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हल्द्वानी बनभूलपुरा थाने में बंदी के साथ मारपीट का मामला: परिवार ने लगाए गंभीर आरोप, पुलिस ने दी सफाई

हल्द्वानी, 7 मार्च 2026: उत्तराखंड के नैनीताल जिले के हल्द्वानी शहर में स्थित बनभूलपुरा पुलिस थाने में एक बंदी के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया है, जो पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। 54 वर्षीय प्रमोद मल, जो उधम सिंह नगर के फूलबाग पंतनगर के निवासी हैं, को मोटर वाहन अधिनियम (एमवी एक्ट) की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के समय वह नशे में धुत थे। थाने में लाए जाने के बाद उन्हें लॉकअप में बंद कर दिया गया। मंगलवार रात करीब 11 बजे एसआई जगवीर सिंह बाजार गश्त से लौटे, जिसके बाद प्रमोद मल ने चिल्लाना शुरू कर दिया। इसी दौरान उनके परिवार के सदस्य—पत्नी बिंदु मल, पुत्र शुभम और पुत्री शुभांगिनी—थाने पहुंचे और मुलाकात की अनुमति मांगी। परिवार को मिलने की इजाजत दी गई, लेकिन मुलाकात के दौरान प्रमोद ने जोर-जोर से चिल्लाकर एसआई पर मारपीट के आरोप लगाए।

घटना का विवरण

प्रमोद मल को नशे की हालत में थाने लाया गया था। रात 11 बजे एसआई जगवीर सिंह ड्यूटी से लौटे, जिसके बाद प्रमोद ने चिल्लाना शुरू किया। परिवार की मुलाकात के दौरान प्रमोद ने आरोप लगाया कि एसआई ने उन्हें जूतों से मारा और थप्पड़ बरसाए। पुलिस का दावा है कि ताज चौक और थाने परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों में पूरी घटना की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है, जो प्रमोद की नशे की हालत और उनके व्यवहार को साबित करती है। मुलाकात के बाद परिवार ने प्रमोद की जमानत की मांग की, लेकिन आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में जमानत नहीं दी गई। इसके बाद हंगामा हुआ और परिवार को थाने से बाहर कर दिया गया।

परिवार की ओर से आरोप

परिवार ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्नी बिंदु मल ने कहा कि उनके पति को गिरफ्तारी के समय से ही परेशान किया गया और लॉकअप में ले जाते समय बेरहमी से पीटा गया। पुत्र शुभम और पुत्री शुभांगिनी ने भी पिता की बातों का समर्थन किया, जो मुलाकात के दौरान चिल्ला रहे थे। परिवार का कहना है कि पुलिस ने अनावश्यक रूप से हिंसा का सहारा लिया और जमानत की मांग पर उन्हें अपमानित किया। उन्होंने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और आरोपी एसआई के खिलाफ कार्रवाई की जाए। परिवार ने यह भी कहा कि प्रमोद की गिरफ्तारी एमवी एक्ट के तहत थी, लेकिन पुलिस ने उन्हें यातना देकर मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है। प्रमोद ने खुद चिल्लाकर कहा कि “एसआई ने जूतों से मारा और थप्पड़ बरसाए”।

पुलिस की सफाई और कार्रवाई

पुलिस ने इन आरोपों का पूरी तरह खंडन किया है। बनभूलपुरा थाने के प्रभारी डीएस फर्तयाल ने कहा, “आरोपित प्रमोद मल नशे में थे और परिवार से मिलने के दौरान उन्होंने एसआई को धमकियां दीं, हमला करने की कोशिश की, सरकारी काम में बाधा डाली और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। मौजूद पुलिसकर्मियों के सामने उन्होंने गाली-गलौज की।” पुलिस का दावा है कि प्रमोद ने वैध गिरफ्तारी का विरोध किया और शांति भंग की।इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने प्रमोद मल के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, जिसमें सरकारी काम में बाधा डालने, वैध गिरफ्तारी का विरोध करने, शांति भंग करने और हमला करने की कोशिश की धाराएं लगाई गई हैं। जांच का जिम्मा सीनियर कांस्टेबल गगनदीप सिंह को सौंपा गया है। पुलिस ने उच्च अधिकारियों को घटना की जानकारी दे दी है। मीडिया में मामला उजागर होने के बाद कोई नया केस नहीं बनाया गया; एफआईआर उसी रात दर्ज हुई और उच्चाधिकारियों को सूचित किया गया। हालांकि, मीडिया कवरेज ने मामले को सार्वजनिक किया, जिससे जांच पर दबाव बढ़ा है, लेकिन पुलिस का कहना है कि कार्रवाई नियमित प्रक्रिया के तहत की गई।

क्या पुलिस लॉकअप में मारपीट कर सकती है?

लॉकअप के नियमभारत में पुलिस हिरासत या लॉकअप में कैदी/बंदी के साथ मारपीट या यातना पूरी तरह अवैध है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है, जो गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में साफ कहा है कि हिरासत में यातना (custodial torture) मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है और पुलिस को “थर्ड डिग्री” तरीकों (मारपीट, धमकी आदि) का इस्तेमाल नहीं करने की अनुमति है।

डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997)

मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान 11 अनिवार्य दिशानिर्देश (D.K. Basu Guidelines) जारी किए, जो आज भी कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं। इनमें प्रमुख हैं:-

*गिरफ्तारी के समय पुलिसकर्मी का नाम, पद और पहचान स्पष्ट दिखनी चाहिए।

*गिरफ्तारी मेमो (arrest memo) तैयार करना अनिवार्य, जिसमें गिरफ्तारी का समय और कारण लिखा हो; कम से कम एक गवाह और परिवार के सदस्य की मौजूदगी हो।

*गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार और अधिकार बताना जरूरी।

*हिरासत में चिकित्सकीय जांच अनिवार्य (मेडिकल एग्जामिनेशन), खासकर अगर चोट लगी हो।

*पूछताछ वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से हो; यातना या जबरदस्ती बयान नहीं लिया जा सकता।

*परिवार को सूचना देना और मुलाकात की अनुमति।

*अगर यातना या मौत हो तो मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य, और पुलिसकर्मी पर मुकदमा चल सकता है (IPC की धारा 330, 331, 376 आदि के तहत)।

*लॉकअप में सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य, जो रिकॉर्डिंग रखें।

*बंदी को 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी (CrPC धारा 57)।

*लॉकअप में बंदी को भोजन, पानी, चिकित्सा और स्वच्छता की सुविधा मिलनी चाहिए।

अन्य फैसलों जैसे सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1978) और अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) में भी यातना पर रोक लगाई गई है। अगर पुलिस मारपीट करती है, तो:- *विभागीय जांच और निलंबन हो सकता है।

*आपराधिक मुकदमा (IPC धारा 323, 330, 331 आदि)।

*पीड़ित को मुआवजा मिल सकता है (NHRC या कोर्ट से)।

*हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकती है।

क्या पुलिस लॉकअप में मारपीट कर सकती है?

नहीं, बिल्कुल नहीं। केवल अगर बंदी हिंसक विरोध करे या भागने की कोशिश करे, तो न्यूनतम बल (reasonable force) इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन जूतों से मारना या थप्पड़ मारना यातना माना जाता है। सीसीटीवी फुटेज और जांच से सच्चाई सामने आएगी।

क्या पुलिस जनता पर बल प्रयोग कर सकती है? नियम और दिशानिर्देश

पुलिस को जनता पर बल प्रयोग करने की अनुमति केवल आवश्यक और उचित परिस्थितियों में दी जाती है। CrPC (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर) की धारा 46 के तहत, पुलिस गिरफ्तारी के दौरान या अपराध रोकने के लिए न्यूनतम बल इस्तेमाल कर सकती है, लेकिन यह “उचित बल” (reasonable force) होना चाहिए। उदाहरण:-

*अगर व्यक्ति गिरफ्तारी का विरोध करे या भागने की कोशिश करे।

*आत्मरक्षा में (IPC धारा 96-106)।

*भीड़ नियंत्रण में, लेकिन गैर-घातक हथियार (जैसे लाठी, पानी की बौछार) से, और केवल जब जरूरी हो।

*पुलिस मैनुअल और BPR&D (Bureau of Police Research and Development) गाइडलाइंस के तहत बल प्रयोग की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसमें “प्रोग्रेसिव फोर्स” (चरणबद्ध बल) का सिद्धांत है—पहले चेतावनी, फिर न्यूनतम बल।हालांकि, अनावश्यक या अत्यधिक बल (excessive force) अवैध है और IPC धारा 166 (सरकारी आदेश की अवज्ञा), 330 (यातना), या 302 (हत्या) के तहत मुकदमा चल सकता है। NHRC (National Human Rights Commission) की गाइडलाइंस में पुलिस को बल प्रयोग की रिपोर्ट दर्ज करनी पड़ती है, और जांच अनिवार्य है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, UN के Basic Principles on the Use of Force and Firearms by Law Enforcement Officials (1990) के तहत बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए।

क्या यह पुलिस द्वारा बल के दुरुपयोग का मामला है?

परिवार और प्रमोद मल के आरोपों के आधार पर, यह पुलिस द्वारा बल के दुरुपयोग का मामला लगता है, क्योंकि जूतों से मारना और थप्पड़ बरसाना यातना की श्रेणी में आता है, जो संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन है। अगर आरोप साबित हुए, तो यह हिरासती यातना का क्लासिक उदाहरण होगा। हालांकि, पुलिस ने आरोपों से इनकार किया है और सीसीटीवी फुटेज का हवाला दिया है, जो प्रमोद के नशे और आक्रामक व्यवहार को दिखाता है। जांच जारी है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट पर निर्भर करेगा। अगर फुटेज से मारपीट साबित नहीं हुई, तो यह परिवार की ओर से गलत आरोप हो सकता है। पीड़ित पक्ष NHRC या कोर्ट जा सकता है।

उत्तराखंड पुलिस के पहले ऐसे मामले: हिरासत में हिंसा का इतिहास

यह घटना उत्तराखंड पुलिस के लिए नई नहीं है। राज्य में हिरासत में हिंसा और मौत के कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं:-

*2020 में अल्मोड़ा का सोबन सिंह मामला: 38 वर्षीय सोबन सिंह की राजस्व पुलिस की हिरासत में मौत। परिवार ने यातना का आरोप लगाया, पुलिस ने प्राकृतिक मौत बताया। ‘एनुअल रिपोर्ट ऑन टॉर्चर 2020’ में उत्तराखंड में दो हिरासती मौतें दर्ज।

*2020 में दूसरी हिरासती मौत: एक और मामला जहां लॉकअप में पीटने से मौत हुई।

*अंकिता भंडारी हत्याकांड (2022): गिरफ्तारी के बाद पुलिस पर पक्षपात का आरोप, हिरासत में विशेष सुविधाएं देने की शिकायत।

*देहरादून में नस्लीय हमला मामला (2022): संदिग्धों को हिरासत में पीटने का आरोप, वीडियो फुटेज से विवाद।

*सामान्य पैटर्न: ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्टों में उत्तराखंड में हिरासती यातना के मामले, जहां दोषी पुलिसकर्मियों पर कम सजा होती है। 2010-2015 के बीच 590+ हिरासती मौतें, जिसमें उत्तराखंड शामिल।

ये मामले पुलिस सुधार की जरूरत दिखाते हैं। इस ताजा मामले में जांच जारी है। यदि आरोप साबित हुए, तो एसआई के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है। उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय ने मामले पर निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया है।

By The Common Man

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