Dehradun/ Uttarakhand-Editorial By-सिद्धार्थ राणा -बात बड़ी तार्किक है इसे झुठलाया नहीं जा सकता जानवर हमारी ही तरह जीने के लिए पैदा हुए हैं। उनमें वही जिजीविषा है जो इंसानों को कुछ करने के लिए प्रेरित करती है। हम अलग हैं क्योंकि भोगपूर्ति के अलावा अपने ऊंचे स्वार्थ आत्मोत्थान के लिए अग्रसर हो सकते हैं। जानवर ये नहीं कर सकते उनका ढर्रा तय है फिर भी उनमें जीवन है और अनुभव करने की क्षमता। उन्हें कष्ट न पहुँचे इसका अर्थ है दूसरे मनुष्यों को भी कष्ट न पहुँचे क्योंकि जब हम जानवरों के साथ क्रूर होते हैं तो अपने सजातीय बंधुओं के प्रति भी प्रेमपूर्ण नहीं हो सकते। प्रेम क्या है? कि मैं अपना भी भला जानता हूं और दूसरों का भी यदि मैं अपने सुख के लिए दूसरे की हानि करूं तो मेरा प्रेम बड़े हल्के दर्जे का है। वह कुछ लोगों या वस्तुओं तक सीमित है।
गांधीजी ने अहिंसा का पाठ पढ़ाया पर देशवासी कितना उस पर चल सके। वास्तव में अहिंसा एक भीतरी सुलझाव से आती है मैं अपने प्रति हिंसक नहीं तो किसी के प्रति भी नहीं हो सकता हूं। मेरी अपने प्रति हिंसा क्या है? कि मैंने भोग को बड़ा समझ लिया तुच्छ स्वार्थों को अपनाने लगा और जो कीमती है सचमुच विशेष उसे नकार दिया। वह इच्छा जिसमें सबका कल्याण देखने की ललक उभरती है निज का आपा विकसित होता चला जाता है कोई कमी नहीं रहती। ईश्वर की बनाई सृष्टि को सौंदर्यवश देखता हूं नोच-खसोट बगैर स्वीकारने योग्य है। एक तमाशा बना दिया गया है कि कुछ जीव तो खाने के लिए होते हैं और कुछ पूजने के लिए। किसको पूजोगे अपने अहंकार को दिखता नहीं वो जो जीव सामने कटा पड़ा है तुम्हारी प्रतिकृति है। तुम उसके जैसे हो हर दृष्टि से बस अंतर इतना है कि वो कमजोर है सताया हुआ और तुमने उसकी जान पर अधिकार कर लिया है। यही क्रिया तुम कहीं नरकहिं दोहराओगे फिर चाहे वह इतना प्रकट न हो। जानवरों के प्रति क्रूरता एक ऐसा मुद्दा है जिसकी अनदेखी नहीं हो सकती क्योंकि ये दूसरे इंसानों से भी जुड़ा है, हमारे साझे भविष्य से और इस धरती पर जीवन के पूर्ण रूप से विकसित होने से भी। क्योंकि यदि हम ठीक से इंसान नहीं बनेंगे तो भोग और लालचवश क्या नहीं कर बैठेंगे और यदि जग गए, प्रेम की महानता अनुरूप जीवन को संवारा दूसरे प्राणियों में अपने ही आत्मदर्शन किए तो धन्य कहलाएंगे।
(लेखक सिद्धार्थ राणा पीएचडी के छात्र हैं और एक कुशल योग एवं आध्यात्मिक प्रशिक्षक भी हैं)
