देवभूमि के लोग- भानु प्रताप सिंह| विशेष रिपोर्ट
उपशीर्षक: अल्मोड़ा के अस्पताल में रोजाना मनोचिकित्सा परामर्श के लिए पहुंच रहे 50 से अधिक लोग, इनमें करीब 15 युवा। बच्चों में ऑटिज्म, ADHD, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं की पहचान जरूरी। सरकारी सुविधाओं की जानकारी का अभाव, सामाजिक कलंक और जागरूकता की कमी सबसे बड़ी चुनौती।
उत्तराखंड। देवभूमि उत्तराखंड में बच्चों और युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर सार्वजनिक चिंता के रूप में सामने आ रहा है। पहाड़ों में शिक्षा, रोजगार, भविष्य की अनिश्चितता, नशे की बढ़ती चिंता, सोशल मीडिया का दबाव और परिवारों में संवाद की कमी के बीच मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। चिंताजनक बात यह है कि जिन बच्चों और किशोरों को समय पर पहचान, परामर्श और उपचार की जरूरत है, उनके परिवारों के एक बड़े हिस्से को उपलब्ध सरकारी सहायता के बारे में जानकारी तक नहीं है।
इस सप्ताह सामने आई दो अलग-अलग रिपोर्टें इस समस्या की गंभीरता की ओर ध्यान खींचती हैं। एक ओर अल्मोड़ा के बेस अस्पताल की मनोचिकित्सा ओपीडी में मरीजों की बढ़ती संख्या चिंता पैदा कर रही है, वहीं दूसरी ओर बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर किए गए एक अध्ययन में सरकारी सहायता तक पहुंच की भारी कमी उजागर हुई है।
35,746 बच्चों और किशोरों को मदद की जरूरत का अनुमान
निमहांस (NIMHANS), बेंगलुरु ने उत्तराखंड राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के सहयोग से वित्तीय वर्ष 2024-25 में देहरादून, पौड़ी, अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों में बच्चों एवं किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित अध्ययन किया।
उपलब्ध अध्ययन-सार के अनुसार, इसके निष्कर्षों के आधार पर उत्तराखंड में लगभग 35,746 बच्चों और किशोरों में बौद्धिक दिव्यांगता, ऑटिज्म, ADHD, चिंता या अवसाद जैसी स्थितियों से संबंधित सहायता की जरूरत होने का अनुमान सामने आया है। यह अनुमान है, न कि राज्य के प्रत्येक बच्चे की व्यक्तिगत जांच से तैयार की गई पुष्ट सूची।
सबसे चिंताजनक पहलू अभिभावकों में जागरूकता का अभाव है। सर्वेक्षण में शामिल 385 अभिभावकों में:
- केवल 0.26 प्रतिशत ने दिव्यांगता पहचान-पत्र के बारे में सुना था।
- केवल 1.04 प्रतिशत ने अपने बच्चे का आकलन कराया था।
- केवल 2.36 प्रतिशत ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता ली थी।
ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल मानसिक स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों तक सीमित नहीं है। पहचान, जानकारी, विशेषज्ञों तक पहुंच और सरकारी सुविधाओं के उपयोग के बीच भी बड़ी खाई दिखाई देती है।
जब माता-पिता को यह नहीं मालूम कि बच्चे की सीखने की कठिनाई, व्यवहार में बदलाव या लगातार उदासी के लिए कहां संपर्क करना है, तो समस्या वर्षों तक अनदेखी रह सकती है। हालांकि, इन आंकड़ों को पूरे राज्य के प्रत्येक परिवार की स्थिति का सटीक प्रतिनिधित्व मानने से पहले अध्ययन की नमूना-पद्धति और विस्तृत रिपोर्ट देखना जरूरी है।
अल्मोड़ा में बढ़ रहा मानसिक स्वास्थ्य परामर्श का दबाव
अल्मोड़ा स्थित सोबन सिंह जीना राजकीय आयुर्विज्ञान एवं शोध संस्थान से संबद्ध बेस अस्पताल की मनोचिकित्सा ओपीडी में प्रतिदिन 50 से अधिक लोगों के पहुंचने की जानकारी सामने आई है। इनमें लगभग 15 युवा बताए गए हैं।
चिकित्सकों के अनुसार, नशे का सेवन, करियर और प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, बेरोजगारी तथा सोशल मीडिया से जुड़ी परेशानियां मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। नई माताओं में प्रसव के बाद होने वाले अवसाद को कई बार परिवार सामान्य थकान या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देता है।
बच्चों में भी ध्यान केंद्रित करने, व्यवहार को नियंत्रित करने, सामाजिक संपर्क बनाने और पढ़ाई में कठिनाई जैसी समस्याओं के कारण विशेषज्ञों से परामर्श की जरूरत सामने आ रही है। पांच से 14 वर्ष के बच्चों में ADHD और ऑटिज्म जैसी स्थितियों का उल्लेख इस बात को रेखांकित करता है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या अपने आप में राज्य में मानसिक बीमारी की कुल दर नहीं बताती। फिर भी, यह स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत और समय पर सहायता उपलब्ध कराने की महत्ता को स्पष्ट करती है।
बच्चे को ‘जिद्दी’, ‘सुस्त’ या ‘शरारती’ कहकर न टालें
ग्रामीण और शहरी परिवारों में बच्चों के व्यवहार को लेकर कई गलत धारणाएं आज भी प्रचलित हैं। पढ़ाई में कठिनाई होने पर बच्चे को कमजोर समझ लिया जाता है, अकेले रहने वाले बच्चे को जिद्दी कह दिया जाता है और लगातार बेचैन रहने वाले बच्चे को शरारती मान लिया जाता है।
लेकिन हर बच्चा अलग तरह से सीखता और विकसित होता है। कुछ बच्चों को अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता, व्यवहार संबंधी सहयोग या विशेषज्ञ मूल्यांकन की जरूरत हो सकती है।
- ADHD: ध्यान बनाए रखने, आवेगों को नियंत्रित करने या अत्यधिक सक्रियता से जुड़ी विकासात्मक स्थिति।
- ऑटिज्म: सामाजिक संवाद, संचार और व्यवहार के कुछ पैटर्न से जुड़ी विकासात्मक स्थिति।
- चिंता और अवसाद: लगातार डर, बेचैनी, उदासी, निराशा या रोजमर्रा के कामों में रुचि कम होने जैसी समस्याएं।
- बौद्धिक दिव्यांगता: बौद्धिक कार्यक्षमता और रोजमर्रा के अनुकूलन संबंधी कौशल में महत्वपूर्ण कठिनाइयों से जुड़ी स्थिति।
इनमें से किसी भी स्थिति का निष्कर्ष केवल किसी एक व्यवहार को देखकर नहीं निकाला जा सकता। सही मूल्यांकन प्रशिक्षित विशेषज्ञ करते हैं। बच्चे को डांटने, दूसरों से तुलना करने या शर्मिंदा करने के बजाय उसकी जरूरत समझना पहला कदम होना चाहिए।
युवाओं पर बढ़ता दबाव: प्रतियोगिता, बेरोजगारी और सोशल मीडिया
आज के युवाओं के सामने पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव है। सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता, जीवनशैली और उपलब्धियों को लगातार देखने से कुछ युवाओं में हीनभावना, अकेलापन और असफलता का डर बढ़ सकता है।
उत्तराखंड में पलायन, सीमित स्थानीय रोजगार के अवसर, परिवार से दूर रहकर पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी तैयारी भी कुछ युवाओं के तनाव को बढ़ा सकती है। हालांकि, प्रत्येक युवा की परिस्थिति अलग होती है और मानसिक स्वास्थ्य की समस्या का कोई एक कारण नहीं होता।
युवाओं को यह समझना जरूरी है कि परीक्षा में असफलता जीवन की असफलता नहीं है। नौकरी न मिलना किसी व्यक्ति की योग्यता या सम्मान का अंतिम फैसला नहीं है। मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी स्थिति को पहचानकर जिम्मेदारी से कदम उठाना है।
परिवारों, शिक्षण संस्थानों और समाज को भी ऐसा माहौल बनाना होगा जहां युवा अपनी परेशानी खुलकर बता सकें और उन्हें तुरंत ताने, उपदेश या दोषारोपण का सामना न करना पड़े।
नई माताओं के मानसिक स्वास्थ्य को भी मिले प्राथमिकता
प्रसव के बाद महिलाओं में थकान, हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी और नई जिम्मेदारियों के कारण भावनात्मक परेशानियां हो सकती हैं। कुछ महिलाओं में प्रसवोत्तर अवसाद विकसित हो सकता है, जिसे केवल सामान्य थकान मानकर छोड़ना उचित नहीं है।
यदि मां लंबे समय तक उदास रहती है, लगातार रोती है, बच्चे से जुड़ाव महसूस करने में कठिनाई होती है, अत्यधिक अपराधबोध रहता है या नींद और भूख बुरी तरह प्रभावित होती है, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
परिवार को महिला की परेशानी को कमजोरी या मातृत्व के प्रति उदासीनता के रूप में नहीं देखना चाहिए। आराम, व्यावहारिक मदद, भावनात्मक सहयोग और जरूरत पड़ने पर उपचार बेहद महत्वपूर्ण हैं।
बचाव के उपाय: परिवार, युवा और समाज क्या करें?
मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन शुरुआती पहचान, सहयोग और समय पर उपचार से कई परेशानियों को बढ़ने से रोका जा सकता है। लेकिन जीवन शैली एक बड़ा कारण बनकर उभरा है।
1. माता-पिता के लिए जरूरी कदम
- बच्चे की पढ़ाई, व्यवहार, नींद, भूख और दोस्तों से बातचीत में लगातार बदलाव पर ध्यान दें।
- बच्चे की तुलना भाई-बहनों या दूसरे बच्चों से न करें।
- बच्चा अपनी परेशानी बताए तो उसे डांटने के बजाय ध्यान से सुनें।
- लंबे समय तक उदासी, डर, चिड़चिड़ापन या स्कूल जाने में परेशानी होने पर बाल रोग विशेषज्ञ अथवा मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
- ऑटिज्म या ADHD की आशंका होने पर स्वयं निदान न करें और न ही बच्चे को दोष दें।
- बच्चों के लिए नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, खेलकूद, पौष्टिक भोजन और परिवार के साथ समय सुनिश्चित करें।
2. युवाओं के लिए पांच जरूरी आदतें
- नींद को प्राथमिकता दें: नियमित समय पर सोएं और पर्याप्त नींद लें। किशोरों को आम तौर पर 8–10 घंटे और वयस्कों को 7–9 घंटे की नींद की जरूरत होती है।
- सोशल मीडिया का संतुलित उपयोग करें: देर रात तक स्क्रीन देखने, लगातार दूसरों से तुलना करने और ऑनलाइन विवादों में उलझने से बचें।
- प्रतिदिन शारीरिक गतिविधि करें: धूप सेकना, हवादार खुले कमरों में रहना, पैदल चलना, दौड़ना, योग, खेलकूद , अपनी सांसों को देखना शुरू करें या अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम करें और प्रकृति के बीच रहें।
- नशे से दूरी रखें: तनाव दूर करने के लिए शराब, तंबाकू या अन्य नशीले पदार्थों का सहारा न लें।
- अपनी परेशानी साझा करें: भरोसेमंद मित्र, परिवार के सदस्य, शिक्षक या प्रशिक्षित काउंसलर से बात करें। जरूरत पड़ने पर पेशेवर सहायता लें।
योग, ध्यान और श्वास संबंधी अभ्यास कुछ लोगों को तनाव संभालने में मदद कर सकते हैं। लेकिन गंभीर या लगातार मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में इन्हें चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
3. स्कूल और कॉलेजों की जिम्मेदारी
शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम नियमित होने चाहिए। प्रत्येक स्कूल और कॉलेज में प्रशिक्षित काउंसलर या रेफरल व्यवस्था, गोपनीय शिकायत प्रणाली और बुलिंग के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को भी केवल परीक्षा परिणाम के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए। करियर मार्गदर्शन, वैकल्पिक रोजगार संबंधी जानकारी और तनाव प्रबंधन के कार्यक्रम उपयोगी हो सकते हैं।
4. गांवों में जागरूकता अभियान जरूरी
उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, ग्राम प्रधानों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
गांवों में अभिभावकों को बताया जाना चाहिए कि विकास संबंधी कठिनाइयां या मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं चरित्र की कमजोरी, खराब परवरिश या किसी व्यक्ति की गलती का प्रमाण नहीं हैं।
सरकार को ऐसे शिविर आयोजित करने चाहिए जहां बच्चों की प्रारंभिक जांच, विशेषज्ञ परामर्श के लिए रेफरल और पात्र बच्चों के दिव्यांगता प्रमाणपत्र व UDID कार्ड की प्रक्रिया के बारे में जानकारी एक ही स्थान पर मिल सके।
सरकारी सहायता कहां मिलेगी?
1. Tele-MANAS हेल्पलाइन — 14416
यह केंद्र सरकार की निःशुल्क, 24 घंटे उपलब्ध टेली-मानसिक स्वास्थ्य सेवा है। मानसिक तनाव, चिंता, उदासी और अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों में मार्गदर्शन के लिए संपर्क किया जा सकता है। <Cite refs={[“turn548463search3″,”turn548463search6”]}/>
2. दिव्यांगता प्रमाणपत्र और UDID कार्ड
यदि किसी बच्चे में बौद्धिक दिव्यांगता या अन्य मान्य दिव्यांगता होने की आशंका है, तो चिकित्सकीय मूल्यांकन के लिए अधिकृत अस्पताल या मेडिकल बोर्ड से संपर्क करें। पात्रता और प्रमाणन के अनुसार दिव्यांगता प्रमाणपत्र तथा UDID कार्ड के लिए आवेदन किया जा सकता है।
आधिकारिक पोर्टल: swavlambancard.gov.in <Cite refs={[“turn548463search1″,”turn548463search7”]}/>
3. नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज से प्रारंभिक चिकित्सकीय सलाह लेकर आवश्यकतानुसार मनोचिकित्सक, बाल रोग विशेषज्ञ या अन्य संबंधित विशेषज्ञ के पास रेफरल मांगा जा सकता है।
यदि किसी व्यक्ति को खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आ रहे हों, वह अपनी सुरक्षा बनाए रखने में असमर्थ हो या तत्काल गंभीर संकट में हो, तो उसे अकेला न छोड़ें। निकटतम आपातकालीन चिकित्सा सेवा से तुरंत सहायता लें।
सरकार के सामने पांच बड़े सवाल
35,746 बच्चों और किशोरों से संबंधित अनुमान केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठाने का अवसर भी है।
- क्या उत्तराखंड सरकार ने इन चार जिलों के अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर राज्यव्यापी कार्ययोजना बनाई है?
- क्या प्रत्येक जिले में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित विशेषज्ञ उपलब्ध हैं?
- कितने स्कूलों और कॉलेजों में नियमित काउंसलिंग या रेफरल व्यवस्था है?
- कितने पात्र बच्चों का मूल्यांकन हुआ, कितनों को उपचार मिला और कितने परिवारों को UDID व अन्य सहायता की जानकारी दी गई?
- दूरस्थ पर्वतीय गांवों तक विशेषज्ञ सेवाएं पहुंचाने के लिए मोबाइल मानसिक स्वास्थ्य इकाइयां, टेली-काउंसलिंग और नियमित शिविर कब तक प्रभावी होंगे?
सरकार को जिलेवार आंकड़े, उपलब्ध विशेषज्ञों की संख्या, प्रतीक्षा अवधि, उपचार तक पहुंच और सहायता योजनाओं के उपयोग की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। साथ ही, बच्चों की पहचान और स्वास्थ्य संबंधी व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
समाज के नाम संदेश: चुप्पी नहीं, संवेदनशीलता जरूरी
मानसिक स्वास्थ्य की समस्या किसी व्यक्ति की कमजोरी नहीं है। हर उदास बच्चा अवसाद से ग्रस्त नहीं होता और हर बेचैन बच्चा ADHD से प्रभावित नहीं होता। लेकिन जब लक्षण लंबे समय तक बने रहें, दैनिक जीवन प्रभावित होने लगे या व्यक्ति की परेशानी बढ़ती जाए, तो उसे नजरअंदाज करना भी सही नहीं है।
उत्तराखंड के गांवों और शहरों में अब ऐसी सोच विकसित करने की जरूरत है, जिसमें बच्चे को अपमानित करने के बजाय समझा जाए, युवा को असफल कहने के बजाय सहारा दिया जाए और प्रसव के बाद परेशान मां को अकेला छोड़ने के बजाय उसकी मदद की जाए।
देवभूमि के लोग की अपील: यदि आपके परिवार, पड़ोस या परिचितों में कोई बच्चा लगातार पढ़ाई या व्यवहार संबंधी कठिनाइयों से जूझ रहा है, कोई युवा लंबे समय से उदास है या कोई मां प्रसव के बाद मानसिक परेशानी का सामना कर रही है, तो उन्हें सही सहायता तक पहुंचाने में मदद करें। समस्या को छिपाने से नहीं, समय पर पहचानने और उपचार से समाधान की राह निकलती है।
याद रखें: मदद मांगना कमजोरी नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य का ही हिस्सा है।
संदर्भ: अल्मोड़ा बेस अस्पताल की मनोचिकित्सा ओपीडी संबंधी उपलब्ध जानकारी; निमहांस बेंगलुरु, उत्तराखंड राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण एवं राजकीय दून मेडिकल कॉलेज का वित्तीय वर्ष 2024-25 का बाल एवं किशोर मानसिक स्वास्थ्य अध्ययन। प्रकाशित आंकड़ों की अंतिम पुष्टि के लिए मूल अध्ययन और संबंधित संस्थानों के आधिकारिक अभिलेख देखे जाने चाहिए।
