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गंगा की पवित्रता पर सवाल: उत्तराखंड में 90 किमी के भीतर ही क्यों खो रही शुद्धता? नमामी गंगे परियोजना की प्रगति और चुनौतियां

देहरादून/नई दिल्ली: गंगा नदी, जो हिमालय की गोद से निकलकर पूरे देश की जीवनरेखा है, अपनी शुरुआत में बेहद शुद्ध होती है। देवप्रयाग तक इसका पानी क्लास A श्रेणी का रहता है, यानी डिसइंफेक्शन के बाद पीने योग्य। लेकिन मात्र 90 किलोमीटर आगे बढ़ते ही रिशिकेश और हरिद्वार पहुंचने पर यह क्लास B हो जाता है, जो केवल स्नान के लिए उपयुक्त है। फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया में 32 गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है। पर्यावरणविदों और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, यह गिरावट मुख्य रूप से अनुपचारित सीवेज, अपर्याप्त सीवर नेटवर्क, पर्यटन-जनित कचरा और निर्माण अपशिष्ट के कारण हो रही है।

नमामी गंगे कार्यक्रम, जो 2014 में शुरू हुआ, गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का प्रमुख प्रयास है। हालिया अपडेट्स (2025-2026) के अनुसार, कुल 513 परियोजनाएं स्वीकृत हुईं, जिनमें से 344 पूरी हो चुकी हैं। 157 एसटीपी चालू हैं, जिनकी क्षमता (मिलियन लीटर प्रतिदिन) है। 2024-25 के दूसरे भाग में उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली में 7 प्रमुख सीवरेज प्रोजेक्ट्स पूरे हुए, जिससे कुल क्षमता बढ़ी। जल गुणवत्ता में सुधार दिखा है—सीपीसीबी के 2025 डेटा (जनवरी-अगस्त) के अनुसार, अधिकांश हिस्सों में पीएच और डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन स्नान मानकों के अनुरूप हैं, जबकि बीओडी स्तर कई जगहों पर कम हुआ है। 2017 से बीओडी लोड में 58% कमी आई है। जैव विविधता के लिए 50 लाख से अधिक देशी मछलियां संवर्धित की गईं। बजट अब 42,500 करोड़ तक बढ़ चुका है, जिसमें नमामी गंगे मिशन-II शामिल है।

फिर भी, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की 2025 रिपोर्ट (उत्तराखंड पर फोकस, 2018-23 अवधि) ने गंभीर कमियां उजागर की हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया। राज्य एजेंसियों की विफलता से एसटीपी में डिजाइन खामियां, खराब रखरखाव, नालों को टैप न करना और नदी किनारे कचरा डंपिंग जारी रही। केंद्र ने 2018-23 में राज्य को करीब 1,000 करोड़ दिए, लेकिन कई एसटीपी घरेलू सीवर से जुड़े नहीं हैं, क्षमता से अधिक लोड पड़ रहा है और अनुपचारित सीवेज गंगा में जा रहा है। 44 एसटीपी में से 18 को रखरखाव एजेंसी ने लेने से इनकार कर दिया। वनरोपण और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में केवल 16% लक्ष्य हासिल हुआ। रिपोर्ट में कहा गया कि देवप्रयाग से रिशिकेश-हरिद्वार तक पानी की गुणवत्ता गिरने का मुख्य कारण यही है।

अन्य शोध भी यही तस्वीर पेश करते हैं। सीपीसीबी की 2022 स्टडी (कुंभ 2021 से पहले) में हरिद्वार-रिशिकेश क्षेत्र में फीकल कोलीफॉर्म 330 से 35,000 एमपीएन/100 मिलीलीटर तक पहुंचा, जो कई जगह स्नान सीमा से बाहर था। आठ नालों से सीधा प्रदूषण दर्ज किया गया। उत्तराखंड के गंगोत्री तंत्र पर 2008 अध्ययन (Ecological Indicators) में भी ऊंचाई वाले इलाकों में फीकल बैक्टीरिया पाए गए, जो निचले क्षेत्रों में धार्मिक-मानवीय गतिविधियों से बढ़ते हैं। हाल के अध्ययनों में हर की पौड़ी घाट पर टीडीएस और अन्य इंडिकेटर्स उच्च पाए गए।विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा की ऊपरी हिस्सों में तेज बहाव और उच्च ऑक्सीजन से प्राकृतिक शुद्धिकरण होता है, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप से यह सीमा पार हो जाती है। नमामी गंगे ने इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया है, लेकिन स्रोत पर प्रदूषण रोकना, स्थानीय भागीदारी और रखरखाव अभी कमजोर हैं। CAG और अन्य रिपोर्टों से साफ है कि राज्य-केंद्र समन्वय, सख्त निगरानी और एकीकृत योजना जरूरी है। अगर उत्तराखंड जैसे स्रोत क्षेत्र में ही चुनौतियां बनी रहीं, तो पूरे बेसिन की सफाई मुश्किल होगी।गंगा सिर्फ उत्तराखंड की नहीं, पूरे देश की सांस्कृतिक और आर्थिक धरोहर है। महाकुंभ जैसे आयोजनों ने जागरूकता बढ़ाई, लेकिन वास्तविक पवित्रता लौटाने के लिए निरंतर और प्रभावी प्रयास जरूरी हैं।

By The Common Man

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