देवभूमि उत्तराखंड, जहां हर पर्वत और घाटी में वीरों की गूंज बसी है, अपनी प्राचीन लोक परंपराओं और बलिदानी इतिहास के लिए जाना जाता है। इस देवभूमि की अनगिनत वीर गाथाओं में से एक प्रमुख है राजा धामदेव की सागर ताल गढ़ विजय की कथा, जो कत्युरी वंश के स्वर्णिम काल की याद दिलाती है। यह गाथा न केवल शौर्य और संघर्ष की मिसाल है, बल्कि उत्तराखंड के लोकगीतों, जागरों और पूजा विधानों में आज भी जीवंत है।
देवभूमि का प्राचीन वैभव और कत्युरी वंश
उत्तराखंड वेदों, पुराणों और उपनिषदों में आध्यात्मिक केंद्र के रूप में वर्णित है। यहां यक्ष, गंधर्व, नाग, किरात और किन्नरों की कर्मस्थली रही है। महाभारत काल में कुलिंद राजा सुबाहु और घटोत्कच जैसे वीरों ने युद्ध में भाग लिया। नाग वीरों की परंपरा आज भी जीवित है, जैसे विनसर के वीरणक नाग, महासू नाग आदि।
मध्यकाल में कत्युरी वंश ने इस क्षेत्र पर शासन किया। नाथ-सिद्ध परंपरा का गहरा प्रभाव रहा, जहां राजा बसंत देव के गुरु मत्स्येंद्र नाथ थे। 10वीं शताब्दी में नरसिंह देव ने जोशीमठ पर गोरखनाथ की पादुका स्थापित कर 52 नरसिंहों की नियुक्ति की, जिनमें वीर बावन नारसिंह, दुध्याधारी नारसिंह आदि शामिल हैं। इनके साथ 85 भैरव और कई उपगढ़ स्थापित हुए, जहां वीर भड़ जैसे गंगू रमोला, लोधी रिखोला, तिलु रौतेली आदि के नाम आज भी जागरों में गाए जाते हैं।
सागर ताल गढ़: भय का प्रतीक और विजय का साक्षी
सागर ताल गढ़ (जिसे कालागढ़, दुधिया चोड़, नकुवा ताल आदि नामों से भी जाना जाता है) तराई-भावर क्षेत्र (तत्कालीन माल प्रदेश) में सोन नदी और रामगंगा के संगम पर स्थित था। डॉ. रणबीर सिंह चौहान के अनुसार, यह लगभग 200 फीट लंबा-चौड़ा टापू पर बसा सात खंडों का विशाल गढ़ था, जिसमें खैरा गढ़ तक सुरंगें थीं। इसका स्थापत्य अनुपम था, लेकिन यह आतंक का केंद्र भी बना हुआ था।
13वीं-14वीं शताब्दी में फिरोज तुगलक के आक्रमण के बाद यह क्षेत्र कत्युरी नियंत्रण से बाहर हो गया। समुवा मशाण (साणापुर/सहारनपुर का शासक) और उसके साथी नकुवा, विछुवा आदि ने यहां आतंक मचाया। वे महिलाओं का अपहरण करते, पशुधन लूटते और भाबर क्षेत्र में तबाही मचाते थे।
धामदेव का जन्म और संघर्ष
गाथा के अनुसार, धामदेव लखनपुर के कैंतुरी राजा प्रीतम देव (पृथ्वी पाल/पृथिवी शाही) और हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की पुत्री मौला देवी (रानी जिया/पिंगला रानी) के पुत्र थे। कुछ स्रोतों में उन्हें खाती गढ़ के राजा झहब राज की पुत्री मौलादई का पुत्र बताया जाता है। रानी जिया धार्मिक और जनप्रिय थीं, लेकिन अन्य रानियों की ईर्ष्या से धामदेव को साजिशों का सामना करना पड़ा।
रानियों ने राजा को बहकाकर धामदेव को सागर ताल गढ़ जीतने भेज दिया, जहां मौत निश्चित लगती थी। लेकिन रानी जिया ने गुरु आज्ञा से विजय तिलक कर धामदेव को 9 लाख कैंतुरी सेना के साथ भेजा। साथ थे भीमा-पामा कठैत, गोरिल राजा (गोरिया/ग्वील), डोंडीया नारसिंह, बिजुला नैक आदि वीर।
महायुद्ध और विजय
धामदेव ने गढ़ को घेर लिया। बीच में राजा की बीमारी का समाचार मिला, तो वे लखनपुर लौटे, साजिशकर्ता रानियों को सबक सिखाया और गद्दी संभाली। वापस लौटकर उन्होंने समुवा को तहखानों में घेरा। भयंकर युद्ध में समुवा मारा गया, नकुवा को गोरिल ने जंजीरों से बांधा, विछुवा घायल हुआ। गोरिल ने पुरस्कार में कत्युरी राज चेलियां मांगीं, जिससे क्रुद्ध धामदेव ने उन्हें शाप दिया। अंत में नकुवा धामदेव की शरण में आया, लेकिन बाद में गोरिल ने उसका वध कर दिया।
धामदेव का स्वर्णिम काल और अमरता
विजय से धामदेव की ख्याति फैली। वे दुला शाही या मारझान (चक्रवर्ती) कहलाए। राजधानी वैराठ-लखनपुर रही। सिद्धों का प्रभाव था, दीवान में महर जाति के सात भाई निन्गला कोटि और पिंगला कोटि प्रमुख थे। उनके काल में मठ-मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार हुआ, अत्याचारियों का अंत हुआ। अल्पायु में युद्ध में शहीद होने के बाद भी उनकी गाथा अमर है।
आज की सांस्कृतिक जीवंतता
उत्तराखंड में कैंतुरा नाच में धामदेव की खाणा-कटार पूजी जाती है। जागरों में “रानी जिया कि खली माँ नौ लाख कैंतुरा जरमी गयें” जैसे शब्द पश्वा रूप में अवतरित होते हैं। समैण पूजा में जीवित सुकर को गुफा में बंद कर अष्टबलि दी जाती है। दुला चोड़ में धामदेव की पूजा के बाद रानीबाग की “चित्रशीला” पर भव्य मेला लगता है।
यह गाथा उत्तराखंड की वीर परंपरा का प्रतीक है, जो आज भी *जसवंत बाबा, *वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली, कारगिल शहीदों में जीवित है। “वीर भोग्या वसुंधरा” की इस परंपरा को डॉ. रणबीर सिंह चौहान की पुस्तकों “उत्तराखंड के वीर भड़” और “गढ़वाल के गढ़ों का इतिहास” में विस्तार से दर्ज किया गया है।
यह कथा हमें याद दिलाती है कि देवभूमि की मिट्टी में वीरता का बीज सदियों से बोया गया है, और आज भी उत्तराखंडी सैनिक देश की रक्षा में सबसे आगे खड़े हैं।
