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देहरादून में महंत इंद्रेश विश्वविद्यालय की PG डॉक्टर तन्वी ने कार में कैनुला लगाकर जहर का इंजेक्शन देकर आत्महत्या की, उत्पीड़न का आरोप; प्रतिष्ठा का दबाव, भारत में शिक्षा का विषैला वातावरण चिंताजनक – कला, समुदाय और संवाद की भूमिका बढ़ाने की जरूरत

देहरादून, 26 मार्च 2026। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित महंत इंद्रेश विश्वविद्यालय (श्री गुरु राम राय इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंसेज – SGRRIM&HS) से जुड़े महंत इंद्रेश अस्पताल में एक और दिल दहला देने वाली घटना ने मेडिकल शिक्षा व्यवस्था की गंभीर समस्याओं को उजागर कर दिया है। एमएस (ऑप्थैल्मोलॉजी) की तीसरी वर्ष की छात्रा डॉ. तन्वी (25 वर्ष), हरियाणा के अंबाला की रहने वाली, ने पटेल नगर क्षेत्र में अपनी कार के अंदर कैनुला लगाकर घातक पदार्थ का इंजेक्शन देकर आत्महत्या कर ली। परिवार ने विभागाध्यक्ष (HOD) पर मानसिक उत्पीड़न, लॉगबुक में जीरो मार्क्स देने, परीक्षा फेल करने की धमकी और अतिरिक्त पैसे की मांग का गंभीर आरोप लगाया है। पटेल नगर पुलिस ने HOD के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने (abetment to suicide) का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

घटना की विस्तृत जानकारी के अनुसार, डॉ. तन्वी सितंबर 2023 से यहां पढ़ाई कर रही थीं। वे डेरा खास में किराए के मकान में अपनी मां के साथ रह रही थीं। बुधवार रात करीब 9 बजे उन्होंने पिता डॉ. ललित मोहन से फोन पर बात की और मानसिक परेशानी जताई। उन्होंने कहा कि वे कॉलेज प्रबंधन से शिकायत करने वाली हैं। रात 11:15 बजे मां को मैसेज किया – “मैं जल्द घर आ रही हूं”। इसके बाद संपर्क टूट गया। पिता अंबाला से पहुंचे और सुबह करीब 3 बजे कार के पास पहुंचकर शीशा तोड़कर दरवाजा खोला। तन्वी चालक की सीट पर बेहोश अवस्था में मिलीं। कार में इंजेक्शन, दवा की बोतलें और कैनुला बिखरे हुए थे। उन्हें श्री महंत इंद्रेश अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। फोरेंसिक रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि उन्होंने खुद नस में कैनुला डालकर जहर इंजेक्ट किया था।

परिवार की तहरीर में आरोप है कि चार महीने पहले HOD बनी डॉ. गुप्ता ने तन्वी को पुरानी HOD (जिन्हें तन्वी मां जैसी मानती थीं) से संपर्क करने से रोका। लॉगबुक में जीरो मार्क्स, परीक्षा फेल की धमकी और 90 लाख रुपये फीस के बावजूद अतिरिक्त पैसे की मांग की गई। परिवार ने कई बार HOD से मिलकर बेटी के भविष्य को प्रभावित न करने की अपील की थी। हालांकि तन्वी दो वर्ष पहले भी मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या का प्रयास कर चुकी थीं, जिसके बाद मां उनके साथ रहने लगी थीं, जिससे लगता है कि डाक्टर पर पहले से ही प्रेशर था।

माता-पिता का प्रतिष्ठा का दबाव: बच्चों पर बोझ बढ़ाता जा रहा
यह घटना केवल संस्थागत उत्पीड़न की नहीं, बल्कि माता-पिता द्वारा बच्चों पर लगाए जाने वाले प्रतिष्ठा (prestige) के दबाव को भी उजागर करती है। कई परिवार डॉक्टर, इंजीनियर या आईआईटी-आईआईएम जैसे करियर को सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते हैं। बच्चे की रुचि, मानसिक क्षमता या स्वास्थ्य की परवाह किए बिना माता-पिता उच्च अंक, प्रतिस्पर्धी परीक्षाएं और महंगे कोर्स पर जोर देते हैं। अध्ययनों के अनुसार, भारत में छात्र आत्महत्याओं का एक बड़ा कारण पैरेंटल प्रेशर है – जहां माता-पिता अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाएं बच्चों पर थोपते हैं, तुलना करते हैं और असफलता को परिवार की इज्जत से जोड़ते हैं। कोटा जैसे कोचिंग हब में हर साल दर्जनों छात्र इसी दबाव में आत्महत्या करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि “माता-पिता का दबाव ही मुख्य वजह है”। डॉ. के मामले में भी परिवार की अपेक्षाएं और महंगे मेडिकल कोर्स का बोझ मानसिक तनाव बढ़ाने वाला कारक रहा हो सकता है, जो अत्यधिक देखा गया है।

भारत में शिक्षा का विषैला और अस्वास्थ्यकर वातावरण
भारत की शिक्षा व्यवस्था, खासकर मेडिकल शिक्षा, तेजी से टॉक्सिक होती जा रही है। लंबे काम के घंटे (36-48 घंटे तक बिना आराम), सीनियर-जूनियर हायरार्की, रैगिंग, थिसिस रिजेक्शन, अकादमिक दबाव, आर्थिक बोझ और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी मुख्य समस्याएं हैं। सर्वे के अनुसार, 40% से ज्यादा मेडिकल छात्र टॉक्सिक वर्क एनवायरनमेंट की शिकायत करते हैं। 89% मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी ढांचा अपर्याप्त है।

देहरादून के विश्वविद्यालयों में पिछली आत्महत्याओं का सिलसिला*
यह पहली घटना नहीं है। मई 2024 में SGRRIM&HS के पीडियाट्रिक्स विभाग के पहले वर्ष के PG रेजिडेंट डॉ. दिवेश गर्ग ने आत्महत्या कर ली। परिवार और साथियों ने विभागीय विषैले वातावरण, अत्यधिक काम, नींद न मिलना और खाने तक का समय न होने का आरोप लगाया। उसी समय एक अन्य PG छात्रा ने भी आत्महत्या का प्रयास किया। उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल ने प्रिंसिपल और HOD को तलब किया। फरवरी 2026 में हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में 19 वर्षीय प्रथम वर्ष MBBS छात्रा अपने हॉस्टल रूम में मृत पाई गई। इन घटनाओं से साफ है कि देहरादून और उत्तराखंड के मेडिकल संस्थानों में शिक्षा का माहौल छात्रों के लिए दबावपूर्ण और अस्वास्थ्यकर बनता जा रहा है।

देहरादून-उत्तराखंड और पूरे भारत में शिक्षा वातावरण सुधारने की तत्काल जरूरत
देहरादून मेडिकल शिक्षा का हब है, लेकिन बढ़ती आत्महत्याएं व्यवस्था की खामियों को दिखा रही हैं। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने काम के घंटे सीमित करने, 24×7 काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य छुट्टी के निर्देश दिए हैं, लेकिन अमल नदारद है। पूरे भारत में छात्र आत्महत्याओं की संख्या चिंताजनक है – NCRB डेटा के अनुसार हर साल हजारों छात्र अकादमिक दबाव, असफलता और पारिवारिक अपेक्षाओं के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। शिक्षा प्रणाली अंक-केंद्रित, प्रतिस्पर्धी और रचनात्मकता से दूर हो गई है, जो बच्चों को डिप्रेशन, एंग्जायटी और PTSD की ओर धकेल रही है।

कला, समुदाय और संवाद की भूमिका बढ़ाने की जरूरत
इस विषैले वातावरण को बदलने के लिए कला (arts), समुदाय (community) और संवाद (communication) की भूमिका को बढ़ावा देना अत्यंत जरूरी है।

  • कला की भूमिका: expressive arts therapy, म्यूजिक, डांस, पेंटिंग और क्रिएटिव राइटिंग तनाव कम करती है, भावनाओं को व्यक्त करने का सुरक्षित माध्यम देती है और मानसिक स्वास्थ्य सुधारती है। अध्ययनों से पता चलता है कि कला गतिविधियां छात्रों में उपलब्धि की भावना, रिलैक्सेशन और सामाजिक जुड़ाव बढ़ाती हैं। स्कूलों और कॉलेजों में नियमित आर्ट वर्कशॉप, म्यूजिक थेरेपी और ड्रामा क्लब शुरू किए जाएं।
  • समुदाय की भूमिका: अकेलेपन को कम करने के लिए छात्र समुदायों, ग्रुप एक्टिविटीज और मेंटरशिप प्रोग्राम जरूरी हैं। समुदाय आधारित कार्यक्रम छात्रों को सहयोग का एहसास दिलाते हैं और अलगाव की भावना घटाते हैं।
  • संवाद की भूमिका: खुला संवाद – माता-पिता-बच्चे के बीच, शिक्षक-छात्र के बीच और साथियों के बीच – दबाव कम कर सकता है। परिवारों को बच्चों की रुचियों का सम्मान करना सिखाया जाए। स्कूलों में नियमित काउंसलिंग और वेलनेस सेशन संवाद को बढ़ावा देंगे।

सुधार के सुझाव

  • मेडिकल कॉलेजों में अनिवार्य मानसिक स्वास्थ्य केंद्र और 24×7 हेल्पलाइन।
  • NMC गाइडलाइंस का सख्त पालन – काम के घंटे सीमित, वीकली ऑफ।
  • माता-पिता के लिए जागरूकता कार्यक्रम – प्रतिष्ठा से ऊपर बच्चे का स्वास्थ्य।
  • पाठ्यक्रम में कला, खेल और संवाद को शामिल करना।
  • राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रबंधन संयुक्त समिति बनाकर मॉनिटरिंग करें।

डॉ. तन्वी जैसी होनहार डॉक्टरों की मौत शिक्षा तंत्र की विफलता है। परिवार के प्रति गहरी संवेदनाएं। पुलिस जांच जारी है। सच्चाई सामने आने पर दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।

किसी भी मानसिक संकट में तुरंत मदद लें:

  • टेली-मानस हेल्पलाइन: 14416 या 1800-891-4416 (24×7, मुफ्त)
  • उत्तराखंड में स्थानीय मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक या हल्द्वानी/देहरादून के काउंसलिंग सेंटर।

याद रखें – मदद मांगना ताकत है। शिक्षा का मकसद ज्ञान और विकास है, न कि दबाव और मौत। समाज को अब बदलाव की दिशा में कदम उठाने होंगे।

By The Common Man

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