अस्कोट, डीडीहाट-पिथौरागढ़-By Bhanu Pratap Singh-06-04-2026/-डीडीहाट और सीमांत के बचे हुए क्षेत्र को पांचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग: सीमांत की उपेक्षित भूमि, अनोखी संस्कृति और जनजातीय सुरक्षा का अनिवार्य दावादेहरादून से जब आप पूर्व की ओर मुड़ते हैं, पिथौरागढ़ की घाटियों की ओर, तो रास्ता धीरे-धीरे संकरा होता जाता है। सड़क किनारे के पहाड़ खड़े हो जाते हैं, और हवा में एक अलग सी ठंडक महसूस होती है। यहीं, लगभग 100 किलोमीटर दूर, डीडीहाट और सीमांत के क्षेत्र है। यह हिमालय की उस गोद का हिस्सा है जहां प्रकृति ने अपनी सारी कठोरता और सुंदरता एक साथ बिखेर दी है। यहां की चोटियां नेपाल और तिब्बत (चीन) की सीमा को छूती हैं, घाटियां गहरी हैं, और गांव इतने ऊंचे कि सूरज की पहली किरण पहुंचने में भी वक्त लगता है।
लेकिन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी सच्चाई उसकी उपेक्षा है। पिछड़ापन, प्रवास, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा का अभाव और सबसे ऊपर – अपनी पहचान और भूमि को बचाने की लड़ाई। आज जब पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पांचवीं अनुसूची लागू करने की मांग जोर पकड़ रही है – जंतर मंतर पर उतरकर लोग चिल्ला रहे हैं, “पहाड़ को जनजातीय क्षेत्र घोषित करो” – तो डीडीहाट इस मांग का सबसे मजबूत उदाहरण बनकर उभरा है। यहां की जनता कह रही है – हमें अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा और पांचवीं अनुसूची की सुरक्षा चाहिए। क्यों? क्योंकि यहां की भूमि, संस्कृति और लोग अनोखे हैं। क्योंकि सीमा पर बैठे होने का मतलब सिर्फ रणनीतिक महत्व नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई भी है।
डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा है। इसमें मुख्य रूप से डीडीहाट ब्लॉक, कनालीछीना ब्लॉक और बेरिनाग के कुछ हिस्से शामिल हैं (हालांकि बेरिनाग को अलग तहसील बना दिया गया है, लेकिन क्षेत्रीय रूप से जुड़ा हुआ है)। कुल मिलाकर 367 से ज्यादा गांव, हजारों परिवार और एक जनसंख्या जो मुख्यतः पहाड़ी कृषि, पशुपालन और पारंपरिक व्यापार पर निर्भर रही है। लेकिन सबसे खास है – सीरा क्षेत्र। सीरा (या सेरा) गांव और आसपास के इलाके – जैसे पारी सेरा, सेरा सौनाली – छोटे-छोटे हमलेट हैं जहां परिवार मुश्किल से 3-4 परिवारों के होते हैं। यहां की मिट्टी पत्थरों से भरी है, खेती मुश्किल, पानी दूर। लोग कहते हैं, “सीरा में तो सूरज भी देर से निकलता है।” फिर भी यहां की महिलाएं ऊन की बुनाई करती हैं, पुरुष ऊंचाई पर चरागाहों तक जाते हैं। यह क्षेत्र डीडीहाट ब्लॉक का हिस्सा है, लेकिन विकास की दौड़ में हमेशा पीछे छूट जाता है।
अस्कोट नगर तो इस क्षेत्र का ऐतिहासिक गौरव है। एक समय में अस्कोट राजवारों का इलाका था, जहां जमींदारी व्यवस्था चली। 3629 फीट की ऊंचाई पर बसा यह छोटा सा कस्बा पिथौरागढ़ और धारचूला के बीच की रिज पर स्थित है। यहां से नेपाल की सीमा नजदीक है, और उत्तर में तिब्बत का पठार। अस्कोट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी भी यहीं है, जहां दुर्लभ हिमालयी जीव-जंतु पाए जाते हैं। लेकिन आज अस्कोट पिछड़ापन का प्रतीक बन गया है। सड़कें खराब, अस्पताल दूर, स्कूलों में शिक्षक कम। लोग कहते हैं, “अस्कोट तो सीमा का चौकीदार है, लेकिन सरकार इसे सिर्फ नक्शे पर ही याद रखती है।” अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य होने से भी सीमांत क्षेत्र का विकास हमेशा सीमित रहा।
डीडीहाट क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ही इसकी नियति तय करती है। उत्तर में तिब्बत (चीन), पूर्व में नेपाल। काली नदी नेपाल की सीमा बनाती है। लिपुलेख, कुंगरिबिंग्री, लंपिया धुरा जैसे पास यहीं से तिब्बत जाते हैं। एक समय में भोटिया व्यापारी इन पासों से नमक, ऊन और जड़ी-बूटियां लेकर तिब्बत जाते थे, वापस रेशम और अन्य सामान लाते थे। यह व्यापार न सिर्फ अर्थव्यवस्था का आधार था, बल्कि सांस्कृतिक पुल भी। 1962 के बाद सीमा बंद होने से सब बदल गया। लेकिन भौगोलिक निकटता आज भी खतरे की घंटी है। चीन की गतिविधियां, नेपाल से आने वाली चुनौतियां – यहां की जनता हर रोज महसूस करती है कि हम सीमा पर हैं।
ऐसे में पांचवीं अनुसूची क्यों जरूरी? संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान करती है। गवर्नर को विशेष शक्तियां, ट्राइब्स एडवाइजरी काउंसिल, भूमि का संरक्षण, बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीद पर रोक। यह जनजातीय संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाजों को बचाती है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों को 1874 के शेड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट एक्ट और 1935 के एक्सक्लूडेड एरिया घोषणा के तहत पहले यह सुरक्षा मिली थी, लेकिन 1972 में छीन ली गई। आज हिमाचल प्रदेश का 43 प्रतिशत हिस्सा पांचवीं अनुसूची में है। जौनसार-बावर (जौनसारी एसटी) में यह लागू होने से संस्कृति बची, महिलाओं को सुरक्षा मिली, रोजगार बढ़ा। डीडीहाट क्यों नहीं?
डीडीहाट की अनोखी सांस्कृतिक विरासत: जो एसटी दर्जे की मांग करती है
डीडीहाट के लोग मुख्यतः कुमाऊंनी हैं, लेकिन यहां भोटिया (शौका, जोहारी, दार्मिया, ब्यांसी, चौदांसी) समुदाय की मजबूत उपस्थिति है। ये पहले से अनुसूचित जनजाति हैं। राजी (बनरावत) भी छोटी संख्या में हैं। डीडीहाट, बेरीनाग, मुनाकोट से नेपाल सीमा तक और धारचूला- मुनस्यारी के बचे हुए बाकी समुदाय – कुछ ओबीसी में, कुछ सामान्य श्रेणी में – अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। यही कारण है कि पूरा क्षेत्र एसटी दर्जे और पांचवीं अनुसूची का हकदार है।
भोटिया संस्कृति की बात करें तो यह हिमालय की जीवंत कहानी है। ये ट्रांस-हिमालयन समुदाय हैं। ऊंचाई पर रहते हैं – 6500 से 13000 फीट तक। सर्दियों में नीचे उतरते हैं, गर्मियों में चरागाहों तक। उनका भाषा तिब्बतो-बर्मन परिवार की है, लेकिन संस्कृति हिंदू-बौद्ध मिश्रण की। त्योहार जैसे नंदा देवी राजजात का प्रभाव, लेकिन भोटिया खास – उनकी बुनाई, ऊनी शॉल, गहने, घरेलू वास्तुकला। पत्थर और लकड़ी के घर, जिनमें हवा और बर्फ दोनों रोकने की कला है।
ऐतिहासिक रूप से ये तिब्बत व्यापार के सूत्रधार थे। जोहार घाटी के शौका भोटिया प्रसिद्ध थे। मिलम, मुनस्यारी से तिब्बत तक कारवां जाते थे। नमक-ऊन का आदान-प्रदान। यह सिर्फ व्यापार नहीं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान था। भोटिया महिलाएं ऊन की बुनाई में माहिर, पुरुष ऊंचाई पर चढ़ने में। उनकी दवाइयां – जड़ी-बूटियां – आयुर्वेद और लोक चिकित्सा का हिस्सा। आज भी वे IUCN की रेड लिस्ट वाली पौधों की जानकारी रखते हैं।
सीरा क्षेत्र,डीडीहाट, बेरीनाग, मुनाकोट से नेपाल सीमा तक और धारचूला- मुनस्यारी के बचे हुए बाकी समुदाय में रहने वाले परिवार इसी विरासत को संभाले हुए हैं। छोटे-छोटे गांव, जहां स्कूल तक पहुंचना मुश्किल। लेकिन त्योहार मनाते वक्त पूरा गांव एक हो जाता है। अस्कोट में राजवारों की पुरानी कहानियां अभी भी सुनाई देती हैं। यहां की भूमि पवित्र है – देवी-देवताओं की। नंदा देवी, त्रिशूल की छाया। यह संस्कृति बाहरी प्रभाव से बचनी चाहिए, वरना खो जाएगी।
पिछड़ापन: आंकड़े जो चुप नहीं रहते
पिथौरागढ़ जिला समग्र रूप से पिछड़ा है। 2011 जनगणना के मुताबिक घनत्व कम, साक्षरता 82 प्रतिशत (महिला 72 प्रतिशत), लेकिन वास्तविकता में दूरदराज के गांवों में यह और कम है। डीडीहाट ब्लॉक में 33,505 की आबादी, लेकिन स्वास्थ्य केंद्र कम, सड़कें मौसमी। सीरा जैसे इलाकों में बिजली- पानी की समस्या सालों से है।
प्रवास बड़ा मुद्दा है। युवा दिल्ली, मुंबई भाग जाते हैं। गांव खाली हो रहे हैं। महिलाएं और बुजुर्ग अकेले खेती संभालते हैं। स्वास्थ्य – अस्पताल दूर, प्रसव के लिए घंटों पैदल चलना पड़ता है। शिक्षा – उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना पड़ता है। आर्थिक रूप से कृषि और पशुपालन पर निर्भर, लेकिन जलवायु परिवर्तन से फसल प्रभावित है।
कंपोजिट इंडेक्स ऑफ बैकवर्डनेस में पिथौरागढ़ हमेशा निचले पायदान पर है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी सुविधाओं में कमी है। अस्कोट-डीडीहाट में पर्यटन की संभावना है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है।
सीमा सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण: एसटी का मजबूत तर्क
चीन और नेपाल की निकटता डीडीहाट को रणनीतिक बनाती है। लिपुलेख पास से सैन्य गतिविधियां। लेकिन स्थानीय लोग ही असली चौकीदार हैं। एसटी दर्जा और पांचवीं अनुसूची भूमि को बाहरी खरीद से बचाएगी। ट्राइब्स एडवाइजरी काउंसिल बनेगी, जो विकास योजनाएं तय करेगी।
भोटिया पहले से एसटी हैं, लेकिन बाकी समुदायों को शामिल करने से पूरा क्षेत्र लाभान्वित होगा। जैसा जौनसारी में हुआ – रोजगार बढ़ा, संस्कृति बची। यहां भी महिलाओं को सुरक्षा, युवाओं को आरक्षण।
अन्य क्षेत्रों से सबक
हिमाचल के ट्रांस-गिरी हट्टी समुदाय ने पांचवीं अनुसूची की मांग की। जौनसार-बावर में एसटी होने से विकास हुआ। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों को भी यही चाहिए। 2024 में उत्तराखंड एकता मंच ने जंतर मंतर पर यह मांग रखी।
डीडीहाट की मांग सिर्फ दर्जा नहीं, पहचान का संरक्षण है। यहां की अनोखी भूमि – हिमालय की कंधे पर बैठी, नेपाल-चीन की निगरानी करती – को विशेष सुरक्षा चाहिए। संस्कृति जो हजारों साल पुरानी है, व्यापार परंपरा, जड़ी-बूटियां, भाषा – सब बचनी चाहिए।
समय आ गया है कार्रवाई का
सीरा,डीडीहाट, बेरीनाग, मुनाकोट से नेपाल सीमा तक और धारचूला- मुनस्यारी के बचे हुए बाकी समुदाय में रहने वाले परिवार लंबे समय से इंतजार कर रही है। अलग जिला की मांग से लेकर अब एसटी और पांचवीं अनुसूची तक। सरकार को सुनना चाहिए। मुख्यमंत्री, केंद्र सरकार – पहाड़ की आवाज को अनसुना न करें। डीडीहाट को पांचवीं अनुसूची में शामिल करना न सिर्फ संवैधानिक दायित्व है, बल्कि सीमा सुरक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और समावेशी विकास का रास्ता भी।
स्वयं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इसी क्षेत्र से हैं, किन्तु कई बार उन्होंने भी इस क्षेत्र की भौगोलिक, सांस्कृतिक और विपरीत परिस्थिति पर चिंता व्यक्त की है और सीमांत की इस विलक्षण वर्ग के संरक्षण का समय अब आ चुका है। समय है कि मुख्यमंत्री इस क्षेत्र को 5वीं अनुसूची में शामिल करते हुए इस क्षेत्र के लोगों की वर्षों पुरानी एसटी दर्जा की मांग को अब पूरा करें अन्यथा, एक दिन ये घाटियां खाली हो जाएंगी और हिमालय सिर्फ नक्शे पर बचेगा।
(लेखक: यह लेख क्षेत्रीय साक्षात्कारों, जनगणना आंकड़ों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और वर्तमान मांगों पर आधारित है)
