षा के महत्व पर आधारित थी। गांव वालों के अनुसार, सूर्यकांत बचपन से ही ‘सूर्या’ के नाम से जाने जाते थे, और वे हमेशा न्याय और सत्य के प्रति समर्पित रहे। कोई विधिक विरासत न होने के बावजूद, उन्होंने परिवार की शिक्षण परंपरा को तोड़कर कानून का रास्ता चुना, जो आज भारत के लिए गौरव का विषय है।
माता-पिता की प्रेरणा: अनुशासन और शिक्षा का पाठ
जस्टिस सूर्यकांत के माता-पिता ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा और अनुशासन का महत्व सिखाया। पिता मदन गोपाल शर्मा अक्सर कहते थे कि “अनुशासन और सीखना फल देता है, भले ही सफलता दूर लगे।” गांव के सरकारी स्कूल में बिना फर्नीचर के कक्षाओं में पढ़ाई करने वाले सूर्यकांत ने माता-पिता की मेहनत से प्रेरणा ली। मां शशी देवी ने घर की जिम्मेदारियां संभालते हुए बच्चों को नैतिक मूल्यों की सीख दी। परिवार के स्रोतों के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत आज भी अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं—वे पेतवार गांव में समय-समय पर जाते हैं और भाई-बहनों के साथ पारिवारिक त्योहार मनाते हैं। यह परवरिश ही है जिसने उन्हें एक ऐसे न्यायाधीश बनाया, जो मानवाधिकार, लिंग न्याय और जेल सुधार जैसे मुद्दों पर संवेदनशील फैसले सुनाते हैं।
शिक्षा: गांव की मिट्टी से निकलकर विधिक विद्वता तक
जस्टिस सूर्यकांत की शिक्षा यात्रा संघर्षपूर्ण लेकिन प्रेरणादायक रही। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पेतवार गांव के सरकारी स्कूल से प्राप्त की, जहां मैट्रिक तक की पढ़ाई बिना बेंच-कुर्सी के हुई। 1981 में हिसार के गवर्नमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज से स्नातक (बीए) की डिग्री हासिल की। इसके बाद 1984 में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से विधि स्नातक (एलएलबी) पूरा किया। दिलचस्प बात यह है कि जज बनने के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी—2011 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के डायरेक्टोरेट ऑफ डिस्टेंस एजुकेशन से विधि स्नातकोत्तर (एलएलएम) में प्रथम श्रेणी प्रथम स्थान प्राप्त किया। यह उपलब्धि दर्शाती है कि शिक्षा उनके लिए आजीवन प्रक्रिया रही। जस्टिस सूर्यकांत ने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लिया, जो उनकी विधिक विद्वता को और मजबूत बनाती है।
जीवन यात्रा: जिला अदालत से सुप्रीम कोर्ट की कुर्सी तक
जस्टिस सूर्यकांत का विधिक सफर 1984 में हिसार जिला अदालत से शुरू हुआ, जहां उन्होंने वकालत की शुरुआत की। एक वर्ष बाद 1985 में चंडीगढ़ जाकर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। सेवा मामलों के विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हो गए। मात्र 38 वर्ष की आयु में 2000 में हरियाणा के सबसे युवा एडवोकेट जनरल बने। 2004 में, 42 वर्ष की आयु में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के जज नियुक्त हुए—यह एक रिकॉर्ड था। 14 वर्षों की सेवा के बाद, 5 अक्टूबर 2018 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली। सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने मानवाधिकार, शिक्षा, जेल सुधार और अनुच्छेद 370, पेगासस जासूसी तथा राजद्रोह कानून निलंबन जैसे महत्वपूर्ण मामलों में फैसले सुनाए। जस्टिस सूर्यकांत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के कार्यकारी अध्यक्ष और रांची के नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ के विजिटर भी हैं। उनकी शांत स्वभाव और संतुलित फैसलों ने उन्हें न्यायिक जगत में विशिष्ट स्थान दिलाया।
प्रमुख निर्णय: न्यायिक योगदान की अमिट छाप
जस्टिस सूर्यकांत के न्यायिक सफर में कई ऐसे फैसले हैं, जिन्होंने भारतीय कानून व्यवस्था को नई दिशा दी। सुप्रीम कोर्ट में 80 से अधिक निर्णय लिखने और 1000 से ज्यादा बेंचों का हिस्सा बनने के बाद, वे संवैधानिक मुद्दों पर अपनी स्पष्ट दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। उनके कुछ प्रमुख निर्णय इस प्रकार हैं:
- अनुच्छेद 370 का निरसन (Abrogation of Article 370): जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने वाले ऐतिहासिक फैसले में जस्टिस सूर्यकांत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने संघीय ढांचे को मजबूत किया।
- पेगासस जासूसी मामला (Pegasus Spyware Case): 2021 में, उन्होंने साइबर विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का आदेश दिया, जिसमें कहा गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राज्य को “फ्री पास” नहीं दिया जा सकता। यह फैसला निजता के अधिकार को मजबूत करने वाला साबित हुआ।
- राजद्रोह कानून का निलंबन (Sedition Law Suspension): 2022 में, उन्होंने देशभर के लंबित राजद्रोह मामलों को रोकने का आदेश दिया, ताकि सरकार धारा 124A का पुनर्विचार कर सके। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक दर्जा (AMU Minority Status): 2024 में सात जजों की बेंच में हिस्सा लेते हुए, उन्होंने 1967 के फैसले की समीक्षा का मार्ग प्रशस्त किया, जिसमें एमयू को अल्पसंख्यक संस्थान मानने पर बहस हुई।
- वन रैंक वन पेंशन (One Rank One Pension – OROP): ओआरओपी योजना को संवैधानिक मान्यता देते हुए, उन्होंने सेना के पूर्व सैनिकों के लिए समान अवसरों का समर्थन किया और महिलाओं को स्थायी कमीशन के लिए समर्थन दिया।
- लिंग न्याय और महिला आरक्षण (Gender Justice): उन्होंने छत्तीसगढ़ की एक महिला सरपंच को गलत तरीके से हटाए जाने पर बहाल किया और लिंग पूर्वाग्रह की निंदा की। साथ ही, बार एसोसिएशनों (सुप्रीम कोर्ट बार सहित) में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का निर्देश दिया, जो विधिक क्षेत्र में लैंगिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम था।
- चुनावी सुधार (Electoral Reforms): बिहार में 65 लाख वोटरों को ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए जाने पर चुनाव आयोग को विवरण सार्वजनिक करने का आदेश दिया। हरियाणा पंचायत चुनाव में ईवीएम रीकाउंट का पहला आदेश देकर परिणाम उलट दिया।
- अरविंद केजरीवाल को जमानत (Arvind Kejriwal Bail): दिल्ली शराब नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री को जमानत देते हुए, उन्होंने अलग-अलग निर्णय लिखे, लेकिन दोनों ने जमानत को उचित ठहराया।
- जेल सुधार (Jail Reforms): पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में जसवीर सिंह मामले में, उन्होंने कैदियों के लिए दांपत्य और पारिवारिक मुलाकातों की योजना बनाने के लिए जेल सुधार समिति गठित की, जो सुधारात्मक न्याय पर जोर देती है।
ये निर्णय न केवल कानूनी सिद्धांतों को मजबूत करते हैं, बल्कि सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और समानता को बढ़ावा देते हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने भ्रष्टाचार, पर्यावरण और लोकतंत्र जैसे मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
जस्टिस सूर्यकांत की यह यात्रा हर युवा के लिए प्रेरणा है—एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने बिना किसी विधिक पृष्ठभूमि के कड़ी मेहनत से देश की न्याय व्यवस्था का नेतृत्व संभाला।
