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बच्चे माता-पिता से बात करना क्यों बंद कर देते हैं? वह पैरेंटिंग गलती जो घर में सन्नाटा पैदा कर देती है

Dehradun/नई दिल्ली, 29 अप्रैल 2026: Bhanu Pratap Singh/- आजकल कई माता-पिता इस शिकायत के साथ आते हैं कि उनके बच्चे उनसे बात नहीं करते, अपनी भावनाएं या रोजमर्रा की बातें शेयर नहीं करते और धीरे-धीरे उनसे भावनात्मक दूरी बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के चुप्पी साध लेने के पीछे अक्सर माता-पिता की एक खास पैरेंटिंग गलती होती है, जो अनजाने में घर के माहौल को ठंडा और सन्नाटे भरा बना देती है।

मुख्य वजह: आलोचना और अनचाही सलाह की आदत

बच्चों के बोलना बंद करने की सबसे बड़ी वजह बताई जाती है — जब बच्चा कुछ कहता है या अपनी कोई समस्या बताता है, तो माता-पिता तुरंत आलोचना करने लगते हैं या बिना मांगे सलाह देने लगते हैं। इससे बच्चे को लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही है, बल्कि उस पर फैसला सुनाया जा रहा है या सुधारने की कोशिश की जा रही है। नतीजतन, बच्चा धीरे-धीरे बात करना ही बंद कर देता है।

मंगलौर के केएमसी हॉस्पिटल में कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट डॉ. कृतिस्री सोमन्ना कहती हैं, “कई माता-पिता सोचते हैं कि उन्होंने बच्चों को बात करने का पूरा मौका दिया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। असल समस्या मौका देने में नहीं, बल्कि उस मौके का इस्तेमाल करने के तरीके में है। जो बच्चे हर बार आलोचना या सलाह सुनते हैं, वे बोलना ही बंद कर देते हैं। उन्हें सबसे पहले सिर्फ सुना जाना चाहिए।”

भावनाओं को दबाने की आदत कैसे बनती है?

  • बचपन से अगर बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त करते समय लगातार नकारे जाते हैं, आलोचना का शिकार होते हैं या उनकी फीलिंग्स को महत्व नहीं दिया जाता, तो वे भावनाओं को दबाना सीख जाते हैं।
  • अध्ययनों में पाया गया है कि जहां घर में भावनात्मक अभिव्यक्ति को हतोत्साहित किया जाता है, वहां बच्चे लंबे समय तक भावनात्मक संकट झेलते हैं।
  • वहीं, जो बच्चे खुले, सहायक और बिना जजमेंट वाले वातावरण में बड़े होते हैं, वे अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से व्यक्त करते हैं और आंतरिक समस्याओं से कम प्रभावित होते हैं।

डॉ. सोमन्ना आगे बताती हैं कि घर को ऐसा सुरक्षित स्थान बनाना चाहिए जहां बच्चा अपनी किसी भी चिंता, डर, गुस्से या मानसिक परेशानी को बिना डरे बता सके। अगर हर बात पर जजमेंट, आलोचना या तुरंत सुधार की कोशिश होती है, तो बच्चा चुप रहना ज्यादा सुरक्षित समझता है।

अन्य आम पैरेंटिंग गलतियां जो सन्नाटा बढ़ाती हैं

  1. संवेदनशील समय में तुरंत सुधार करना: जब बच्चा भावुक या संवेदनशील होता है, उसी समय उसकी गलती बताना या सुधारने की कोशिश करना।
  2. अधीरता और असंगत व्यवहार: कभी ध्यान से सुनना, कभी बीच में टोकना या आलोचना करना — इससे बच्चे में भरोसा नहीं बन पाता।
  3. माता-पिता द्वारा खुद अपनी भावनाएं शेयर न करना: अगर माता-पिता खुद अपनी फीलिंग्स नहीं बताते, तो बच्चे भी ऐसा करना नहीं सीख पाते।
  4. बातचीत के अच्छे अवसरों का गलत इस्तेमाल: खाना खाते समय, सोने से पहले या कार में बैठकर बात करने के मौके होते हैं, लेकिन अगर इनमें भी जजमेंट या व्याख्यान हो तो बच्चे दूर हो जाते हैं।

समाधान: एक्टिव लिसनिंग और सुरक्षित वातावरण बनाएं

डॉ. सोमन्ना माता-पिता को ये सलाह देती हैं:

  • एक्टिव लिसनिंग अपनाएं — बिना बीच में टोके, बिना आलोचना किए और बिना सलाह दिए सिर्फ पूरा ध्यान देकर सुनें। बच्चे को यह महसूस हो कि उनकी भावनाएं वैध हैं और उनको महत्व दिया जा रहा है।
  • रोजाना के रूटीन में बातचीत को सामान्य बनाएं — डिनर टेबल पर, बेडटाइम पर या आराम के समय कैजुअल चर्चा करें।
  • जब बच्चा संवेदनशील हो, तब सुधार की बजाय कोई न्यूट्रल और सकारात्मक विषय (जैसे कोई किताब, फिल्म या घटना) चुनकर बात करें।
  • अगर जरूरत महसूस हो तो प्रोफेशनल मदद लें — किसी काउंसलर या विशेषज्ञ से बात करना शर्म की बात नहीं है, बल्कि जिम्मेदार पैरेंटिंग का हिस्सा है।
  • माता-पिता खुद अपनी भावनाओं को स्वस्थ तरीके से शेयर करें, ताकि बच्चे सीखें कि घर में खुलकर बात करना सुरक्षित और ठीक है।

महत्वपूर्ण संदेश: सन्नाटा एक दिन में नहीं आता। यह छोटी-छोटी रोजमर्रा की गलतियों और आदतों से धीरे-धीरे बनता है। अगर शुरुआत से ही घर में भावनाओं को महत्व और सम्मान दिया जाए, तो बच्चे खुलकर बात करेंगे और रिश्ता मजबूत रहेगा।

माता-पिता के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि सुनना बोलने से कहीं ज्यादा जरूरी है। बच्चे को सही रास्ता दिखाने की कोशिश करने से पहले उन्हें यह महसूस कराएं कि वे सुने जा रहे हैं और उनकी बातों का मूल्य है।

By The Common Man

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