
देहरादून/ऋषिकेश, 22 मार्च 2026 — AIIMS ऋषिकेश के सोशल आउटरीच सेल द्वारा किए गए एक अध्ययन ने उत्तराखंड के युवाओं की मानसिक स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। “युवा जोश” कार्यक्रम के तहत किए गए इस शोध में सामने आया है कि बड़ी संख्या में युवा एक “मौन मानसिक आपातकाल” का सामना कर रहे हैं, जिसमें भावनात्मक और मानसिक संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है।
अध्ययन में पाया गया कि शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक अपेक्षाएं, सोशल मीडिया पर तुलना, करियर की अनिश्चितता और व्यक्तिगत संबंधों का तनाव युवाओं पर भारी दबाव बना रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह संकट खुलकर दिखाई नहीं देता, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ता है और कई मामलों में आत्म-हानि या आत्महत्या जैसे गंभीर परिणामों में सामने आता है।
AIIMS के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि 7,000 से अधिक छात्रों के साथ बातचीत में यह सामने आया कि अधिकांश युवा लगातार तनाव, चिंता और अवसाद से जूझ रहे हैं। “आज सफलता को केवल अंकों और उपलब्धियों से मापा जा रहा है, जबकि मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज किया जा रहा है,” उन्होंने कहा।
अध्ययन के प्रारंभिक निष्कर्षों के अनुसार, विश्वविद्यालय और कॉलेज छात्रों में अवसाद की दर लगभग 25 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। ऋषिकेश में 418 युवाओं पर किए गए सर्वेक्षण में 31.8 प्रतिशत प्रतिभागियों ने आत्म-हानि के विचारों को स्वीकार किया, जो बेहद चिंताजनक संकेत है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति गंभीर है। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के अनुसार, लगभग 60 प्रतिशत मानसिक स्वास्थ्य विकार 35 वर्ष से कम उम्र के लोगों में पाए जा रहे हैं। वहीं, जागरूकता की कमी और सामाजिक कलंक के कारण अधिकांश युवा मदद लेने से बचते हैं।
उत्तराखंड में यह संकट और गहरा हो जाता है, क्योंकि यहां सीमित रोजगार अवसर, उच्च प्रवासन दर और पारिवारिक दबाव युवाओं पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाले छात्र जब बड़े शहरों के प्रतिस्पर्धी माहौल में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
अध्ययन ने सोशल मीडिया को भी एक बड़ा कारण बताया है। लगातार तुलना और “परफेक्ट लाइफ” की छवियों के कारण युवाओं में हीन भावना और असुरक्षा बढ़ रही है। इसके साथ ही, NEET, JEE और UPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।
हालांकि, अध्ययन में कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। लगभग 50 प्रतिशत युवाओं ने नियमित व्यायाम और 41.6 प्रतिशत ने आध्यात्मिक गतिविधियों से राहत मिलने की बात कही, जो संभावित समाधान का आधार बन सकते हैं।
AIIMS ऋषिकेश 25 मार्च 2026 को एक राष्ट्रीय युवा सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों और समाधान पर चर्चा होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को शामिल करना, काउंसलिंग सेवाओं को बढ़ाना और समाज में खुली बातचीत को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इस “मौन आपातकाल” को नहीं पहचाना गया, तो इसका प्रभाव न केवल व्यक्तिगत जीवन बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब सफलता की परिभाषा को बदलकर मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए।
यह अध्ययन एक स्पष्ट संदेश देता है — युवाओं की मानसिक स्थिति को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है। कार्रवाई का समय अभी है।