
**कोच्चि/नई दिल्ली, 6 मार्च 2026** सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने न्यायिक स्वतंत्रता पर जोर देते हुए कहा है कि न्यायाधीशों को सही और संवैधानिक फैसला देने में कभी नहीं झिझकना चाहिए, भले ही इससे उनकी पदोन्नति (elevation), कार्यकाल विस्तार प्रभावित हो या सत्ता में बैठे लोगों को नाराज करना पड़ जाए। उन्होंने इसे न्यायाधीशों के “न्यायिक धर्म” (judicial dharma) का हिस्सा बताया और कहा कि करियर की चिंता से फैसले प्रभावित होने पर न्यायिक समीक्षा (judicial review) केवल प्रतीकात्मक रह जाती है।यह महत्वपूर्ण बयान उन्होंने **केरल हाई कोर्ट** में **दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर स्मृति व्याख्यान** (2nd T.S. Krishnamoorthy Iyer Memorial Lecture) के दौरान दिया। व्याख्यान का विषय **”ट्रांसफॉर्मेटिव कांस्टीट्यूशनलिज्म एंड द बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन”** (Transformative Constitutionalism and the Basic Structure Doctrine) था। यह कार्यक्रम 2 मार्च 2026 को आयोजित हुआ था।जस्टिस नागरत्ना ने मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर प्रकाश डाला:1. **न्यायिक स्वतंत्रता के दो आयाम** – **बाहरी स्वतंत्रता** (External Independence): न्यायाधीश को राजनीतिक दबाव (political pressure), संस्थागत धमकी (institutional intimidation) या जनता की मांग (popular demand) से पूरी तरह मुक्त रहना चाहिए। उन्होंने कहा, **”A judge must be free from political pressure, institutional intimidation, or popular demand.”**2. **आंतरिक स्वतंत्रता** (Internal Independence): न्यायिक स्वतंत्रता केवल राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति तक सीमित नहीं है। प्रत्येक न्यायाधीश को अपने विचार बनाने, व्यक्त करने और सहकर्मियों से भिन्न राय रखने की आजादी होनी चाहिए। अलग राय (dissenting opinions) या अलग निर्णय (separate opinions) बौद्धिक स्वतंत्रता का सबसे उज्ज्वल रूप हैं। उन्होंने जोर दिया कि **”A judicial opinion is not a negotiation document; it is an articulation of constitutional conviction.”** सहमति के लिए राय को कमजोर करना संवैधानिक कर्तव्य के साथ समझौता है।3. **पदोन्नति और करियर की चिंता** न्यायाधीशों को यह पता होना चाहिए कि अलोकप्रिय फैसले उनकी पदोन्नति, विस्तार या सत्ता के “बैड बुक्स” में डाल सकते हैं, लेकिन इससे फैसले प्रभावित नहीं होने चाहिए। प्रमुख उद्धरण: **”Even if judges know that unpopular decisions may cost them elevation, extension, or bring them in the bad books of the powers that be. That should not come in the way of their decisions. Ultimately, it is the conviction, courage and independence of each judge which really matters. We, as Judges, should always follow our oath of office which is our judicial Dharma and live up to it irrespective of its consequences on our career. Otherwise judicial review becomes symbolic.”**4. **न्यायिक समीक्षा की भूमिका** न्यायपालिका का कर्तव्य है कि वह असंवैधानिक कानूनों को रद्द करे, कार्यपालिका की गैरकानूनी कार्रवाइयों पर रोक लगाए और कभी-कभी संवैधानिक संशोधनों को भी चुनौती दे। बिना साहस के यह समीक्षा कमजोर या चुनिंदा हो जाती है। न्यायाधीश संविधान की रक्षा करते हुए अल्पसंख्यकों और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, न कि बहुमत की लोकप्रियता के आधार पर।5. **ऐतिहासिक उदाहरण** जस्टिस नागरत्ना ने इमरजेंसी के दौरान जस्टिस एच.आर. खन्ना के प्रसिद्ध असहमति वाले फैसले (ADM जabalpur मामले में) का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने मौलिक अधिकारों की रक्षा की थी। इस कारण उनकी सीजेआई की पदोन्नति रुक गई, लेकिन बाद में पुत्तास्वामी मामले में उनकी राय को सही ठहराया गया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक निष्ठा राजनीतिक सुविधा से ज्यादा लंबे समय तक टिकती है।जस्टिस नागरत्ना ने बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत (Kesavananda Bharati मामले से विकसित) और ट्रांसफॉर्मेटिव कांस्टीट्यूशनलिज्म पर भी विस्तार से चर्चा की, जिसमें संविधान को ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करने और सामाजिक संबंधों को पुनर्निर्माण करने का माध्यम बताया।यह बयान ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका पर स्वतंत्रता और राजनीतिक प्रभाव के आरोप अक्सर लगते रहते हैं। सोशल मीडिया पर इसकी व्यापक सराहना हुई है, जहां कई यूजर्स ने इसे न्यायिक साहस का प्रेरणादायक संदेश बताया। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, यह व्याख्यान न्यायाधीशों के लिए एक मजबूत संदेश है कि संवैधानिक कर्तव्य व्यक्तिगत लाभ से ऊपर है।