
नैनीताल/देहरादून, 21 मार्च 2026 (राउंड द वॉच/एजेंसी): उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण सुनिश्चित करने के मामले पर सुनवाई के बाद याचिका का निस्तारण कर दिया। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने सीधे कोई अंतिम आदेश जारी करने से परहेज करते हुए याचिकाकर्ताओं (उत्तराखंड सचिवालय में कार्यरत एससी/एसटी समिति के सदस्यों) को दो सप्ताह के अंदर कार्मिक एवं नियुक्ति विभाग के सचिव को संयुक्त प्रत्यावेदन (representation) सौंपने का निर्देश दिया। कोर्ट ने अपेक्षा जताई कि सरकार का संबंधित अधिकारी इस पर यथाशीघ्र विचार कर निर्णय ले और यह प्रक्रिया संभव हो तो नौ महीने के भीतर पूरी कर याचिकाकर्ताओं को सूचित करे।
यह आदेश एससी/एसटी कर्मचारियों के लंबे समय से उठाए जा रहे मसले को फिर से चर्चा में लाया है। हाईकोर्ट ने प्रक्रिया अपनाते हुए संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को जिम्मेदारी सौंपी है, जिससे अब फैसला पूरी तरह राज्य सरकार पर निर्भर है।
कोर्ट के आदेश और कार्यवाही का विवरण
खंडपीठ ने याचिका को निस्तारित करते हुए स्पष्ट किया कि फिलहाल कोई डायरेक्ट निर्देश नहीं दिए जा रहे, बल्कि याचिकाकर्ताओं को सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जा रहा है। कोर्ट के मुताबिक:
- याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर संयुक्त प्रतिनिधित्व दाखिल करें।
- सरकार का अधिकारी यथाशीघ्र निर्णय ले।
- निर्णय कारणयुक्त हो और यदि संभव हो तो नौ माह में पूरा किया जाए।
यह दृष्टिकोण कोर्ट के रुख को दर्शाता है कि वह सीधे हस्तक्षेप से बचते हुए संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान कर रहा है।
कानूनी मुद्दे: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन क्यों जरूरी?
याचिका में मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट के जर्नैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता (सिविल अपील संख्या 629/2022, मूल 2018 फैसला) के निर्देशों का पालन न होने की शिकायत की गई थी। याचिकाकर्ता, जो स्वयं आरक्षित वर्ग से हैं, ने दावा किया कि राज्य सरकार ने अब तक कैडर-वार डेटा तैयार नहीं किया, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व (inadequate representation) का आकलन नहीं किया और रोस्टर पॉइंट्स के आधार पर पदोन्नति में आरक्षण लागू नहीं किया।
मुख्य कानूनी बिंदु:
- M. Nagaraj vs Union of India (2006) के आधार पर: आरक्षण से पहले पिछड़ापन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता (efficiency) पर असर का डेटा जरूरी।
- Jarnail Singh (2018) में संशोधन: पिछड़ापन साबित करने की जरूरत नहीं (संविधान पहले से मानता है), लेकिन quantifiable data (कैडर-वार रोस्टर, प्रतिनिधित्व का वस्तुनिष्ठ आकलन) अनिवार्य।
- अन्य मुद्दे: क्रीमी लेयर को बाहर करना, सब-क्लासिफिकेशन की संभावना, दक्षता प्रभावित न हो।
याचिका में 2012 में बनी इंदु कुमार पांडे समिति और उसके बाद जस्टिस इरशाद हुसैन आयोग (2012-2016) की रिपोर्ट का जिक्र किया गया, जिसे सरकार को सौंपा गया लेकिन सार्वजनिक नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि हर कैडर का रोस्टर तैयार हो और SC/ST के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का मूल्यांकन हो।
सरकार की स्थिति: मामला विचाराधीन, पुरानी रिपोर्ट का हवाला
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जे.पी. जोशी ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट का मामला अभी लंबित है, दिए गए निर्देश अंतरिम प्रकृति के हैं। सरकार ने जस्टिस इरशाद हुसैन समिति की रिपोर्ट पहले ही प्राप्त कर ली है और पूरा मामला विचाराधीन है। सरकार का रुख यह है कि बिना पूर्ण डेटा और विचार-विमर्श के कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद कार्मिक विभाग को याचिकाकर्ताओं के प्रत्यावेदन पर स्पष्ट, कारणयुक्त निर्णय लेना होगा।
राज्य सरकार (वर्तमान में भाजपा शासित) ने पहले भी ऐसे मुद्दों पर सतर्कता बरती है। 2012 में एक समय पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगाई गई थी, जिसे बाद में कोर्ट ने प्रभावित किया। वर्तमान में सरकार डेटा संकलन और समिति रिपोर्ट पर आगे बढ़ने की प्रक्रिया में है, लेकिन कोई तत्काल घोषणा नहीं की गई।
जन दबाव और एससी/एसटी समुदाय की प्रतिक्रिया
हालांकि मुख्य लेख में बड़े पैमाने पर सड़क प्रदर्शन या राजनीतिक दबाव का सीधा उल्लेख नहीं है, लेकिन याचिका स्वयं एससी/एसटी कर्मचारियों के संगठित दबाव का परिणाम है। उत्तराखंड सचिवालय एससी/एसटी समिति के सदस्यों ने याचिका दायर कर लंबे समय से लंबित मांग को उठाया। समिति का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों का पालन न होने से आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व घट रहा है और पदोन्नति में अन्याय हो रहा है।
एससी/एसटी कर्मचारी संघों और प्रभावित अधिकारियों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। पुराने मामलों (2020 के आसपास) में जब आरक्षण पर रोक लगी थी, तब आक्रोश देखा गया था। वर्तमान याचिका को समुदाय का सामूहिक प्रयास माना जा रहा है, जो राजनीतिक दलों (विशेषकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी) द्वारा समर्थित हो सकता है। हालांकि अभी कोई बड़ा प्रदर्शन रिपोर्ट नहीं हुआ, लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद एससी/एसटी संगठन सरकार से शीघ्र निर्णय की मांग तेज करेंगे। मुद्दा संवेदनशील होने से सामाजिक सद्भाव और प्रशासनिक दक्षता दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
पृष्ठभूमि और निहितार्थ
यह मामला 2006 के नागराज फैसले, 2018 के जर्नैल सिंह फैसले और उसके बाद के स्पष्टीकरणों की श्रृंखला का हिस्सा है। उत्तराखंड में 2012 में एक बार आरक्षण समाप्त करने का प्रयास हुआ था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में स्पष्ट किया कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि राज्य का विवेकाधीन प्रावधान है। फिर भी डेटा संकलन अनिवार्य है।
कोर्ट के इस आदेश का निहितार्थ: अब सरकार को कैडर-वार डेटा जुटाना, रोस्टर बनाना और निर्णय लेना होगा। यदि सरकार आरक्षण लागू करती है तो हजारों पदोन्नतियां प्रभावित होंगी; यदि नहीं तो नए कानूनी चुनौतियां आ सकती हैं। एससी/एसटी समुदाय में उम्मीद जगी है, लेकिन देरी से निराशा भी बढ़ सकती है।
निष्कर्ष: हाईकोर्ट ने संतुलित रुख अपनाते हुए सरकार को जिम्मेदारी सौंपी है। अब देखना होगा कि कार्मिक विभाग नौ महीने के अंदर क्या निर्णय लेता है। यह न केवल एससी/एसटी कर्मचारियों के अधिकारों, बल्कि पूरे उत्तराखंड प्रशासन की समावेशिता और दक्षता का परीक्षण होगा। एससी/एसटी संगठन और राजनीतिक दलों की नजर अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।