सूरज अभी पहाड़ों के पीछे छिपा होता है। हवा में कड़क ठंड है, लेकिन कुमाऊं के घरों में एक अलग ही रौनक छाई रहती है। रसोई से गुड़ की मीठी खुशबू फैलती है, बच्चे उत्साह से उछल-कूद करते हैं और मां–दादी आटे में गुड़ मिलाकर घुघुते गूंथने में जुट जाती हैं। मौका है घुघुतिया का—मकर संक्रांति का वह लोकपर्व, जब पूरा कुमाऊं कौवों से दोस्ती का उत्सव मनाता है।
घुघुती माला और बचपन की चहक
सुबह होते ही बच्चे रंग-बिरंगे नए कपड़े पहनकर छतों की ओर दौड़ पड़ते हैं। उनके गले में लटकती है घुघुती माला—आटे और गुड़ से बने सुनहरे-भूरे, कुरकुरे घुघुते। ये घुघुते कभी ‘4’ जैसी घुमावदार आकृति में, कभी पक्षी, फूल, ड्रम या तलवार के आकार में बनाए जाते हैं। बच्चे खुद इन्हें धागे में पिरोते हैं, कहीं संतरे के टुकड़े जुड़ते हैं तो कहीं पॉपकॉर्न—और हर माला बन जाती है बचपन की रचनात्मक खुशी।
गीतों की पुकार और कौवों का आगमन
फिर शुरू होता है त्योहार का सबसे सुंदर दृश्य। बच्चे छतों पर खड़े होकर एक सुर में गाते हैं—
“काले कौवा काले, घुघुती माला खा ले…
ले कौवा बड़ा, मैं के दीजा सुनो घड़ा…”
कांव-कांव करते कौवे आसमान से उतरते हैं। बच्चे माला से घुघुते निकालकर उन्हें खिलाते हैं। कौवे चोंच में घुघुते लेकर उड़ जाते हैं और बच्चे ताली बजाते हुए खुशी से झूम उठते हैं। लोकमान्यता है कि कौवे गंगा स्नान कर घर-घर आते हैं और उन्हें पहले खिलाना सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
लोककथाओं में छुपा इतिहास
घुघुतिया की परंपरा की जड़ें चंद वंश के काल से जुड़ी मानी जाती हैं। सबसे प्रसिद्ध कथा राजा कल्याण चंद के पुत्र घुघुति की है, जिसे एक लालची मंत्री ने जंगल में छोड़ दिया था। कौवों ने उसकी माला उठाकर रानी तक पहुंचाई और इस तरह बच्चे की जान बची। खुशी में कौवों को मीठे पकवान खिलाए गए और तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
कुछ कथाएं राजा घुघुत, कुछ सूखे से राहत और देवी श्यामला की कृपा से जुड़ी हैं। हर कहानी का सार एक ही है—प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सहअस्तित्व।
परंपरा से जुड़ी मान्यताएं
- कौवे पूर्वजों के दूत माने जाते हैं, इसलिए उन्हें खिलाना पितरों को तृप्त करने जैसा माना जाता है।
- यह पर्व प्रवासी पक्षियों के लौटने का प्रतीक भी है।
- सरयू नदी के दोनों किनारों पर घुघुतिया अलग-अलग दिन मनाने की परंपरा भी लोकजीवन की अनोखी झलक है।
घुघुतिया और उत्तरायणी मेला
घुघुतिया पर्व उत्तरायणी मेले से भी गहराई से जुड़ा है। बागेश्वर में सरयू–गोमती संगम पर हजारों श्रद्धालु स्नान करते हैं, बागनाथ मंदिर में दर्शन होते हैं और झोड़ा–छोलिया की थाप पर पूरा क्षेत्र लोकसंस्कृति में डूब जाता है।
सिर्फ त्योहार नहीं, कुमाऊं की आत्मा
घुघुतिया सिर्फ एक पर्व नहीं—यह कुमाऊं की आत्मा है। यह बच्चों को प्रकृति से जोड़ता है, लोककथाओं को जीवित रखता है और ठंडी सुबहों में भी रिश्तों की गर्माहट घोल देता है। जहां कौवे दोस्त बन जाते हैं और बचपन गीतों में खिल उठता है।
