
आगरा, 23 मार्च 2026 — सिद्धार्थ राणा – समाज में हिजड़ा (ट्रांसजेंडर) समुदाय के प्रति व्याप्त भेदभाव और अन्याय पर एक गहन और भावुक अपील सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि “हम सब इंसान पैदा हुए हैं, पर हमने इंसान होना नहीं जाना।” यह संदेश, जो सामाजिक जागरूकता और मानवीय संवेदना की मांग करता है, विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और चर्चाओं में तेजी से फैल रहा है। लेखक ने हिजड़ा समुदाय की पीड़ा को बयां करते हुए कहा कि वे हमारे जैसे ही इंसान हैं, लेकिन समाज ने उन्हें असाधारण घोषित कर दिया है।
लेख में जोर दिया गया है कि हिजड़ा शब्द अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन हमारी मान्यताओं और परंपराओं ने इसे नकारात्मक बना दिया है। “प्रकृति ने लिंग बनाया है, अहंकार हम इंसानों की उपज है।” लेखक का कहना है कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक ताना-बाना – सभी में हिजड़ा समुदाय का बराबर अधिकार है। उन्हें मांगना पड़ रहा है अपने आश्रय के लिए, क्योंकि समाज उन्हें सताता है और असुरक्षा का भाव पैदा करता है।
समाज की दोहरी मानसिकता पर सवाल
लेख में पूछा गया है कि क्या उनका जीवन जीवन नहीं है? क्या वे साधारण इंसानों जैसे नहीं? “तुममें कौन सी विलक्षणता है जो ऐंठ में रहते हो?” लेखक ने समाज की परंपराओं पर भी सवाल उठाया कि स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के लिए बने हैं, तो तीसरा कहां से आ गया? लेकिन प्रकृति की गणितीय संरचना में यह तीसरा भी शामिल है। “तुम उसे समझ नहीं पाए और तीसरे को अपना घोषित नहीं करते।”
यह अपील ऐसे समय में आई है जब भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों पर बहस तेज है। हाल ही में लोकसभा में पेश ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पर समुदाय में रोष है। कई संगठन और कार्यकर्ता इसे “पिछड़ावादी” और “भेदभावपूर्ण” बता रहे हैं, क्योंकि यह ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सीमित कर रहा है – मुख्य रूप से हिजड़ा, किन्नर, अरावनी, जोगता जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों तक। इससे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, इंटरसेक्स और अन्य पहचान वाले लोग बाहर हो सकते हैं।
समुदाय का आरोप है कि यह विधेयक स्व-पहचान के अधिकार को कमजोर करता है और चिकित्सकीय प्रमाणीकरण को अनिवार्य बनाता है, जो 2014 के NALSA फैसले और 2019 के अधिनियम की भावना के खिलाफ है। विभिन्न शहरों जैसे रांची, जमशेदपुर और बनारस में विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं, जहां समुदाय ने विधेयक की वापसी की मांग की है।
वास्तविक चुनौतियां: भेदभाव, भीख और असुरक्षा
हिजड़ा समुदाय आज भी शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। अधिकांश को भेदभाव के कारण भीख मांगनी पड़ती है या सेक्स वर्क में धकेल दिया जाता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 80% से अधिक ट्रांसजेंडर व्यक्ति या तो भीख मांगते हैं या सेक्स वर्क में लगे हैं। परिवार से बहिष्कार, पुलिस उत्पीड़न, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार उनकी रोजमर्रा की जिंदगी है।
सरकार ने SMILE योजना के तहत गरिमा गृह (आश्रय गृह) स्थापित किए हैं, जहां भोजन, चिकित्सा और कौशल विकास की सुविधा है। 2025-26 में तीन नए गरिमा गृह मंजूर हुए हैं, लेकिन कई जगहों पर ये सुविधाएं अपर्याप्त या निष्क्रिय बताई जा रही हैं। 2019 के अधिनियम में भेदभाव निषेध है, लेकिन लागू करने में कमी है।
जागरूकता की जरूरत
लेख में अंत में कहा गया है: “तुम उठो, भीतर की जंजीरें तोड़ो। हर एक मनुष्य को अपनी तरह देखना सीखो। तब आत्मीयता पनपेगी, दूसरों के लिए कुछ कर गुजरोगे और समाज की पाखंडपूर्ण रवायतों को त्यागोगे।”
यह संदेश समाज को जागृत करने का प्रयास है। विशेषज्ञों का मानना है कि सच्ची समानता तभी आएगी जब हम “इंसान” को सबसे पहले रखें, परंपरा को बाद में। हिजड़ा समुदाय को “हिजड़ा” कहकर अलग न ठहराएं, बल्कि उन्हें अपने जैसे इंसान मानें।
समाज के प्रति यह पुकार है कि हम अपनी अहंकारपूर्ण दीवारें तोड़ें और मानवता को प्राथमिकता दें। क्योंकि “मेरे भीतर की पीड़ा दूसरे से अलग कैसे हो सकती है – वो मुझ जैसा ही तो है।”
यह लेख न केवल हिजड़ा समुदाय की पीड़ा को उजागर करता है, बल्कि पूरे समाज से आत्ममंथन की मांग करता है। क्या हम तैयार हैं बदलाव के लिए?
लेखक वर्तमान में PhD की पढ़ाई के साथ NGO एवं सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत हैं।