Wed. Mar 25th, 2026

हरिद्वार पुलिस हिरासत में आरोपी युवक की संदिग्ध मौत: कस्टडी डेथ का नया मामला – कानून, कैदियों के अधिकार, पुलिस की ड्यूटीज, मानवाधिकार आयोग की भूमिका और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों पर विस्तृत रिपोर्ट

हरिद्वार, 25 मार्च 2026 – उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के सिडकुल थाना क्षेत्र में पुलिस हिरासत में एक आरोपी युवक की मौत ने पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है। मृतक की पहचान हरिद्वार निवासी नरेश के रूप में हुई है। यह घटना सीजेएम कोर्ट के निर्देश पर चार पेशेवर जमानती (प्रोफेशनल बेलर) को हिरासत में लेने के दौरान हुई। इनके खिलाफ बार-बार अलग-अलग मामलों में जमानत दिलवाने की संदिग्ध भूमिका पाई गई थी। हिरासत के दौरान नरेश की अचानक तबीयत बिगड़ गई। पुलिस ने तुरंत उन्हें अस्पताल पहुंचाया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। शुरुआती रिपोर्ट में मौत का कारण हार्ट अटैक बताया जा रहा है, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही असली कारण स्पष्ट होगा।

एसपी सिटी अभय प्रताप सिंह ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा, “मामले को गंभीरता से लेते हुए हर पहलू की जांच की जा रही है।” वरिष्ठ अधिकारी अस्पताल पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। इस घटना ने एक बार फिर पुलिस कस्टडी डेथ (हिरासत में मौत) के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठा दिया है। उत्तराखंड में कस्टडी मौत के मामले पहले भी सामने आए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के आंकड़ों के अनुसार, देशभर में ऐसी घटनाएं चिंताजनक हैं, जबकि उत्तराखंड में अपेक्षाकृत कम लेकिन गंभीर हैं।

यह रिपोर्ट न केवल हरिद्वार की इस घटना का विस्तृत विवरण देती है, बल्कि उत्तराखंड में जेल और डिटेंशन के राज्य कानूनों, सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क मामलों, कैदियों के कानूनी अधिकारों, पुलिस की जेल/हिरासत में ड्यूटीज और मानवाधिकार आयोग की भूमिका को पूरी तरह समाहित करती है। यह एक व्यापक विश्लेषण है जो कानूनी प्रावधानों, अदालती फैसलों और व्यावहारिक जिम्मेदारियों पर आधारित है, ताकि पाठक समझ सकें कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं और इन्हें रोकने के लिए क्या किया जा सकता है।

घटना का विस्तृत विवरण और पृष्ठभूमि

सीजेएम कोर्ट के आदेश पर चार पेशेवर जमानती को हिरासत में लिया गया था। जांच में पता चला कि ये व्यक्ति विभिन्न मामलों में बार-बार जमानत दिलवाने का काम करते थे। पुलिस ने इनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। हिरासत के दौरान नरेश की स्वास्थ्य स्थिति अचानक बिगड़ गई। पुलिस ने उन्हें तुरंत मेडिकल सहायता प्रदान की, लेकिन दुर्भाग्यवश इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। अस्पताल में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पहुंचे और परिवार को सूचना दी गई।

यह मामला पुलिस कस्टडी का है, जहां आरोपी को अदालत के आदेश पर हिरासत में रखा गया था। एनसीआरबी की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में हर साल सैकड़ों कस्टडी मौतें दर्ज होती हैं, जिनमें से अधिकांश हार्ट अटैक या प्राकृतिक कारण बताए जाते हैं, लेकिन कई मामलों में यातना या लापरवाही के आरोप लगते हैं। उत्तराखंड में 2018-2023 के बीच एनएचआरसी के अनुसार लगभग 10 ऐसे मामले दर्ज हुए थे। हरिद्वार की यह घटना एक बार फिर सवाल उठाती है – क्या पुलिस हिरासत में कैदियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और कानूनी अधिकारों का पूरा पालन हो रहा है?

उत्तराखंड में जेल और डिटेंशन के राज्य कानून

उत्तराखंड में जेल प्रशासन और हिरासत प्रक्रियाओं को मुख्य रूप से प्रिजन्स एक्ट 1894 (केंद्रीय कानून), उत्तराखंड जेल मैनुअल 2023 और उत्तराखंड प्रिजन्स एंड करेक्शनल सर्विसेज एक्ट 2024 के तहत नियंत्रित किया जाता है। ये कानून कैदियों की सुरक्षित हिरासत, मानवाधिकारों की रक्षा और सुधार पर केंद्रित हैं।

प्रिजन्स एक्ट 1894 के तहत जेल में कैदियों की हिरासत, अनुशासन और स्वास्थ्य सुविधाएं अनिवार्य हैं। अध्याय V (कस्टोडियल मैनेजमेंट) और अध्याय VIII (मेडिकल केयर) में स्पष्ट निर्देश हैं कि हर कैदी की एडमिशन पर मेडिकल जांच होनी चाहिए। बीमारी की स्थिति में तुरंत डॉक्टर को सूचित करना पड़ता है। मौत की रिपोर्टिंग अनिवार्य है – कारण, पोस्टमार्टम और कोर्ट को रिपोर्ट भेजनी होती है। मेडिकल ऑफिसर को हर 15 दिन में कैदियों का वजन चेक करना और इलाज की व्यवस्था करनी होती है।

उत्तराखंड जेल मैनुअल 2023 में जेल प्रशासन को आधुनिक बनाया गया है। इसमें स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और पुनर्वास पर जोर दिया गया है। उत्तराखंड प्रिजन्स एंड करेक्शनल सर्विसेज एक्ट 2024 नया कानून है, जो कैदियों की सुधार, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों पर विशेष ध्यान देता है। महिलाओं, बच्चों, बीमार कैदियों और ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए अलग प्रावधान हैं। पुलिस हिरासत में सीआरपीसी (अब बीएनएसएस) की धारा 41-60 के तहत गिरफ्तारी के नियम लागू होते हैं – कारण बताना, 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना और परिवार को सूचना देना जरूरी है।

ये कानून संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की रक्षा करते हैं। उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है, जिसमें विभागीय जांच, मुकदमा और मुआवजा शामिल है। मॉडल प्रिजन्स एक्ट 2023 (केंद्रीय) भी उत्तराखंड में लागू है, जो ओवरक्राउडिंग रोकने, सीसीटीवी इंस्टॉलेशन और डायनामिक सिक्योरिटी पर जोर देता है।

सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क मामले: कस्टडी डेथ पर महत्वपूर्ण फैसले

सुप्रीम कोर्ट ने कस्टडी मौतों को लेकर कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं, जो पुलिस और जेल प्रशासन के लिए बाध्यकारी हैं। ये फैसले हरिद्वार जैसे मामलों में सीधे लागू होते हैं:

  1. डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997): सबसे महत्वपूर्ण फैसला। कोर्ट ने कस्टडी में यातना और मौत रोकने के लिए 11 दिशानिर्देश जारी किए। इनमें गिरफ्तारी मेमो बनाना, दो गवाहों के सामने हस्ताक्षर, मेडिकल जांच, परिवार को सूचना, हिरासत में इंटरोगेशन का रिकॉर्ड आदि शामिल हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कस्टडी डेथ अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है और राज्य जिम्मेदार है।
  2. निलाबती बेहरा बनाम ओडिशा राज्य (1993): कस्टडी मौत पर स्ट्रिक्ट लायबिलिटी का सिद्धांत स्थापित किया। राज्य को पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश। कोर्ट ने माना कि राज्य कैदियों की सुरक्षा का जिम्मेदार है।
  3. रुडुल साह बनाम बिहार राज्य (1983): अवैध हिरासत या मौत पर मुआवजे का अधिकार स्थापित। अनुच्छेद 32 के तहत पब्लिक लॉ रेमेडी उपलब्ध।
  4. सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1978-1980): जेल में यातना, एकांत कारावास और अमानवीय व्यवहार पर रोक लगाई। कैदियों के अधिकारों को विस्तार से परिभाषित किया।
  5. 1382 जेलों में अमानवीय स्थिति पर (2018, इन रे): जस्टिस लोकुर की बेंच ने देशभर की जेलों में सुधार के आदेश दिए। कस्टडी डेथ पर वीडियो रिकॉर्डिंग, स्वतंत्र जांच और ओवरक्राउडिंग रोकने के निर्देश।

अन्य महत्वपूर्ण मामले: जोगिंदर कुमार बनाम यूपी (1994) – मनमानी गिरफ्तारी पर रोक; मुंशी सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश (2005) – सबूतों की कमी में भी जांच जरूरी; शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014) – मृत्युदंड में विलंब यातना है। सुकन्या शान्ता बनाम भारत संघ (2024) में जाति-आधारित भेदभाव असंवैधानिक करार दिया गया।

ये फैसले बताते हैं कि कस्टडी डेथ में राज्य की जवाबदेही है। मुआवजा, सजा और सुधार अनिवार्य हैं। हरिद्वार मामले में इन दिशानिर्देशों का सख्त पालन जांच का आधार बनेगा।

कैदियों के कानूनी अधिकार (Legal Rights of Prisoners)

कैदी होना किसी व्यक्ति को गैर-व्यक्ति नहीं बना देता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जेल की दीवारें मौलिक अधिकारों को पूरी तरह नहीं रोक सकतीं। कैदियों को अनुच्छेद 14, 19, 21 और 22 के तहत अधिकार प्राप्त हैं।

अनुच्छेद 21 के तहत: जीवन और गरिमा के साथ जीने का अधिकार, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छ भोजन, पानी, कपड़े, त्वरित न्याय, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल। क्रूर व्यवहार वर्जित।

अनुच्छेद 14: समानता – जाति, धर्म आधारित भेदभाव नहीं (सुकन्या शान्ता केस 2024)।

मॉडल प्रिजन मैनुअल 2016 और उत्तराखंड एक्ट 2024 के अनुसार प्रमुख अधिकार:

  • मानव गरिमा (कोई यातना, जबरन नग्नता नहीं)।
  • मूलभूत जरूरतें (पौष्टिक भोजन, स्वच्छता)।
  • स्वास्थ्य और चिकित्सा (नियमित चेकअप, अस्पताल)।
  • संपर्क (परिवार से मुलाकात, पत्र, टेलीफोन, वकील से मिलना)।
  • कानूनी सहायता (नि:शुल्क वकील, अपील)।
  • शिक्षा, प्रशिक्षण, धार्मिक अभ्यास।
  • शिकायत निवारण (एनएचआरसी, अदालत)।

महिलाओं और अंडरट्रायल्स के विशेष अधिकार: अलग वार्ड, प्रसव देखभाल, वीडियो कोर्ट पेशी। उत्तराखंड जेल मैनुअल 2023 में इनका सख्ती से पालन अनिवार्य है। उल्लंघन पर रिट याचिका या मुआवजा मिल सकता है।

पुलिस की जेल/हिरासत में कैदियों के प्रति ड्यूटीज (Duties of Police)

पुलिस की भूमिका गिरफ्तारी से लेकर एस्कॉर्टिंग तक महत्वपूर्ण है। डी.के. बसु गाइडलाइंस और मॉडल प्रिजन्स एक्ट 2023 के अनुसार मुख्य ड्यूटीज:

  1. गिरफ्तारी के समय: कारण बताना, एरेस्ट मेमो, परिवार को सूचना, मेडिकल जांच (हर 48 घंटे में)।
  2. कस्टडी में: 24 घंटे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना, यातना निषेध, वकील से मिलना सुनिश्चित करना, इंटरोगेशन रिकॉर्ड।
  3. जेल एस्कॉर्ट: सुरक्षित ले जाना, महिला स्टाफ की व्यवस्था, इंटेलिजेंस शेयरिंग।
  4. स्वास्थ्य और सुरक्षा: बीमार होने पर तुरंत अस्पताल, गरिमा बनाए रखना।
  5. रिपोर्टिंग: कस्टडी मौत पर 24 घंटे में एनएचआरसी को सूचना।
  6. भेदभाव न करना: जाति/लिंग आधारित नहीं (2024 केस)।

उत्तराखंड प्रिजन्स एक्ट 2024 में पुलिस और जेल स्टाफ का समन्वय अनिवार्य है। उल्लंघन पर विभागीय सजा, मुकदमा और मुआवजा। हालिया सुप्रीम कोर्ट आदेशों में डीजीपी को इनका सख्त पालन निर्देशित किया गया है।

मानवाधिकार आयोग की भूमिका (Role of NHRC)

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट 1993 के तहत स्थापित है। कस्टडी डेथ को अनुच्छेद 21 का उल्लंघन मानकर यह जांच करता है।

मुख्य भूमिका:

  • स्वतः संज्ञान या शिकायत पर जांच।
  • राज्य सरकार/पुलिस से 24 घंटे में रिपोर्ट मांगना।
  • पोस्टमार्टम वीडियो रिकॉर्डिंग, तीन डॉक्टरों की टीम, मजिस्ट्रियल जांच अनिवार्य।
  • मुआवजा (1-5 लाख या अधिक) और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफारिश।
  • जेल निरीक्षण और दिशानिर्देश जारी करना (1993 से कस्टडी मौत पर गाइडलाइंस)।

हरिद्वार मामले में परिवार एनएचआरसी को शिकायत कर सकता है। आयोग स्वतः संज्ञान ले सकता है, रिपोर्ट मांगेगा और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करेगा। हालांकि, इसकी सिफारिशें सलाहकारी हैं, लेकिन सरकार अनदेखी नहीं कर सकती। एनएचआरसी ने देशभर में हजारों मामलों में मुआवजा दिलाया है।

सुझाव: न्याय, सुधार और जवाबदेही की मांग

हरिद्वार की यह घटना कस्टडी डेथ की जांच, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करती है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मजिस्ट्रियल जांच और एनएचआरसी की भूमिका निर्णायक होगी। कानून (प्रिजन्स एक्ट, उत्तराखंड एक्ट 2024), सुप्रीम कोर्ट के फैसले (डी.के. बसु, निलाबती बेहरा आदि), कैदियों के अधिकार और पुलिस की ड्यूटीज सभी एक साथ काम करें तभी ऐसी घटनाएं रुक सकती हैं।

सुझाव:

  • सभी हिरासत स्थलों पर सीसीटीवी और वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य।
  • पुलिस प्रशिक्षण में मानवाधिकार और ड्यूटीज शामिल।
  • स्वतंत्र जांच तंत्र और एनएचआरसी/SHRC को मजबूत बनाना।
  • जेल सुधार: ओवरक्राउडिंग कम करना, स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाना।
  • परिवार को तुरंत मुआवजा और न्याय।

कस्टडी डेथ न केवल कानूनी उल्लंघन है, बल्कि मानवाधिकारों का हनन भी। उत्तराखंड पुलिस और जेल विभाग को डी.के. बसु गाइडलाइंस का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। मीडिया इस मामले पर नजर रखे हुए हैं। जांच पूरी होने पर अपडेट आएंगे।

यह रिपोर्ट उपलब्ध तथ्यों, राज्य कानूनों, अदालती फैसलों, एनएचआरसी दिशानिर्देशों और व्यावहारिक प्रावधानों पर आधारित है।

By The Common Man

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