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हिमालय का कुंभ – इतिहास, पौराणिक कथा, परंपरा, विज्ञान और रोचक तथ्य

उत्तराखंड की हिमालयी घाटियों में बसी एक अनोखी धार्मिक परंपरा है नंदा देवी राजजात यात्रा (Nanda Devi Raj Jat Yatra), जिसे “हिमालय का कुंभ” भी कहा जाता है। यह यात्रा हर 12 वर्ष में एक बार आयोजित होती है और देवी नंदा (पार्वती का रूप) को समर्पित है, जिन्हें गढ़वाल-कुमाऊं क्षेत्र की कुलदेवी और हिमालय की लोकदेवी माना जाता है। पिछली यात्रा 2014 में हुई थी, और अब 2026 में यह भव्य आयोजन होने जा रहा है – जो हजारों श्रद्धालुओं, साधु-संतों और साहसिक यात्रियों के लिए एक बार का जीवन बदल देने वाला अनुभव साबित होगा।

पौराणिक पृष्ठभूमि और कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी नंदा राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी हैं। यह यात्रा देवी नंदा के मायके (गढ़वाल) से ससुराल (कैलाश पर्वत) तक की विदाई का प्रतीक है। लोककथाओं में कहा जाता है कि हर 12 वर्ष में देवी अपने मायके लौटती हैं और फिर भव्य जुलूस के साथ कैलाश की ओर प्रस्थान करती हैं। इसी विदाई की स्मृति में यह कठिन पदयात्रा होती है।

यात्रा के दौरान भारी बारिश होना देवी के आंसुओं का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि वे अपने मायके से अलग हो रही होती हैं। स्कंद पुराण जैसे ग्रंथों में भी नंदा देवी की महिमा का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि यह परंपरा 7वीं शताब्दी से चली आ रही हो सकती है, जब चमोली के कत्यूरी राजा शाली पाल ने इसे शुरू किया था। जो माँ नंदा कुल देवी के रूप में पूजते हैं,
बाद में चंद वंश और गढ़वाल नरेशों ने भी इसका संरक्षण किया।

ऐतिहासिक परंपरा और महत्व

“राजजात” का अर्थ है राजकीय यात्रा, क्योंकि प्राचीन काल में राजा इसे संरक्षित करते थे। आज यह गढ़वाल और कुमाऊं की साझा सांस्कृतिक विरासत है। 2002 से कुमाऊं की “अल्मोड़ा की नंदा” भी इसमें शामिल होती है, जिससे यात्रा और समावेशी हो गई है। यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, लोकनृत्य, जागर, ढोल-दमाऊ और लोकगीतों का जीवंत उत्सव है।

चार सींग वाला मेढ़ा (चौंसिंगा या च्योसिंगा खाडू) यात्रा की सबसे अनोखी विशेषता है। यह दुर्लभ मेढ़ा देवी का प्रतीक माना जाता है और यात्रा का नेतृत्व करता है। अंत में होमकुंड के पास इसे सजाकर मुक्त कर दिया जाता है, जिसे देवी की कैलाश-विदाई का संकेत माना जाता है। 2026 के लिए कोटी गांव में ऐसे मेढ़े का जन्म हो चुका है, जो शुभ संकेत है।

यात्रा का मार्ग और विवरण

यह यात्रा 280-290 किमी लंबी है और 19-22 दिनों में पूरी होती है। प्रमुख मार्ग:

  • आरंभ: नौटी/कुरुर या कांसुवा गांव (चमोली जिला)
  • मुख्य पड़ाव: कांसुवा → सेम → कोटी → भगोती → चंदपुर → घाट → वन → बेडनी बुग्याल → पातर नचौनी → भगवाबासा → त्रिशूली → रूपकुंड → शीला समुद्र → होमकुंड (समापन)
  • समापन: होमकुंड के पास अनुष्ठान और मेढ़े की मुक्ति।

मार्ग में दुर्गम हिमालयी दर्रे, ग्लेशियर, ऊंचे मैदान और नदियां शामिल हैं। ऊंचाई 1,200 से 5,000 मीटर तक जाती है, जहां AMS (एक्यूट माउंटेन सिकनेस) का खतरा रहता है।

यह यात्रा अत्यंत कठिन है, लेकिन श्रद्धा से लोग इसे पूरा करते हैं।

रूपकुंड का रहस्य – विज्ञान और कथा का संगम

यात्रा के दौरान रूपकुंड झील (Skeleton Lake, 5,029 मीटर) से गुजरना पड़ता है, जहां सैकड़ों प्राचीन कंकाल बिखरे हैं। लोककथा कहती है कि एक राजा और नर्तकियों के समूह ने पवित्र स्थान का अपमान किया, जिससे देवी ने ओले की बौछार से उन्हें मार डाला।

वैज्ञानिक अध्ययन (DNA, रेडियोकार्बन डेटिंग, 2019 Nature Communications):

  • कंकाल तीन अलग-अलग समूहों के हैं।
  • अधिकांश भारतीय (7वीं-10वीं शताब्दी) – संभवतः नंदा राजजात के प्राचीन यात्री, जिनकी मौत बड़े ओलों से हुई (खोपड़ी पर चोटें)।
  • कुछ पूर्वी भूमध्यसागरीय (ग्रीक/क्रेट) मूल के (17वीं-20वीं शताब्दी) – अलग घटनाओं में मौत।
  • एक दक्षिण-पूर्व एशियाई।

यह साबित करता है कि मौत कई घटनाओं में हुई, न कि एक। रूपकुंड यात्रा से जुड़ा है, लेकिन रहस्य पूरी तरह सुलझा नहीं है।

2026 यात्रा की तैयारियां और तथ्य

  • तिथि: भाद्रपद माह की नंदाष्टमी से शुरू (अगस्त अंत से सितंबर मध्य 2026, पंचांग पर निर्भर)।
  • उम्मीद: हजारों श्रद्धालु, आधुनिक सुविधाएं (मेडिकल कैंप, रेस्क्यू, डिजिटल ट्रैकिंग)।
  • तथ्य: दुनिया की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक; हजारों साल पुरानी; कुमाऊं-गढ़वाल एकता का प्रतीक।

नंदा राजजात केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की आस्था, प्रकृति-पूजन और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है। 2026 में यह फिर से गूंजेगी – जय मां नंदा देवी! यदि आप भाग लेना चाहें, तो पहले से तैयारी और रजिस्ट्रेशन जरूरी है। यह यात्रा शरीर और आत्मा दोनों को चुनौती देती है, पर लोग यात्रा को लेकर उत्साहित हैं I

By PAL

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