Sun. Mar 29th, 2026

उत्तराखंड पुलिस कस्टडी में PRD जवान सुनील रतूड़ी की संदिग्ध मौत: परिजनों का हत्या का आरोप, थाना प्रभारी समेत 4 पुलिसकर्मी लाइन हाजिर – जवाबदेही फिर कागजी?

देहरादून, 29 मार्च 2026 – राजधानी देहरादून के रायपुर थाने की हवालात में प्रांतीय रक्षक दल (PRD) जवान सुनील रतूड़ी (45 वर्ष) की संदिग्ध मौत ने उत्तराखंड पुलिस की कार्रवाई पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवार का सीधा आरोप है कि पुलिस ने थाने में मार-पीटकर जवान की हत्या की, जबकि पुलिस का दावा है कि नशे की हालत में बंदी ने कंबल फाड़कर फंदा बनाकर आत्महत्या कर ली। घटना 28 मार्च 2026 (शनिवार) की है। इस मामले में थाना प्रभारी समेत चार पुलिसकर्मियों को तुरंत लाइन हाजिर कर दिया गया है, मजिस्ट्रेट जांच और डॉक्टरों के पैनल से वीडियोग्राफी के साथ पोस्टमॉर्टम कराया जा रहा है।

घटना का क्रम क्या था?
पुलिस के मुताबिक, दोपहर करीब 3:15 बजे 112 पर सूचना मिली कि लाडपुर के महादेव फ्यूल पेट्रोल पंप पर एक शख्स नशे में धुत होकर हंगामा कर रहा है। सुनील रतूड़ी (टिहरी गढ़वाल मूल निवासी, देहरादून के टपोवन रोड/PRD कॉलोनी निवासी) ने पेट्रोल भरवाया, पैसे नहीं दिए, कर्मचारियों से बदतमीजी की और खिलौना पिस्तौल निकालकर धमकाया। पुलिस मौके पर पहुंची, उन्हें समझाया लेकिन न मानने पर गिरफ्तार कर रायपुर थाना ले गई। एल्कोमीटर टेस्ट में उनके खून में अल्कोहल 231.6 mg/100ml पाया गया (बहुत अधिक)। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185/207 के तहत केस दर्ज कर हवालात में बंद किया गया। थाने में भी वे शोर-शराबा करते रहे। कुछ देर बाद हेड कॉन्स्टेबल ने उन्हें बेहोश पाया। तुरंत कोरोनेशन अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। पुलिस का कहना है कि हवालात में कंबल फाड़कर फंदा बनाकर आत्महत्या की गई।

परिवार की बात अलग है। मृतक की पत्नी मीनाक्षी रतूड़ी ने स्पष्ट आरोप लगाया – “थाने में पुलिसकर्मियों ने मेरे पति को मार डाला। उन्होंने आत्महत्या नहीं की।” उन्होंने बताया कि शाम 4 बजे सुनील ने एक दोस्त से फोन पर बात की थी और पूरी तरह ठीक थे। 7 बजे उन्हें सूचना मिली कि हालत बिगड़ गई है। अस्पताल पहुंचने पर मौत की खबर मिली। परिवार ने अस्पताल के बाहर और थाने पर हंगामा किया, न्याय की मांग की। सुनील रतूड़ी जिला युवा कल्याण विभाग (विकास भवन) में प्रधान लिपिक के रूप में तैनात थे।

पुलिस की कार्रवाई और जांच
देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेन्द्र सिंह डोबाल ने मामले को “अत्यंत गंभीर” बताते हुए तुरंत कार्रवाई की। रायपुर थाना प्रभारी (SO) समेत तीन अन्य पुलिसकर्मियों (लाइन ड्यूटी पर तैनात) को लाइन हाजिर कर दिया गया। जांच पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) जया बलूनी को सौंपी गई। आईजी गढ़वाल राजीव स्वरूप ने भी विस्तृत जांच के निर्देश दिए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए मजिस्ट्रेट स्तर की न्यायिक जांच और डॉक्टरों के पैनल से पोस्टमॉर्टम (वीडियोग्राफी के साथ) कराया जा रहा है। अगर कोई लापरवाही या संलिप्तता पाई गई तो सख्त कार्रवाई का वादा किया गया है।

उत्तराखंड में पुलिस कस्टडी मौतों का पुराना सिलसिला
यह घटना उत्तराखंड पुलिस पर कस्टडी मौतों और फर्जी एनकाउंटर के आरोपों की लंबी श्रृंखला को दोहराती है। कुछ प्रमुख पुराने मामले:

  • 2009 देहरादून फर्जी एनकाउंटर: एमबीए छात्र रणबीर सिंह को “गैंगस्टर” बताकर पुलिस ने गोली मार दी। बाद में साबित हुआ कि वह निर्दोष था। दिल्ली विशेष अदालत ने 18 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया, 7 को उम्रकैद हुई – यह दुर्लभ मामला था जहां पुलिसवालों को सजा मिली।
  • 2019 उधम सिंह नगर: नाबालिग छात्र धीरज सिंह राणा की कस्टडी में मौत। पोस्टमॉर्टम में 10 चोटें मिलीं। NHRC ने डीजीपी को नोटिस दिया।
  • 2020 हल्द्वानी/अल्मोड़ा: अखिलेश दीक्षित और सोबन सिंह की संदिग्ध कस्टडी मौतें। परिवारों ने टॉर्चर का आरोप लगाया।
  • 2020 रुड़की: अखिलेश दीक्षित (34) की संदिग्ध मौत – परिवार ने न्यायिक जांच की मांग की।

NHRC और NCRB के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में हर साल औसतन 20-30 कस्टडी मौतें दर्ज होती रही हैं (2021-22 में 27 मामले)। देशभर में 2018-2023 के बीच पुलिस कस्टडी मौतों पर NHRC में दर्ज मामले उत्तराखंड में 2 से 4 प्रति वर्ष रहे, लेकिन दोषसिद्धि दर लगभग शून्य है।

पुलिस की उत्पीड़न, जवाबदेही की कमी और आम लोगों के मानवाधिकार
उत्तराखंड पुलिस पर आम नागरिकों के साथ मारपीट, झूठे मुकदमे, वसूली और कस्टडी में यातना के आरोप लगते रहते हैं। छोटी-मोटी घटनाओं (शराब, झगड़ा, ट्रैफिक विवाद) में बिना वारंट या मेडिकल चेकअप के गिरफ्तारी, हवालात में घंटों-दिनों तक बिना भोजन-दवा के रखना, कबूलनामा उगलवाने के लिए थर्ड डिग्री टॉर्चर – ये आम शिकायतें हैं। डी.के. बसु गाइडलाइंस (1997) और NHRC निर्देशों के बावजूद ज्यादातर मामलों में इनका पालन नहीं होता।

मानवाधिकारों की दृष्टि से कस्टडी मौतें संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन हैं। NCRB डेटा बताता है कि देशभर में 2010-2015 के बीच 591 कस्टडी मौतें हुईं, जिनमें ज्यादातर को “बीमारी/आत्महत्या” बताया गया, लेकिन परिवार अक्सर यातना का आरोप लगाते हैं। उत्तराखंड में भी दोषी पुलिसकर्मियों पर सजा का रिकॉर्ड बेहद कम है – जांच लंबी खिंचती है, उच्च अधिकारी बच जाते हैं और मामला रफा-दफा हो जाता है।

परिवारों का कहना है कि “जांच तो होती है, लेकिन सजा नहीं”। इस मामले में भी परिवार न्याय की मांग कर रहा है कि अगर पुलिस की लापरवाही या यातना साबित हुई तो सिर्फ निलंबन नहीं, बल्कि सख्त सजा हो।

क्या होगा आगे?
मजिस्ट्रेट जांच और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद सच्चाई सामने आएगी। लेकिन उत्तराखंड में बार-बार दोहराई जा रही कस्टडी मौतों ने पुलिस की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। आम नागरिकों के लिए कस्टडी अब “सुरक्षा” नहीं, बल्कि “डर” का पर्याय बन गई है। सरकार और पुलिस प्रशासन को जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्थायी सुधार (CCTV अनिवार्य, स्वतंत्र जांच पैनल, त्वरित मेडिकल एड) करने होंगे, वरना ऐसे मामले सिर्फ खबर बनकर रह जाएंगे।

By The Common Man

News and public affairs

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *