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बढ़ती भड़काऊ हिंसा, हुड़दंग, साइबर अपराधों की बाढ़ और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां: पुलिस, इंटेलीजेंस, विजिलेंस एवं एसटीएफ का पुराना ढर्रा देशभर में अपराधियों को मजबूत बना रहा – उत्तराखंड में भी साइबर फ्रॉड का भारी उछाल

उत्तराखंड में police

नई दिल्ली/देहरादून, 31 मार्च 2026, By- B.P Singh – देश में सड़कों पर भड़काऊ हिंसा, सामुदायिक हुड़दंग, डिजिटल फ्रॉड, डीपफेक वीडियो से फैलने वाली अफवाहें, क्रिप्टो-बेस्ड मनी लॉन्ड्रिंग और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे स्कैम्स के मामलों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स (MHA) और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में साइबर अपराधों की संख्या लगभग 25 लाख तक पहुंच गई, जिसमें फाइनेंशियल फ्रॉड सबसे प्रमुख रहा। इन अपराधों से देश को लगभग 20,000 से 36,000 करोड़ रुपये तक का आर्थिक नुकसान हुआ। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ उत्तराखंड भी इस बढ़ते खतरे से अछूता नहीं है।

लेकिन इस बढ़ते अपराध के बीच पुलिस, इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB), विजिलेंस विभाग और स्पेशल टास्क फोर्स (STF) अभी भी 1861 के ब्रिटिश कालीन इंडियन पुलिस एक्ट के पुराने ढांचे पर टके हुए हैं। आधुनिक यंत्रों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा एनालिटिक्स, डार्क वेब मॉनिटरिंग और एडवांस्ड साइबर फॉरेंसिक्स की भारी कमी है। ज्यादातर उच्च अधिकारी नॉन-टेक्निकल बैकग्राउंड (आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज या जनरल स्टडीज) से हैं, जिन्हें एआई-जनरेटेड डीपफेक, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स, ब्लॉकचेन ट्रांजेक्शन या ड्रोन सर्वेलेंस की गहरी समझ नहीं है। वहीं, आज के अपराधी – जो अक्सर इंटर-स्टेट या अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से ऑपरेट करते हैं – इन हाई-टेक टूल्स में माहिर हो चुके हैं। नतीजा: कानून-व्यवस्था की व्यवस्थित विफलता, कम चार्जशीटिंग दर और आम नागरिकों में बढ़ती असुरक्षा।

पूर्ण पृष्ठभूमि: 1861 का पुराना कानून और आधुनिक चुनौतियां

भारतीय पुलिस व्यवस्था की नींव 1861 के इंडियन पुलिस एक्ट पर टिकी हुई है, जो औपनिवेशिक शासन के समय बनाया गया था। स्वतंत्रता के बाद भी इसमें व्यापक सुधार नहीं हुआ। 2000 के बाद साइबर अपराध बढ़ने लगे, लेकिन पुलिस का ढांचा वही पुराना रहा। ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BPR&D) और मॉडर्नाइजेशन ऑफ पुलिस फोर्सेज (MPF) स्कीम के बावजूद ट्रेनिंग, स्किल डेवलपमेंट और इन-हाउस R&D में गंभीर कमी बनी हुई है। इंटेलीजेंस यूनिट्स में लोकल असेसमेंट में देरी और राजनीतिक हस्तक्षेप आम समस्या है।

उत्तराखंड में अपराध वृद्धि: साइबर फ्रॉड का भयानक उछाल

उत्तराखंड में भी साइबर अपराधों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, जो राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। उत्तराखंड पुलिस और नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के आंकड़ों के अनुसार, 2021 से 2025 तक राज्य में लगभग 99,000 साइबरक्राइम शिकायतें दर्ज हुईं, जिसमें कुल ₹475 करोड़ (कुछ रिपोर्ट्स में ₹468 करोड़) से अधिक की राशि अपराधियों द्वारा लूट ली गई।

  • 2021 में: 4,400 शिकायतें, ₹15 करोड़ का नुकसान
  • 2022 में: 11,000 शिकायतें
  • 2023 में: 18,000 शिकायतें
  • 2024 में: 34,000 शिकायतें, ₹170 करोड़ का नुकसान (2023 से 146% की भारी बढ़ोतरी)
  • 2025 में: 32,000+ शिकायतें, ₹180 करोड़ का नुकसान

2026 के शुरुआती दो महीनों (जनवरी-फरवरी) में ही बागेश्वर जिले में अकेले 60 साइबर फ्रॉड केस दर्ज हुए, जिसमें ₹12.55 लाख से अधिक की राशि लूटी गई। पुलिस ने कुछ खातों को फ्रीज किया, लेकिन रिकवरी दर बेहद कम रही – केवल कुछ लाख रुपये ही पीड़ितों को लौटाए जा सके। ‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम, फर्जी निवेश घोटाले, फोन हैकिंग और सोशल मीडिया लिंक्स से पैसे हड़पने वाले गैंग सक्रिय हैं। STF और साइबर सेल ने कुछ सफलताएं हासिल कीं (जैसे ₹3.37 करोड़ के गैंग का भंडाफोड़), लेकिन कुल रिकवरी मात्र ₹70 करोड़ के आसपास रही।

देहरादून जैसे शहरी क्षेत्रों में सड़क अपराध (रोड रेज, हत्या) और हुड़दंग भी बढ़े हैं, जिसके चलते फरवरी 2026 में पुलिस अधिकारियों का बड़ा तबादला हुआ। कुछ इलाकों में इंटेलीजेंस फेलियर और पुरानी जांच पद्धतियों के कारण अपराधी निडर हो गए हैं। हालांकि राज्य ने ICJS 2.0 (इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) में देश में पहला स्थान हासिल किया है, लेकिन ग्राउंड लेवल पर साइबर सेल की क्षमता, स्टाफ और आधुनिक टूल्स अभी भी अपर्याप्त हैं।

गैर-तकनीकी अधिकारी और हाई-टेक अपराध: सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी

उच्च पदों पर बैठे ज्यादातर अधिकारी नॉन-टेक बैकग्राउंड से आते हैं। वे AI टूल्स, डार्क वेब या ब्लॉकचेन को समझ नहीं पाते। ट्रेनिंग पुरानी है और R&D का अभाव साफ दिखता है। उत्तराखंड में भी साइबर सेल को मजबूत करने की घोषणाएं हुईं, लेकिन चेंज रेजिस्टेंस और ट्रेनिंग की कमी बनी हुई है। अपराधी एआई और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर पीड़ितों को डराते हैं, जबकि पुलिस अभी भी पारंपरिक तरीकों पर निर्भर है।

कानून-व्यवस्था की विफलता के दूरगामी प्रभाव

इस पुराने तंत्र के कारण अपराधी निडर हो गए हैं। उत्तराखंड में साइबर फ्रॉड से आम नागरिकों, बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है। आर्थिक क्षति के अलावा सामाजिक सद्भाव और पर्यटन पर भी असर पड़ रहा है। अगर यही स्थिति रही तो भड़काऊ हिंसा और डिजिटल-सड़क मिश्रित अपराध और बढ़ेंगे।

सुझाव: तत्काल सुधार की जरूरत – आधुनिकीकरण अब मजबूरी

विशेषज्ञों और अधिकारियों के सुझाव:

  1. नई पुलिस एक्ट और SMART पोलिसिंग: 1861 के एक्ट को बदलकर आधुनिक, नागरिक-केंद्रित कानून लागू करें। टेक्नोलॉजी-सेवी पुलिसिंग को ग्राउंड पर उतारें।
  2. तकनीकी भर्ती और ट्रेनिंग: साइबर सेल, इंटेलीजेंस और STF में इंजीनियरिंग/साइबर बैकग्राउंड वाले अधिकारियों की अनिवार्य भर्ती। उत्तराखंड समेत सभी राज्यों में हर अधिकारी के लिए सालाना अनिवार्य AI और साइबर ट्रेनिंग।
  3. R&D और इंफ्रास्ट्रक्चर: हर राज्य में इन-हाउस साइबर आरएंडडी सेल और नेशनल स्तर की फॉरेंसिक लैब्स। AI-बेस्ड प्रेडिक्टिव पोलिसिंग, रियल-टाइम एनालिटिक्स और CyBots अपनाएं। उत्तराखंड में साइबर सेल को और मजबूत करें।
  4. I4C और जवाबदेही: I4C को मजबूत बनाएं, e-Zero FIR को प्रभावी करें। डिजिटल डैशबोर्ड से रीयल-टाइम मॉनिटरिंग और स्वतंत्र पुलिस कमीशन बनाएं।
  5. जन जागरूकता: स्कूल-कॉलेज में साइबर सुरक्षा शिक्षा अनिवार्य करें। 1930 हेल्पलाइन को और प्रभावी बनाएं।

उत्तराखंड सरकार और केंद्र को मिलकर इन सुधारों को प्राथमिकता देनी चाहिए। अपराधी हाई-टेक हो चुके हैं – पुलिस और इंटेलीजेंस को भी आधुनिक बनना ही होगा। आम नागरिकों की सुरक्षा और राज्य की शांति अब समय की मांग है।

By The Common Man

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